September 15, 2026

मृत्यु पूर्व बयान को लेकर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: अदालत ने कहा-मीडिया को दिया गया बयान डाइंग डिक्लरेशन नहीं,कोरोनाकाल में किसान की हुई थी मौत - Jabalpur News

जबलपुर के गोरा बाजार थाना क्षेत्र में 2020 में किसान बंशीलाल कुशवाह की मौत के मामले में हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि एफआईआर दर्ज कराने के लिए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सामने मृतक की ओर से कथित रूप से दिया गया बयान निर्णायक रूप स Read more

September 15, 2026

बेरोजगार युवाओं के लिए बड़ी खुशखबरी, सरकारी नौकरी पाने का बड़ा मौका, यूपी में 15,012 शिक्षक पदों पर भर्ती शुरू

उत्तर प्रदेश में शिक्षक बनने का इंतजार कर रहे अभ्यर्थियों के लिए भर्ती प्रक्रिया शुरू हो गई है. उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग ने कुल 15,012 शिक्षक पदों पर भर्ती के लिए दो अलग-अलग विज्ञापन जारी किए हैं. इनमें Assistant Teacher और प्रवक्ता संवर्ग यानी PGT के पद शामिल हैं. सूचना एवं जनसंपर्क विभाग उत्तर प्रदेश की पत्र सूचना शाखा की ओर से इस भर्ती की जानकारी दी गई है. यूपी शिक्षा सेवा चयन आयोग के अध्यक्ष डॉ. प्रशांत कुमार ने 15 सितंबर 2026 को दोनों भर्ती विज्ञापन जारी किए हैं. भर्ती प्रक्रिया में शामिल होने वाले अभ्यर्थियों के लिए आयोग ने One Time Registration यानी OTR व्यवस्था लागू की है. उम्मीदवारों को आवेदन करने से पहले OTR करना होगा. OTR पूरा होने के बाद ही वे संबंधित भर्ती के लिए ऑनलाइन आवेदन कर सकेंगे. Read more

