By Oneindia Staff
Updated: Wednesday, September 16, 2026, 19:27 [IST]
देश में डिजिटल पेमेंट क्रांति की रीढ़ बन चुके यूपीआई (Unified Payments Interface) के व्यावसायिक इस्तेमाल पर केंद्र सरकार द्वारा 'मर्चेंट डिस्काउंट रेट' (MDR) लगाने का फैसला अब कानूनी विवाद में फंस गया है। केंद्र सरकार की ओर से 2,000 रुपये से अधिक के चुनिंदा पी2एम (Person-to-Merchant) यूपीआई लेन-देन पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर लागू करने की अधिसूचना जारी की गई थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं ने इसे मनमाना और भेदभावपूर्ण बताते हुए इस पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए हैं।
यूपीआई पर एमडीआर (MDR) शुल्क का विवाद क्या है और सुप्रीम कोर्ट में इसे चुनौती क्यों दी गई है?
केंद्र सरकार ने 14 सितंबर 2026 की राजपत्र अधिसूचना के जरिए 2,000 रुपये से अधिक के चुनिंदा कारोबारी लेन-देन (P2M) पर 0.4% एमडीआर लगाने की व्यवस्था बनाई है (जिसकी अधिकतम सीमा 75,000 रुपये से अधिक के लेन-देन पर 300 रुपये तय है)। यह व्यवस्था 15 अक्तूबर 2026 से लागू होनी है। अधिवक्ता अंजन दत्ता ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका (PIL) दाखिल कर इसे रद्द करने या इस पर रोक लगाने की मांग की है। याचिका का तर्क है कि 2,000 रुपये की सीमा और दरें तय करने का डेटा सार्वजनिक नहीं किया गया, जबकि सरकार का कहना है कि साइबर सुरक्षा और ढांचागत मजबूती के लिए यह शुल्क जरूरी है।
UPI MDR नियम और अदालती चुनौती की समयरेखा (Timeline)
14 सितंबर 2026
राजपत्र अधिसूचना (Gazette Notification)
केंद्र सरकार ने यूपीआई लेन-देन पर नए मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) से जुड़ी आधिकारिक राजपत्र अधिसूचना जारी की।
15 सितंबर 2026
एमडीआर व्यवस्था की विस्तृत घोषणा
केंद्र सरकार और वित्त मंत्रालय द्वारा 2,000 रुपये से अधिक के चुनिंदा P2M (व्यक्ति से व्यापारी) यूपीआई लेन-देन पर 0.4% शुल्क लगाने का खाका पेश किया गया।
16 सितंबर 2026
सुप्रीम कोर्ट में याचिका (PIL) दाखिल
अधिवक्ता अंजन दत्ता ने अधिवक्ता आशुतोष दुबे के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका (अनुच्छेद 32) दाखिल कर नई व्यवस्था को असंवैधानिक और भेदभावपूर्ण बताया।
15 अक्तूबर 2026
प्रस्तावित प्रभावी तिथि
यदि न्यायालय की ओर से कोई स्थगनादेश (Stay Order) नहीं आता है, तो नई एमडीआर व्यवस्था पूरे देश में लागू होने की तिथि तय है।
क्या है नई एमडीआर (MDR) व्यवस्था का गणित?
केंद्र द्वारा घोषित नियमों के तहत व्यापारी भुगतानों पर नई शुल्क प्रणाली तय की गई है। नए नियम के अनुसार, 2,000 रुपये से अधिक के चुनिंदा P2M लेन-देन पर 0.4% मर्चेंट डिस्काउंट रेट। अधिकतम सीमा 75,000 रुपये या उससे अधिक के बड़े लेन-देन पर यह शुल्क अधिकतम 300 रुपये तक सीमित रहेगा। हालांकि, आम ग्राहकों को राहत को राहत देते हुए व्यक्ति से व्यक्ति (P2P) के बीच होने वाले सभी लेन-देन पूरी तरह निःशुल्क रहेंगे। आम उपभोक्ताओं पर कोई प्रत्यक्ष शुल्क नहीं लगेगा।
कौन हैं याचिकाकर्त्ता और क्या है मुख्य मांगे?
