
घर के मुख्य द्वार के वास्तु नियमImage Credit source: pexels
घर की सजावट में देवी-देवताओं की तस्वीरें लगाने की परंपरा काफी पुरानी है. लोग अपनी आस्था के अनुसार पूजा घर के अलावा घर के अलग-अलग हिस्सों में भी भगवान की तस्वीर या प्रतिमा लगाते हैं. हालांकि, वास्तु मान्यताओं में भगवान की तस्वीर लगाने के लिए जगह का भी विशेष महत्व बताया गया है. घर का मुख्य द्वार ऐसी ही जगह है, जहां तस्वीर या प्रतिमा लगाते समय उसके स्वरूप और दिशा का ध्यान रखने की सलाह दी जाती है. मान्यता है कि मुख्य द्वार पर भगवान गणेश की तस्वीर या प्रतिमा लगाना शुभ हो सकता है. वहीं कुछ देवी- देवताओं के उग्र या रौद्र स्वरूप को मेन गेट पर लगाने से बचने की बात कही जाती है.
मेन गेट पर गणेश जी की तस्वीर क्यों मानी जाती है शुभ?
हिंदू धर्म में भगवान गणेश को प्रथम पूज्य और विघ्नहर्ता माना जाता है. किसी भी शुभ काम से पहले भगवान गणेश की पूजा करने की परंपरा है. इसी वजह से मुख्य द्वार पर भी गणेश जी की तस्वीर या प्रतिमा लगाने को लेकर विशेष धार्मिक मान्यता देखने को मिलती है. वास्तु मान्यताओं के अनुसार, घर के प्रवेश द्वार पर गणेश जी की तस्वीर लगाने से घर में सकारात्मकता बनी रहने की मान्यता है.
भगवान शिव के रौद्र स्वरूप की तस्वीर लगाने से क्यों बचें?
भगवान शिव के शांत और सौम्य स्वरूप की पूजा की जाती है, लेकिन वास्तु मान्यताओं में उनके रौद्र स्वरूप को अलग तरह से देखा जाता है. मुख्य द्वार पर भगवान शिव के रौद्र स्वरूप, जैसे बहुत ज्यादा उग्र भाव वाली तस्वीर लगाने से बचने की सलाह दी जाती है. इसके पीछे मान्यता यह है कि घर के प्रवेश स्थान पर देवी-देवताओं के शांत और प्रसन्न स्वरूप अधिक सही माने जाते हैं.
शनिदेव की तस्वीर मेन गेट पर क्यों नहीं लगाते?
शनिदेव को न्याय का देवता माना जाता है. हिंदू धर्म में शनिदेव की पूजा का विशेष महत्व है, लेकिन मुख्य द्वार पर उनकी तस्वीर लगाने को लेकर कई वास्तु मान्यताओं में सावधानी बरतने की बात कही जाती है. मान्यता के अनुसार शनिदेव की तस्वीर या प्रतिमा को घर के मुख्य द्वार पर लगाने से बचना चाहिए. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि शनिदेव की पूजा या उनकी तस्वीर घर में रखना अशुभ है. उन्हें मान्यताओं के अनुसार, उनकी तस्वीर घर के मेनगेट पर नहीं लगायी जाती है.
मां काली की तस्वीर लगाने से भी क्यों बचते हैं?
मां काली शक्ति और देवी के उग्र स्वरूप से जुड़ी हुई हैं. उनकी पूजा विशेष रूप से शक्ति उपासना में महत्वपूर्ण मानी जाती है. लेकिन वास्तु की कुछ मान्यताओं में मां काली के उग्र स्वरूप की तस्वीर को घर के मुख्य प्रवेश द्वार पर लगाने से बचने की सलाह दी जाती है. इसका कारण भी तस्वीर के स्वरूप से जुड़ा हुआ है. कुल मिलाकर, किसी भी देवी -देवताओं के उग्र स्वरूप वाली तस्वीरों को घर के मेनगेट पर लगाने से बचना चाहिए, क्योंकि उनके उग्र स्वरूप के लिए पूजा स्थान को अधिक सही माना गया है.
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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और सामान्य जानकारियों पर आधारित है. टीवी9 भारतवर्ष इसकी पुष्टि नहीं करता है.

वरुण चौहान
इलेक्ट्रानिक और डिजिटल मीडिया में करीब एक दशक से ज्यादा का अनुभव. 2008 में एशियन एकेडमी ऑफ फिल्म एंड टेलीविजन (AAFT) नोएडा से पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद कुछ अलग और नया करने की सोच के साथ मीडिया में अपने सफर की शुरुआत की. शुरुआत से ही मेरी रुचि उन विषयों को आम लोगों तक पहुंचाने में रही है, जो भारतीय संस्कृति, धार्मिक परंपराओं से जुड़े हैं. अपने करियर के दौरान Channel One News, Sahara Samay, A2Z News, News Express, National Voice और पंजाब केसरी डिजिटल जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला. इन संस्थानों में काम करते हुए समाचार लेखन, फील्ड रिपोर्टिंग,और डिजिटल कंटेंट को सीखने का अनुभव मिला. फिलहाल देश के सबसे बड़े न्यूज नेटवर्क TV9 भारतवर्ष में धर्म और आस्था से जुड़ी खबरों, धार्मिक आयोजनों, ज्योतिष, वास्तु, पौराणिक कथाओं, मंदिरों की परंपराओं और व्रत-त्योहारों से जुड़े विषयों को सरल, सहज और तथ्यपूर्ण भाषा में पाठकों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी निभा रहा हूं. महाकुंभ 2025 की कवरेज मेरे करियर के महत्वपूर्ण अनुभवों में शामिल है, जहां करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था, अखाड़ों की परंपराओं, संत समाज की गतिविधियों और कुंभ से जुड़े धार्मिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर विस्तार से लिखने का अवसर मिला. इसके अलावा चारधाम यात्रा, सावन, नवरात्रि, दीपावली, होली, छठ पूजा, अमरनाथ यात्रा, रमज़ान और अन्य प्रमुख धार्मिक आयोजनों पर भी लगातार लेखन किया है. भारतीय संस्कृति, धर्म-दर्शन, ज्योतिष, अंक ज्योतिष, वास्तु शास्त्र, पुराणों और लोक आस्थाओं के अध्ययन में विशेष रुचि रखता हूं. मेरा प्रयास हमेशा यही रहता है कि धार्मिक और आध्यात्मिक विषयों को सरल भाषा के माध्यम से पाठकों तक पहुंचाया जाए, ताकि वे अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को बेहतर ढंग से समझ सकें.
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