September 15, 2026

मृत्यु पूर्व बयान को लेकर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: अदालत ने कहा-मीडिया को दिया गया बयान डाइंग डिक्लरेशन नहीं,कोरोनाकाल में किसान की हुई थी मौत - Jabalpur News

जबलपुर के गोरा बाजार थाना क्षेत्र में 2020 में किसान बंशीलाल कुशवाह की मौत के मामले में हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि एफआईआर दर्ज कराने के लिए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सामने मृतक की ओर से कथित रूप से दिया गया बयान निर्णायक रूप स

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उसकी वास्तविकता और उसमें कही गई बातों की साक्ष्य के रूप में अहमियत को अन्य सबूतों के आधार पर साबित करना होगा। जस्टिस हिमांशु जोशी की अदालत ने मृतक की पत्नी की याचिका खारिज कर दी।

2020 में पुलिस पर लगा था मारपीट का आरोप

मामला अप्रैल 2020 का है। लॉकडाउन के दौरान 16 अप्रैल की रात किसान बंशीलाल कुशवाह के साथ पुलिसकर्मियों द्वारा कथित मारपीट के आरोप लगे थे। घटना से जुड़ा एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था, जिसमें किसान ने छह पुलिसकर्मियों के नाम लिए थे।

इसके बाद सभी छह पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया गया था। तत्कालीन अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक डॉ. संजीव उइके ने भी कार्रवाई की पुष्टि की थी।

इलाज के दौरान हुई थी मौत

बंशीलाल को 19 अप्रैल को अस्पताल में भर्ती कराया गया था और 20 अप्रैल 2020 को उनकी मौत हो गई। मामले की जांच सीएसपी स्तर के अधिकारी से कराई गई थी।

तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भी किसान का वीडियो सोशल मीडिया पर साझा कर पुलिस पर मारपीट के आरोप लगाए थे।

पत्नी ने एफआईआर के लिए कोर्ट का रुख किया

बंशीलाल की पत्नी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया कि पुलिस की कथित मारपीट के कारण उनके पति की मौत हुई। उनका कहना था कि मौत से पहले बंशीलाल ने मीडिया के सामने पुलिसकर्मियों के नाम लिए थे। उन्होंने एसपी को भी तस्वीरों और समाचारों के जरिए मामले की जानकारी दी, लेकिन एफआईआर दर्ज नहीं हुई।

पत्नी ने न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी के समक्ष आवेदन दिया। पुलिस से रिपोर्ट मंगाई गई, जिसमें बताया गया कि मर्ग जांच के दौरान पुलिस अधिकारियों द्वारा जांच की जा चुकी है।

इसके आधार पर एफआईआर दर्ज करने से इनकार कर दिया गया। मजिस्ट्रेट ने शिकायत को सीआरपीसी की धारा 200 के तहत निजी शिकायत के रूप में आगे बढ़ाने के निर्देश दिए।

रिवीजन खारिज होने के बाद पहुंचीं हाईकोर्ट

मजिस्ट्रेट के आदेश के खिलाफ पत्नी ने द्वितीय अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के समक्ष पुनरीक्षण याचिका दाखिल की, जिसे भी खारिज कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया।

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि जिला प्रशासन द्वारा परिवार को दी गई 50 हजार रुपए की सहायता राशि भी पुलिसकर्मियों की कथित मारपीट का समर्थन करती है और सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत एफआईआर दर्ज कर जांच के निर्देश दिए जाने चाहिए।

मेडिकल साक्ष्यों में पुलिस पिटाई से मौत की पुष्टि नहीं

राज्य सरकार की ओर से कोर्ट को बताया गया कि मेडिकल साक्ष्यों से यह साबित नहीं होता कि पुलिस की कथित मारपीट के कारण किसान की मौत हुई। मजिस्ट्रेट स्तर की जांच में भी मारपीट के आरोपों की पुष्टि नहीं हुई है।

50 हजार की सहायता राशि से भी पुलिस की भूमिका साबित नहीं

हाईकोर्ट ने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सामने मृतक की ओर से कथित रूप से दिया गया बयान इस स्तर पर निर्णायक रूप से डाइंग डिक्लेरेशन नहीं माना जा सकता। उसकी वास्तविकता और साक्ष्य के रूप में उसकी अहमियत को अन्य सबूतों के आधार पर साबित करना होगा। इसी तरह जिला प्रशासन की ओर से दी गई 50 हजार रुपए की अनुग्रह राशि से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि मौत हत्या के कारण हुई या इसमें पुलिसकर्मियों की भूमिका थी।

पोस्टमार्टम में हेरफेर के आरोप पर भी दखल से इनकार

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कथित हेरफेर के आरोप पर भी हाईकोर्ट ने इस स्तर पर हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि अंतर्निहित अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए इस स्तर पर विभिन्न सामग्रियों का तुलनात्मक मूल्यांकन नहीं किया जा सकता।

अदालत ने कहा कि मृतक की पत्नी के पास मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रभावी कानूनी उपाय उपलब्ध है। निचली अदालतों के आदेशों में अधिकार क्षेत्र संबंधी कोई त्रुटि, स्पष्ट विकृति या गंभीर कानूनी खामी नहीं मिली। इन्हीं आधारों पर हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।