यूपीआई पॉलिसी चेंज को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने वाले अंजन दत्ता (Anjan Datta) भारत के उच्चतम न्यायलय में अधिवक्ता हैं। उन्होंने केंद्र सरकार के उस नए मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) फ्रेमवर्क को चुनौती देते हुए जनहित याचिका (PIL) दायर की है, जिसमें ₹2,000 से अधिक के चुनिंदा UPI भुगतानों पर शुल्क लगाने की बात की गई है। एडवोकेट अंजन दत्ता दिसंबर 2010 से भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) में वकालत कर रहे हैं। वे 'बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया' (Bar Association of India) के लाइफ मेंबर हैं। उन्होने कोलकाता विश्वविद्यालय से कानून (Law) की डिग्री प्राप्त करने के अलावा साइबर लॉ, इंटरनेशनल लॉ, क्रिमिनोलॉजी, इंटरनेशनल ट्रेड एंड बिजनेस लॉ, पर्यावरण कानून और संवैधानिक कानून में विशेषज्ञता/योग्यताएं हासिल की हैं।
वित्त मंत्रालय की सितंबर 2026 की अधिसूचनाओं को चुनौती देने वाली याचिका (Anjan Datta v. Union of India) में मुख्य बिंदु
MDR शुल्क पर आपत्ति: नए फ्रेमवर्क के तहत ₹2,000 से अधिक के चुनिंदा पर्सन-टू-मर्चेंट (P2M) UPI लेनदेन पर 0.4% MDR लागू किया गया है (₹75,000 या उससे अधिक के ट्रांजैक्शन पर अधिकतम ₹300 का कैप)।
P2P ट्रांसफर मुक्त: सामान्य पर्सन-टू-पर्सन (P2P) ट्रांसफर इस शुल्क के दायरे से बाहर हैं।
मुख्य तर्क: याचिका में तर्क दिया गया है कि यह फैसला मनमाना है और अंततः इसका बोझ उपभोक्ताओं पर डाला जा सकता है। साथ ही, ₹2,000 की सीमा और अलग-अलग कैपिंग के औचित्य पर भी सवाल उठाए गए हैं।
प्रतिवादी (Respondents): इस याचिका में केंद्र सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI), NPCI और UPI एंड सर्विसेज स्टीयरिंग कमेटी को पक्षकार बनाया गया है।यह याचिका अधिवक्ता आशुतोष दुबे के माध्यम से दायर की गई है।
याचिकाकर्ता के मुख्य तर्क: प्रक्रिया और सीमा पर सवाल
अदालत में दायर याचिका में शुल्क व्यवस्था के बुनियादी ढांचे और पारदर्शिता पर कई सवाल उठाए गए हैं। याचिका में कहा गया है कि 2,000 रुपये तक कोई शुल्क नहीं है, लेकिन 2,001 रुपये होते ही 0.4% की दर से शुल्क लागू हो जाएगा। यह समान स्थिति वाले कारोबारियों के बीच भेदभाव पैदा करता है। इसके अलावे डेटा की अपारदर्शिता पर सवाल उठाते हुए कहा गया कि 2,000 रुपये की सीमा, हर महीने 1 लाख रुपये की यूपीआई प्राप्ति वाली श्रेणी और 75,000 रुपये की अधिकतम सीमा तय करने के पीछे का वैज्ञानिक व आर्थिक डेटा सार्वजनिक नहीं किया गया।
याचिका में मांग भी की गई है कि 'यूपीआई एंड सर्विसेज स्टीयरिंग कमेटी' के अधिकार, फैसलों और बैठकों का रिकॉर्ड कोर्ट के समक्ष लाया जाए, क्योंकि महत्वपूर्ण आर्थिक फैसले किसी कमेटी के हवाले बिना कानूनी नियमों के नहीं छोड़े जा सकते।
केंद्र सरकार का पक्ष: क्यों जरूरी है एमडीआर?
