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नई दिल्ली, राष्ट्रीय
Sanjeevni Today
July 31, 2026
7:20 pm
भुवनेश्वर: 1990 के दशक के मध्य में, जब ओडिशा में साइबर कैफे खुल रहे थे और इंटरनेट अभी आम लोगों के लिए नई चीज थी, कटक के दो युवा चुपचाप एक बड़ी तकनीकी क्रांति की नींव रख रहे थे।
कर्मेन्द्र कोहली और सीमांत पटनायक उस समय उत्कल यूनिवर्सिटी से मास्टर ऑफ कंप्यूटर एप्लीकेशन (MCA) की पढ़ाई कर रहे थे। दो दशक बाद उनका सपना हकीकत बन चुका है। दिल्ली में एक दोस्त के छत वाले किराए के कमरे से सिर्फ चार लोगों के साथ शुरू हुई उनकी कंपनी SecurEyes आज ₹100 करोड़ की वैल्यू वाली ग्लोबल साइबर सिक्योरिटी कंपनी बन गई है। खास बात यह है कि इसे पूरी तरह बिना किसी बाहरी इन्वेस्टर की फंडिंग के खड़ा किया गया है।
आज SecurEyes के आठ अंतरराष्ट्रीय ऑफिस हैं और यह 1,000 से ज्यादा बड़े क्लाइंट्स को सेवा दे रही है। इनमें भारत सरकार के केंद्रीय मंत्रालय, सेंट्रल बैंक और कई मल्टीनेशनल कंपनियां शामिल हैं।
कटक में बनी मजबूत साझेदारी
SecurEyes का विचार दोनों फाउंडर्स के MCA के दिनों में ही आया था। फाइनल सेमेस्टर के लिए उन्होंने हैदराबाद में साथ पढ़ने का फैसला किया। एक शेयर्ड डेस्कटॉप कंप्यूटर पर ही सबसे पहले ‘SecurEyes’ नाम का एक साधारण फाइल फोल्डर बनाया गया था—उस समय कोई औपचारिक बिजनेस प्लान भी नहीं था।
सही समय की अहमियत समझते हुए दोनों ने रणनीतिक योजना बनाई। सीमांत एंटरप्राइज सॉल्यूशंस में विशेषज्ञता हासिल करने के लिए जापान गए, जबकि कर्मेन्द्र इंटरनेट सिक्योरिटी में महारत हासिल करने के लिए अमेरिका चले गए। बाद में दोनों फिर से एक साथ आए।
CEO और डायरेक्टर कर्मेन्द्र कोहली कहते हैं,
“लोग कंप्यूटर सिस्टम पर बहुत ज्यादा भरोसा करते थे, भले ही वे उनके लिए पूरी तरह ‘ब्लैक बॉक्स’ की तरह थे। हमें तभी एहसास हो गया था कि भविष्य में साइबर सिक्योरिटी बहुत जरूरी होने वाली है।”
अच्छी सैलरी वाली कॉरपोरेट नौकरियां छोड़ने से पहले इस जोड़ी ने ‘गोल्डफिंगर’ नाम का एक ओपन-सोर्स सिक्योरिटी टूल बनाया। लॉन्च होते ही इसे दस लाख से ज्यादा बार डाउनलोड किया गया—उस दौर के लिए यह बहुत बड़ी उपलब्धि थी।
दिल्ली की छत से शुरुआत
2006 में औपचारिक रूप से शुरू हुई SecurEyes ने दिल्ली में एक दोस्त के छत वाले अपार्टमेंट से सिर्फ चार टीम मेंबर्स के साथ काम शुरू किया। शुरुआती सालों में साइबर सिक्योरिटी बेचने के लिए क्लाइंट्स को शुरू से सब कुछ समझाना पड़ता था। फाउंडर्स अक्सर कंपनियों को कोल्ड-कॉल करते थे और NCR इलाके में मोटरसाइकिल से घूमकर पारंपरिक बिजनेस को डिजिटल सुरक्षा की जरूरत समझाते थे।
