September 15, 2026

हिमालय की चेतावनी और गांधी का रास्ता - प्रवक्‍ता.कॉम - Pravakta.Com

कुमार कृष्णन

हिमालय लगातार चेतावनी दे रहा है। कभी अचानक आई बाढ़ के रूप में, कभी हिमस्खलन, कभी ग्लेशियल झील के फटने से आई बाढ़, कभी बादल फटने और भूस्खलन के रूप में। केदारनाथ, धौलीगंगा, जोशीमठ, सिक्किम और अब नेपाल की त्रासदियों ने बार-बार बताया है कि पहाड़ केवल भौगोलिक संरचना नहीं हैं। वे एशिया की जल-सुरक्षा, खाद्य-सुरक्षा और करोड़ों लोगों की आजीविका के आधार हैं। लेकिन हम हर आपदा के बाद कुछ समय के लिए चिंतित होते हैं और फिर अपनी विकास-यात्रा में लौट जाते हैं।
गांधी होते तो शायद सबसे पहले यह पूछते कि विकास की हमारी परिभाषा आखिर किसके लिए है और किस कीमत पर है।
हिमालय की त्रासदी का सबसे बड़ा संकट यह है कि उसकी सीमाएं राजनीतिक नहीं हैं। पहाड़ भारत, नेपाल, भूटान, पाकिस्तान और चीन की सीमाओं में बंटे हो सकते हैं, लेकिन हिमालयी पारिस्थितिकी किसी सीमा को नहीं मानती। उसकी बर्फ पिघलती है तो पानी नीचे आता है। नदी सीमा पार करती है तो उसके साथ बाढ़, गाद और जीवन भी सीमा पार करते हैं। सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र और मेकांग जैसी बड़ी नदी प्रणालियां अनेक देशों के जीवन को जोड़ती हैं। इसलिए हिमालय की सुरक्षा किसी एक देश का मामला नहीं हो सकती।
विडंबना यह है कि जिस क्षेत्र को साझा प्राकृतिक संपदा के रूप में देखा जाना चाहिए, वहां क्षेत्रीय सहयोग अभी भी अपेक्षाकृत कमजोर है। जलवायु और पर्यावरण से जुड़ी आपदाएं राजनीतिक सीमाओं की अनुमति लेकर नहीं आतीं। नेपाल में हुई त्रासदी ने फिर यह याद दिलाया है कि एक देश में पहाड़ की घटना दूसरे देश के मैदान में संकट बन सकती है। इसलिए आपदा प्रबंधन को भी राष्ट्रीय सीमाओं से बाहर निकालकर साझा क्षेत्रीय व्यवस्था का हिस्सा बनाना होगा।
इस आवश्यकता को विज्ञान लगातार प्रमाणित कर रहा है। काठमांडू स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट यानी आईसीआईएमओडी की मार्च 2026 में जारी रिपोर्टों ने हिमालयी ग्लेशियरों की स्थिति को लेकर गंभीर चेतावनी दी है। अध्ययन के अनुसार हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में 1990 से 2020 के बीच ग्लेशियरों के कुल क्षेत्रफल में लगभग 12 प्रतिशत और अनुमानित बर्फ भंडार में नौ प्रतिशत की कमी आई है। इस क्षेत्र में 63,700 से अधिक ग्लेशियर लगभग 55,782 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हैं और उनमें करीब 5,736 घन किलोमीटर बर्फ का अनुमानित भंडार है।
चिंता केवल बर्फ के घटने की नहीं है। आईसीआईएमओडी के अनुसार वर्ष 2000 के बाद ग्लेशियरों के पिघलने की दर लगभग दोगुनी हुई है। 1975 से निगरानी किए गए 38 ग्लेशियरों के अध्ययन में कुछ स्थानों पर बर्फ की मोटाई में 27 मीटर तक की कुल कमी सामने आई है। लेकिन उससे भी बड़ा संकट यह है कि इतने विशाल हिमालयी क्षेत्र में दीर्घकालिक और उच्च गुणवत्ता वाली निगरानी अभी बहुत सीमित है। 38 निगरानी वाले ग्लेशियरों में केवल सात ही विश्व ग्लेशियर निगरानी सेवा के निर्धारित बेंचमार्क मानकों को पूरा करते हैं।
अर्थात हमारे सामने संकट बड़ा है और हमारी निगरानी व्यवस्था अभी छोटी।