केंद्र सरकार और वित्त मंत्रालय ने यूपीआई पर एमडीआर (MDR) लगाने के फैसले को डिजिटल भुगतान प्रणाली की दीर्घकालिक स्थिरता (Sustainability) के लिए बेहद जरूरी बताया है। सरकार का तर्क है कि अगस्त 2026 में यूपीआई के जरिए रिकॉर्ड 24.5 अरब लेन-देन दर्ज किए गए हैं, ऐसे में इस विशाल नेटवर्क को सुचारू रूप से चलाने के लिए फंड की आवश्यकता है। एमडीआर से मिलने वाली राशि का सीधा इस्तेमाल देश के डिजिटल पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर को अपग्रेड करने और साइबर सुरक्षा को अभेद्य बनाने में किया जाएगा। इसके अलावा, इस शुल्क से एकत्रित फंड के जरिए टियर-3 से टियर-6 शहरों और सुदूर ग्रामीण इलाकों के छोटे कारोबारियों को वित्तीय सहायता देकर डिजिटल अर्थव्यवस्था से जोड़ा जाएगा।
यूपीआई नियम चेंज पर किसने क्या कहा? उधर PhonePe और MobiKwik समेत प्रमुख पेमेंट्स कंपनियों ने सरकार के इस फैसले का स्वागत किया है। देखिए यूपीआई के प्रस्तावित बदलाव पर किसने क्या कहा -
उद्योग के लिए बहुत ज़रूरी कदम - समीर निगम, सीईओ - PhonePe
PhonePe के CEO समीर निगम ने कहा कि पिछले 6 सालों से 0-MDR की वजह से पूरी डिजिटल पेमेंट्स इंडस्ट्री को हर साल भारी नुकसान उठाना पड़ रहा था। दुनिया के 200 से अधिक देशों में डिजिटल भुगतान पर शुल्क लागू है और भारत ही इकलौता देश था जहां MDR शून्य था। इस कदम से फिनटेक कंपनियों और बैंकों को अपना परिचालन खर्च (operational costs) निकालने में मदद मिलेगी। ग्राहकों और 96% ट्रांजेक्शन पर कोई असर नहीं" उन्होंने स्पष्ट किया कि आम यूज़र्स के लिए P2P (पर्सन-टू-पर्सन) ट्रांसफर पूरी तरह फ्री रहेगा। साथ ही, भारत में 95-96% UPI ट्रांजेक्शन 2,000 रुपये से कम के होते हैं, इसलिए छोटे व्यापारियों और आम ग्राहकों की जेब पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
साइबर सुरक्षा और इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत करने का मौका मिलेगा - उपासना टाकू, को-फाउंडर, MobiKwik
"एमडीआर से होने वाली कमाई से कंपनियों को साइबर सुरक्षा (Cybersecurity), फ्रॉड डिटेक्शन सिस्टम और सर्वर इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने का मौका मिलेगा। टियर-3 से टियर-6 शहरों में डिजिटल पेमेंट्स नेटवर्क का विस्तार करने के लिए वित्तीय संसाधनों की सख्त जरूरत थी।"
पेमेंट सिस्टम में नई टेक्नोलॉजी और इनोवेशन को बढावा मिलेगा - विजय शेखर शर्मा, सीईओ, Paytm
"निजी और सार्वजनिक दोनों क्षेत्रों के डिजिटल नेटवर्क को लंबे समय तक चालू रखने के लिए यह एक संतुलित फैसला है। इससे डिजिटल भुगतान प्रणाली में नई तकनीकों और नवाचार (Innovation) को बढ़ावा मिलेगा, जिसका अंततः लाभ भारतीय फिनटेक इकोसिस्टम को ही होगा।"
पे-टेक दिग्गजों के अलावे उद्योग निकाय Payments Council of India ने सरकार के इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि एमडीआर की पुनर्वापसी से पेमेंट्स सेक्टर में निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा और फिनटेक स्टार्टअप्स के लिए एक टिकाऊ बिजनेस मॉडल (Sustainable Business Model) तैयार होगा।
यूपीआई पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगाने का फैसला एक तरफ जहां डिजिटल ढांचे की आर्थिक सुरक्षा और साइबर इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए सरकार का रणनीतिक कदम है, वहीं दूसरी तरफ छोटे व मध्यम व्यापारियों पर वित्तीय बोझ और पारदर्शिता की कमी को लेकर कानूनी लड़ाई का केंद्र बन गया है। अब सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट के रुख पर टिकी हैं। इसकी अगली सुनवाई 15 अक्टूबर को होगी। अब तमाम निगाहें भारत के सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं कि सर्वोच्च अदालत से क्या आदेश आता है।