September 15, 2026

हिमालय की चेतावनी और गांधी का रास्ता - प्रवक्‍ता.कॉम - Pravakta.Com

कुमार कृष्णन हिमालय लगातार चेतावनी दे रहा है। कभी अचानक आई बाढ़ के रूप में, कभी हिमस्खलन, कभी ग्लेशियल झील के फटने से आई बाढ़, कभी बादल फटने और भूस्खलन के रूप में। केदारनाथ, धौलीगंगा, जोशीमठ, सिक्किम और अब नेपाल की त्रासदियों ने बार-बार बताया है कि पहाड़ केवल भौगोलिक संरचना नहीं हैं। वे एशिया की जल-सुरक्षा, खाद्य-सुरक्षा और करोड़ों लोगों की आजीविका के आधार हैं। लेकिन हम हर आपदा के बाद कुछ समय के लिए चिंतित होते हैं और फिर अपनी विकास-यात्रा में लौट जाते हैं। गांधी होते तो शायद सबसे पहले यह पूछते कि विकास की हमारी परिभाषा आखिर किसके लिए है और किस कीमत पर है। हिमालय की त्रासदी का सबसे बड़ा संकट यह है कि उसकी सीमाएं राजनीतिक नहीं हैं। पहाड़ भारत, नेपाल, भूटान, पाकिस्तान और चीन की सीमाओं में बंटे हो सकते हैं, लेकिन हिमालयी पारिस्थितिकी किसी सीमा को नहीं मानती। उसकी बर्फ पिघलती है तो पानी नीचे आता है। नदी सीमा पार करती है तो उसके साथ बाढ़, गाद और जीवन भी सीमा पार करते हैं। सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र और मेकांग जैसी बड़ी नदी प्रणालियां अनेक देशों के जीवन को जोड़ती हैं। इसलिए हिमालय की सुरक्षा किसी एक देश का मामला नहीं हो सकती। विडंबना यह है कि जिस क्षेत्र को साझा प्राकृतिक संपदा के रूप में देखा जाना चाहिए, वहां क्षेत्रीय सहयोग अभी भी अपेक्षाकृत कमजोर है। जलवायु और पर्यावरण से जुड़ी आपदाएं राजनीतिक सीमाओं की अनुमति लेकर नहीं आतीं। नेपाल में हुई त्रासदी ने फिर यह याद दिलाया है कि एक देश में पहाड़ की घटना दूसरे देश के मैदान में संकट बन सकती है। इसलिए आपदा प्रबंधन को भी राष्ट्रीय सीमाओं से बाहर निकालकर साझा क्षेत्रीय व्यवस्था का हिस्सा बनाना होगा। इस आवश्यकता को विज्ञान लगातार प्रमाणित कर रहा है। काठमांडू स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट यानी आईसीआईएमओडी की मार्च 2026 में जारी रिपोर्टों ने हिमालयी ग्लेशियरों की स्थिति को लेकर गंभीर चेतावनी दी है। अध्ययन के अनुसार हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में 1990 से 2020 के बीच ग्लेशियरों के कुल क्षेत्रफल में लगभग 12 प्रतिशत और अनुमानित बर्फ भंडार में नौ प्रतिशत की कमी आई है। इस क्षेत्र में 63,700 से अधिक ग्लेशियर लगभग 55,782 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हैं और उनमें करीब 5,736 घन किलोमीटर बर्फ का अनुमानित भंडार है। चिंता केवल बर्फ के घटने की नहीं है। आईसीआईएमओडी के अनुसार वर्ष 2000 के बाद ग्लेशियरों के पिघलने की दर लगभग दोगुनी हुई है। 1975 से निगरानी किए गए 38 ग्लेशियरों के अध्ययन में कुछ स्थानों पर बर्फ की मोटाई में 27 मीटर तक की कुल कमी सामने आई है। लेकिन उससे भी बड़ा संकट यह है कि इतने विशाल हिमालयी क्षेत्र में दीर्घकालिक और उच्च गुणवत्ता वाली निगरानी अभी बहुत सीमित है। 