भारत में उपग्रह आधारित निगरानी, ग्लेशियल झीलों की पहचान और ग्लेशियल झील से फटने वाली बाढ़ यानी जीएलओएफ के जोखिम का आकलन करने की दिशा में काम हुआ है। इसरो के राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग केंद्र ने भारतीय हिमालय में चुनिंदा ग्लेशियल झीलों के लिए जीएलओएफ मॉडलिंग और जोखिम आकलन भी किया है।  लेकिन हिमालय की जटिलता को देखते हुए केवल तकनीक पर्याप्त नहीं होगी। वैज्ञानिक जानकारी को स्थानीय प्रशासन, गांवों और सीमापार संस्थाओं तक पहुंचाने की व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी है।
यहीं गांधी का विचार आज असाधारण रूप से प्रासंगिक हो उठता है।
गांधी का विकास-दर्शन अंधी गति का दर्शन नहीं था। वे साधन और साध्य को अलग करके नहीं देखते थे। उनका आग्रह था कि लक्ष्य कितना भी अच्छा क्यों न हो, उसे पाने के साधन भी नैतिक होने चाहिए। हिमालय के संदर्भ में इसका सीधा अर्थ है—सड़क, बिजली, पर्यटन, बांध और संचार की जरूरतों से इनकार नहीं, लेकिन उनके निर्माण का तरीका ऐसा हो जो पहाड़ की वहन क्षमता, स्थानीय समाज और प्रकृति को नष्ट न करे।
गांधी के लिए प्रकृति केवल संसाधन नहीं थी। उनके ट्रस्टीशिप के विचार में संपत्ति और संसाधनों पर अधिकार के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी हुई थी। आज इसे हिमालय पर लागू करें तो सवाल उठता है—क्या पहाड़ हमारे उपभोग के लिए मात्र कच्चा माल हैं, या हम उनके ट्रस्टी हैं?
अगर हम हिमालय को केवल सड़क, सुरंग, जलविद्युत, होटल और खनन की संभावनाओं के रूप में देखेंगे तो उसके पारिस्थितिक संतुलन की कीमत चुकानी पड़ेगी। पहाड़ की अपनी एक सीमा है। हर घाटी में निर्माण, हर नदी पर परियोजना और हर ढलान पर सड़क विकास का पर्याय नहीं हो सकती।
गांधी का ग्राम स्वराज भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। आपदा प्रबंधन केवल राजधानी या जिला मुख्यालय से नहीं हो सकता। जिस गांव के ऊपर ग्लेशियल झील है, जिस बस्ती के नीचे नदी बहती है या जिस पहाड़ी ढलान पर भूस्खलन का खतरा है, उस गांव के लोगों को जोखिम की जानकारी सबसे पहले मिलनी चाहिए। स्थानीय समुदायों को चेतावनी प्रणाली, आपदा तैयारी और बचाव योजना का हिस्सा बनाना होगा।
हिमालयी देशों के बीच सहयोग की पहली शर्त भी यही होनी चाहिए—ज्ञान साझा हो। ग्लेशियरों की निगरानी, बर्फ की स्थिति, ग्लेशियल झीलों का डेटा, मौसम की जानकारी, नदी के जलस्तर और संभावित बाढ़ की सूचना रीयल टाइम में साझा की जाए। यदि पहाड़ का खतरा सीमा पार कर सकता है तो सूचना भी सीमा पर नहीं रुकनी चाहिए।
दूसरी जरूरत साझा पूर्व चेतावनी प्रणाली की है। किसी ऊंचाई वाले क्षेत्र में ग्लेशियल झील टूटती है तो नीचे बसे लोगों के पास बचने के लिए पर्याप्त समय होना चाहिए। इसके लिए उपग्रह, सेंसर, मौसम विज्ञान, नदी विज्ञान और स्थानीय अनुभव को एक साथ जोड़ना होगा। केवल वैज्ञानिक संस्थानों में रिपोर्ट तैयार होने से लोगों की जान नहीं बचेगी। सूचना को गांव तक पहुंचना होगा।
तीसरी जरूरत खतरे और जोखिम का वैज्ञानिक मानचित्रण है। हर जगह एक जैसा विकास संभव नहीं है। जहां भूस्खलन का खतरा अधिक है, वहां निर्माण के मानक अलग होने चाहिए। जहां बाढ़ का प्राकृतिक रास्ता है, वहां स्थायी बस्तियां बसाने से पहले दस बार सोचना चाहिए। जहां ग्लेशियल झीलों का जोखिम है, वहां नीचे के गांवों के लिए निकासी मार्ग और अभ्यास जरूरी हैं।
यहां गांधी का विकेंद्रीकरण का विचार फिर सामने आता है। निर्णय जितना संभव हो उतना स्थानीय होना चाहिए, लेकिन वैज्ञानिक ज्ञान से जुड़ा हुआ। पहाड़ में रहने वाले व्यक्ति को विकास का विरोधी मानना उतना ही गलत है जितना उसे विकास की कीमत पर विस्थापित करना। असली रास्ता समुदाय को निर्णय प्रक्रिया का भागीदार बनाने में है।