CTO और डायरेक्टर सीमांत पटनायक याद करते हैं,
“शुरुआती दिनों में क्लाइंट्स अक्सर उम्मीद करते थे कि कोई ज्यादा उम्र का व्यक्ति उनसे मिलने आएगा। लेकिन हमारा ध्यान हमेशा वैल्यू देने पर ही रहा।”
परिवार और दोस्तों के सपोर्ट से कंपनी को शुरुआती सफलता मिली। ING Vysya Bank और भारत सरकार के अहम प्रोजेक्ट्स जैसे क्लाइंट्स मिले—ये रिश्ते आज भी कायम हैं।
वित्तीय अनुशासन मुख्य सिद्धांत
जहां ज्यादातर टेक स्टार्टअप तेजी से वेंचर कैपिटल फंडिंग हासिल करने की कोशिश करते हैं, वहीं कोहली और पटनायक ने धैर्य और बिना कर्ज वाले रास्ते को चुना। उन्होंने कड़े वित्तीय अनुशासन का पालन किया—पहले वादे पूरे करना, छह महीने का इमरजेंसी कैश रिजर्व बनाए रखना और मुनाफे के हर रुपये को कंपनी में दोबारा निवेश करना।
उन्होंने घरेलू और अंतरराष्ट्रीय कारोबार के बीच संतुलन भी बनाए रखा। विदेशी बाजारों से ज्यादा मुनाफा मिलता था, जबकि भारत सरकार और कॉरपोरेट प्रोजेक्ट्स से स्थिरता मिलती थी। इससे कंपनी ग्लोबल बाजार के उतार-चढ़ाव से सुरक्षित रही।
AI प्लेटफॉर्म और युवाओं की मदद
आज SecurEyes दो मुख्य आधारों पर काम करती है—खास साइबर सिक्योरिटी कंसल्टिंग और AI-आधारित सॉफ्टवेयर प्रोडक्ट्स। कंपनी एंड-टू-एंड सिक्योरिटी टेस्टिंग, गवर्नेंस, रिस्क एंड कंप्लायंस (GRC) फ्रेमवर्क और एंटरप्राइज-लेवल डेवलपर ट्रेनिंग उपलब्ध कराती है।
2023 में उनके सुपरवाइजरी प्लेटफॉर्म को 131 सेंट्रल बैंकों के ग्रुप से ग्लोबल पहचान मिली।
बिजनस के अलावा दोनों फाउंडर्स भारत में साइबर सिक्योरिटी टैलेंट की कमी को दूर करने के लिए भी प्रतिबद्ध हैं। SecurEyes साइबर सिक्योरिटी अकादमी के जरिए वे अगली पीढ़ी के प्रोफेशनल्स को ट्रेनिंग देते हैं।
युवा उद्यमियों को सलाह
उत्कल यूनिवर्सिटी के छात्रों और ओडिशा के युवा टेक उत्साहियों को सलाह देते हुए कर्मेन्द्र कहते हैं,
“अपने पैशन को पूरी लगन से फॉलो करें, अच्छे मेंटर्स खोजें और ऐसे लोगों के साथ काम करें जिनकी स्किल्स आपकी स्किल्स की पूरक हों। काम शुरू करने के लिए इससे बेहतर समय कोई और नहीं हो सकता।”
सीमांत अपनी दो दशक की यात्रा का श्रेय एक सरल सिद्धांत को देते हैं—
“जुड़ाव। चाहे वह क्लाइंट्स के साथ हो, टीम के साथ हो या हमारे बीच का रिश्ता हो। जुड़ाव सबसे पहले भरोसे और वैल्यू से बनता है।”
अब अपने 20वें साल में कदम रखते हुए SecurEyes ग्लोबल विस्तार के अगले चरण की तैयारी कर रही है। कटक से ग्लोबल स्टेज तक की यह कहानी ओडिशा की बढ़ती तकनीकी पहचान का एक शानदार उदाहरण है।
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