38 निगरानी वाले ग्लेशियरों में केवल सात ही विश्व ग्लेशियर निगरानी सेवा के निर्धारित बेंचमार्क मानकों को पूरा करते हैं। अर्थात हमारे सामने संकट बड़ा है और हमारी निगरानी व्यवस्था अभी छोटी। भारत में उपग्रह आधारित निगरानी, ग्लेशियल झीलों की पहचान और ग्लेशियल झील से फटने वाली बाढ़ यानी जीएलओएफ के जोखिम का आकलन करने की दिशा में काम हुआ है। इसरो के राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग केंद्र ने भारतीय हिमालय में चुनिंदा ग्लेशियल झीलों के लिए जीएलओएफ मॉडलिंग और जोखिम आकलन भी किया है। लेकिन हिमालय की जटिलता को देखते हुए केवल तकनीक पर्याप्त नहीं होगी। वैज्ञानिक जानकारी को स्थानीय प्रशासन, गांवों और सीमापार संस्थाओं तक पहुंचाने की व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी है। यहीं गांधी का विचार आज असाधारण रूप से प्रासंगिक हो उठता है। गांधी का विकास-दर्शन अंधी गति का दर्शन नहीं था। वे साधन और साध्य को अलग करके नहीं देखते थे। उनका आग्रह था कि लक्ष्य कितना भी अच्छा क्यों न हो, उसे पाने के साधन भी नैतिक होने चाहिए। हिमालय के संदर्भ में इसका सीधा अर्थ है—सड़क, बिजली, पर्यटन, बांध और संचार की जरूरतों से इनकार नहीं, लेकिन उनके निर्माण का तरीका ऐसा हो जो पहाड़ की वहन क्षमता, स्थानीय समाज और प्रकृति को नष्ट न करे। गांधी के लिए प्रकृति केवल संसाधन नहीं थी। उनके ट्रस्टीशिप के विचार में संपत्ति और संसाधनों पर अधिकार के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी हुई थी। आज इसे हिमालय पर लागू करें तो सवाल उठता है—क्या पहाड़ हमारे उपभोग के लिए मात्र कच्चा माल हैं, या हम उनके ट्रस्टी हैं? अगर हम हिमालय को केवल सड़क, सुरंग, जलविद्युत, होटल और खनन की संभावनाओं के रूप में देखेंगे तो उसके पारिस्थितिक संतुलन की कीमत चुकानी पड़ेगी। पहाड़ की अपनी एक सीमा है। हर घाटी में निर्माण, हर नदी पर परियोजना और हर ढलान पर सड़क विकास का पर्याय नहीं हो सकती। गांधी का ग्राम स्वराज भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। आपदा प्रबंधन केवल राजधानी या जिला मुख्यालय से नहीं हो सकता। जिस गांव के ऊपर ग्लेशियल झील है, जिस बस्ती के नीचे नदी बहती है या जिस पहाड़ी ढलान पर भूस्खलन का खतरा है, उस गांव के लोगों को जोखिम की जानकारी सबसे पहले मिलनी चाहिए। स्थानीय समुदायों को चेतावनी प्रणाली, आपदा तैयारी और बचाव योजना का हिस्सा बनाना होगा। हिमालयी देशों के बीच सहयोग की पहली शर्त भी यही होनी चाहिए—ज्ञान साझा हो। ग्लेशियरों की निगरानी, बर्फ की स्थिति, ग्लेशियल झीलों का डेटा, मौसम की जानकारी, नदी के जलस्तर और संभावित बाढ़ की सूचना रीयल टाइम में साझा की जाए। यदि पहाड़ का खतरा सीमा पार कर सकता है तो सूचना भी सीमा पर नहीं रुकनी चाहिए। दूसरी जरूरत साझा पूर्व चेतावनी प्रणाली की है। किसी ऊंचाई वाले क्षेत्र में ग्लेशियल झील टूटती है तो नीचे बसे लोगों के पास बचने के लिए पर्याप्त समय होना चाहिए। इसके लिए उपग्रह, सेंसर, मौसम विज्ञान, नदी विज्ञान और स्थानीय अनुभव को एक साथ जोड़ना होगा। केवल वैज्ञानिक संस्थानों में रिपोर्ट तैयार होने से लोगों की जान नहीं बचेगी। सूचना को गांव तक पहुंचना होगा। तीसरी जरूरत खतरे और जोखिम का वैज्ञानिक मानचित्रण है। हर जगह एक जैसा विकास संभव नहीं है। जहां भूस्खलन का खतरा अधिक है, वहां निर्माण के मानक अलग होने चाहिए। जहां बाढ़ का प्राकृतिक रास्ता है, वहां स्थायी बस्तियां बसाने से पहले दस बार सोचना चाहिए। जहां ग्लेशियल झीलों का जोखिम है, वहां नीचे के गांवों के लिए निकासी मार्ग और अभ्यास जरूरी हैं। यहां गांधी का विकेंद्रीकरण का विचार फिर सामने आता है। निर्णय जितना संभव हो उतना स्थानीय होना चाहिए, लेकिन वैज्ञानिक ज्ञान से जुड़ा हुआ। पहाड़ में रहने वाले व्यक्ति को विकास का विरोधी मानना उतना ही गलत है जितना उसे विकास की कीमत पर विस्थापित करना। असली रास्ता समुदाय को निर्णय प्रक्रिया का भागीदार बनाने में है। जलवायु परिवर्तन इस चुनौती को और गंभीर