जलवायु परिवर्तन इस चुनौती को और गंभीर बना रहा है। हिमालयी ग्लेशियरों का सिकुड़ना केवल ऊंचे पहाड़ों का संकट नहीं है। यही बर्फ आगे चलकर नदियों के प्रवाह, खेती, पेयजल, ऊर्जा और पारिस्थितिकी को प्रभावित करती है। आईसीआईएमओडी के अनुसार हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियर कम-से-कम दस प्रमुख एशियाई नदी प्रणालियों के स्रोत हैं और लगभग दो अरब लोगों की खाद्य, जल और आजीविका सुरक्षा से जुड़े हैं।
इसलिए हिमालय की रक्षा को पर्यावरण का एक अलग विषय मानना भूल होगी। यह अर्थव्यवस्था का विषय है, कृषि का विषय है, खाद्य सुरक्षा का विषय है और अंततः लोकतंत्र का भी विषय है। क्योंकि पानी का संकट सबसे पहले गरीब को प्रभावित करता है।
गांधी के विचारों में अंतिम व्यक्ति का सवाल केंद्रीय था। हिमालय में भी यही कसौटी होनी चाहिए। किसी बड़ी परियोजना से राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को लाभ होता है, लेकिन यदि उसकी कीमत पहाड़ के छोटे किसान, चरवाहे, आदिवासी समुदाय या स्थानीय बस्ती चुकाती है, तो विकास की सफलता अधूरी है।
हमें हिमालय से केवल पानी नहीं चाहिए। हमें हिमालय का जीवन भी बचाना होगा।
इसके लिए एक बहुआयामी रणनीति जरूरी है—वैज्ञानिक शोध, ग्लेशियरों की दीर्घकालिक निगरानी, ग्लेशियल झीलों की पहचान, पूर्व चेतावनी प्रणालियां, जोखिम मानचित्रण, आपदा-रोधी बुनियादी ढांचा, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और भारत-नेपाल-भूटान सहित पूरे हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में संस्थागत सहयोग।
और इसके साथ विकास की अपनी भाषा भी बदलनी होगी।
गांधी की प्रासंगिकता यहीं है। वे हमें बताते हैं कि मनुष्य प्रकृति का मालिक नहीं, उसका जिम्मेदार सहभागी है। वे हमें यह भी याद दिलाते हैं कि विकास का अर्थ केवल अधिक उत्पादन और अधिक निर्माण नहीं, बल्कि मनुष्य की गरिमा, समुदाय की सुरक्षा और भविष्य की पीढ़ियों के अधिकारों की रक्षा भी है।
हिमालय आज हमसे कोई दार्शनिक उत्तर नहीं मांग रहा। वह बहुत व्यावहारिक सवाल पूछ रहा है—क्या हम उसकी चेतावनियों को आंकड़ों में दर्ज करते रहेंगे या अपनी नीतियों में भी दर्ज करेंगे?
हर आपदा के बाद जांच समिति बनाना आसान है। कठिन यह है कि अगली आपदा का जोखिम पहले ही कम कर दिया जाए।
हर बार राहत पहुंचाना जरूरी है। लेकिन उससे भी जरूरी है कि लोग बार-बार राहत के मोहताज न बनें।
हिमालय को जीतने की नहीं, समझने की जरूरत है। नदियों को बांधने से पहले उनके स्वभाव को समझना होगा। पहाड़ों को काटने से पहले उनकी वहन क्षमता को समझना होगा। और विकास करने से पहले यह तय करना होगा कि विकास का लाभ किसे मिलेगा और उसकी कीमत कौन चुकाएगा।
गांधी के शब्दों में नहीं, गांधी की दृष्टि में कहें तो असली सभ्यता वही है जिसमें मनुष्य अपनी जरूरतों को प्रकृति की सीमाओं के भीतर रखना सीखता है।
हिमालय की बर्फ पिघल रही है। नदियों का स्वभाव बदल रहा है। आपदाएं अधिक जटिल हो रही हैं। अब हमारे पास केवल दो रास्ते हैं—या तो हर आपदा के बाद शोक मनाएं और मुआवजा बांटें, या विज्ञान, सहयोग और गांधी की मानवीय दृष्टि से ऐसी व्यवस्था बनाएं जिसमें आपदा का खतरा कम हो और अंतिम व्यक्ति की सुरक्षा सबसे ऊपर हो।
हिमालय की चेतावनी को अगर हमने इस बार भी नहीं सुना, तो अगली चेतावनी शायद और ऊंची आवाज में आएगी।
और तब सवाल केवल यह नहीं होगा कि हिमालय कितना बदला।
सवाल यह होगा कि हिमालय बदल रहा था, तब हम क्यों नहीं बदले?

कुमार कृष्णन