बना रहा है। हिमालयी ग्लेशियरों का सिकुड़ना केवल ऊंचे पहाड़ों का संकट नहीं है। यही बर्फ आगे चलकर नदियों के प्रवाह, खेती, पेयजल, ऊर्जा और पारिस्थितिकी को प्रभावित करती है। आईसीआईएमओडी के अनुसार हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियर कम-से-कम दस प्रमुख एशियाई नदी प्रणालियों के स्रोत हैं और लगभग दो अरब लोगों की खाद्य, जल और आजीविका सुरक्षा से जुड़े हैं। इसलिए हिमालय की रक्षा को पर्यावरण का एक अलग विषय मानना भूल होगी। यह अर्थव्यवस्था का विषय है, कृषि का विषय है, खाद्य सुरक्षा का विषय है और अंततः लोकतंत्र का भी विषय है। क्योंकि पानी का संकट सबसे पहले गरीब को प्रभावित करता है। गांधी के विचारों में अंतिम व्यक्ति का सवाल केंद्रीय था। हिमालय में भी यही कसौटी होनी चाहिए। किसी बड़ी परियोजना से राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को लाभ होता है, लेकिन यदि उसकी कीमत पहाड़ के छोटे किसान, चरवाहे, आदिवासी समुदाय या स्थानीय बस्ती चुकाती है, तो विकास की सफलता अधूरी है। हमें हिमालय से केवल पानी नहीं चाहिए। हमें हिमालय का जीवन भी बचाना होगा। इसके लिए एक बहुआयामी रणनीति जरूरी है—वैज्ञानिक शोध, ग्लेशियरों की दीर्घकालिक निगरानी, ग्लेशियल झीलों की पहचान, पूर्व चेतावनी प्रणालियां, जोखिम मानचित्रण, आपदा-रोधी बुनियादी ढांचा, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और भारत-नेपाल-भूटान सहित पूरे हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में संस्थागत सहयोग। और इसके साथ विकास की अपनी भाषा भी बदलनी होगी। गांधी की प्रासंगिकता यहीं है। वे हमें बताते हैं कि मनुष्य प्रकृति का मालिक नहीं, उसका जिम्मेदार सहभागी है। वे हमें यह भी याद दिलाते हैं कि विकास का अर्थ केवल अधिक उत्पादन और अधिक निर्माण नहीं, बल्कि मनुष्य की गरिमा, समुदाय की सुरक्षा और भविष्य की पीढ़ियों के अधिकारों की रक्षा भी है। हिमालय आज हमसे कोई दार्शनिक उत्तर नहीं मांग रहा। वह बहुत व्यावहारिक सवाल पूछ रहा है—क्या हम उसकी चेतावनियों को आंकड़ों में दर्ज करते रहेंगे या अपनी नीतियों में भी दर्ज करेंगे? हर आपदा के बाद जांच समिति बनाना आसान है। कठिन यह है कि अगली आपदा का जोखिम पहले ही कम कर दिया जाए। हर बार राहत पहुंचाना जरूरी है। लेकिन उससे भी जरूरी है कि लोग बार-बार राहत के मोहताज न बनें। हिमालय को जीतने की नहीं, समझने की जरूरत है। नदियों को बांधने से पहले उनके स्वभाव को समझना होगा। पहाड़ों को काटने से पहले उनकी वहन क्षमता को समझना होगा। और विकास करने से पहले यह तय करना होगा कि विकास का लाभ किसे मिलेगा और उसकी कीमत कौन चुकाएगा। गांधी के शब्दों में नहीं, गांधी की दृष्टि में कहें तो असली सभ्यता वही है जिसमें मनुष्य अपनी जरूरतों को प्रकृति की सीमाओं के भीतर रखना सीखता है। हिमालय की बर्फ पिघल रही है। नदियों का स्वभाव बदल रहा है। आपदाएं अधिक जटिल हो रही हैं। अब हमारे पास केवल दो रास्ते हैं—या तो हर आपदा के बाद शोक मनाएं और मुआवजा बांटें, या विज्ञान, सहयोग और गांधी की मानवीय दृष्टि से ऐसी व्यवस्था बनाएं जिसमें आपदा का खतरा कम हो और अंतिम व्यक्ति की सुरक्षा सबसे ऊपर हो। हिमालय की चेतावनी को अगर हमने इस बार भी नहीं सुना, तो अगली चेतावनी शायद और ऊंची आवाज में आएगी। और तब सवाल केवल यह नहीं होगा कि हिमालय कितना बदला। सवाल यह होगा कि हिमालय बदल रहा था, तब हम क्यों नहीं बदले? 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September 15, 2026

Delhi Hostel Scheme: सत्य निकेतन हादसे के बाद 10,000 छात्रों के लिए CM रेखा गुप्ता का बड़ा फैसला

दिल्ली सरकार 10,000 छात्रों के लिए सुरक्षित और सस्ते हॉस्टल बनाएगी। CM रेखा गुप्ता के मुताबिक, जमीन, डिजाइन और पॉलिसी पर काम शुरू हो चुका है।नई दिल्ली। दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने मंगलवार को छात्रों के लिए बड़ी घोषणा की। उन्होंने कहा कि दिल्ली सरकार शहर के कॉलेजों और यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले 10,000 छात्रों के लिए सुरक्षित और जरूरी सुविधाओं से लैस हॉस्टल बनाएगी। मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) के मुताबिक, इस योजना पर काम शुरू हो चुका है। Read more

September 15, 2026

8th Pay Commission: फिटमेंट फैक्टर 4 के करीब, हर 5 साल में सैलरी रिवीजन की डिमांड; कल से चंडीगढ़ में आयोग की मीटिंग

Sep 15, 2026 05:18 pm ISTलाइव हिन्दुस्तान मुख्य बातें 8th Pay Commission Chandigarh Meeting: 8वां वित्त आयोग कल 16 सितंबर से चंडीगढ़ में मीटिंग करने जा रहा हैअधिक फिटमेंट फैक्टर, फैमिली यूनिट में बदलाव की मांग8th Pay Commission Chandigarh Meeting: कल से चंडीगढ़ में आयोग की मीटिंग Read more

September 15, 2026

कन्फर्म! Vivo 80 में मिलेगी 7200mAh बैटरी, भारत में जल्द होने वाला है लॉन्च

Sep 15, 2026 05:17 pm ISTलाइव हिन्दुस्तान वीवो ने अपने नए स्मार्टफोन Vivo V80 का भारत में टीजर जारी कर दिया है। फोन में ZEISS कैमरा और बड़ी 7200mAh बैटरी जैसे फीचर्स मिलने की उम्मीद है। आइए आपको इसके बारे में बताते हैं। Vivo V80 को कंपनी की ओर से टीज किया गया है। Read more

September 15, 2026

Jantar Mantar violence case: स्वतंत्र भारद्वाज को कोर्ट से राहत, तीन सप्ताह की अंतरिम जमानत मंजूर

September 15, 2026 नई दिल्ली: पटियाला हाउस कोर्ट ने मंगलवार को खुद को ‘इन्फ्लुएंसर’ बताने वाले स्वतंत्र भारद्वाज को तीन सप्ताह की अंतरिम जमानत दे दी। भारद्वाज जंतर-मंतर पर एक विरोध प्रदर्शन के दौरान एक नाबालिग एक्टिविस्ट के पिता के साथ कथित मारपीट के मामले में न्यायिक हिरासत में हैं। Read more

September 15, 2026

‘सेवा संकल्प यात्रा’ 10 राज्यों के 193 जिलों, 773 तहसीलों और 1,159 गांवों से होकर निकलेगी : वीडी शर्मा

गांधीनगर, 15 सितंबर (आईएएनएस)। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता वीडी शर्मा ने मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 25 वर्षों के सार्वजनिक जीवन और सेवा के अवसर पर आयोजित होने वाले विभिन्न कार्यक्रमों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री मोदी के जन्मदिन 17 सितंबर से 17 अक्टूबर तक विभिन्न सेवा अभियानों का आयोजन किया जाएगा। Read more

September 15, 2026

कौन है नेहा बोरा जिसने योगी आदित्यनाथ को सरेआम दी गालियां, CJP से क्या है कनेक्शन?

Neha Bora Controversy: गोरखपुर में CM योगी पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी को लेकर विवाद बढ़ा। OBC पार्टी ने AISA अध्यक्ष नेहा बोरा के खिलाफ कैंट थाने में तहरीर दी।Who is Neha Bora: गोरखपुर में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी करने और भद्दी-भद्दी गालियां देने वाले एक वीडियो के वायरल होने से विवाद हो गया है। वन भारत सिटिजन (OBC) पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष काली शंकर यदुवंशी ने इस वीडियो में दिखने वाली AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा के खिलाफ कैंट थाने में शिकायत दर्ज कराई है। Read more