अमेरिकी अरबपति एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स की सैटेलाइट इंटरनेट सेवा स्टारलिंक को लेकर यूक्रेन में विवाद खड़ा हो गया है। यूक्रेनी अधिकारियों के मुताबिक, स्टारलिंक की इंटरनेट स्पीड पर लगाई गई सीमा से रूस के खिलाफ लड़ रही यूक्रेनी सेना के कई अभियानों पर असर पड़ा है। अधिकारियों का दावा है कि इस बदलाव की जानकारी सेना को पहले से नहीं दी गई थी।
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की के सलाहकार सेरही बेस्क्रेस्टनोव ने बुधवार को इस समस्या की जानकारी दी। यूक्रेन के रक्षा मंत्रालय के एक अधिकारी ने भी कनेक्टिविटी में परेशानी होने की पुष्टि की। यह मामला ऐसे समय सामने आया है, जब स्पेसएक्स भारत में स्टारलिंक सेवा शुरू करने की तैयारी कर रही है।
ड्रोन संचालन और सैन्य संचार पर असर
स्टारलिंक अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट के जरिए इंटरनेट उपलब्ध कराता है। यूक्रेन में सेना इसका इस्तेमाल सैनिकों के बीच संचार बनाए रखने और दूर से ड्रोन संचालित करने के लिए करती है। इन ड्रोन का इस्तेमाल रूसी सैन्य ठिकानों पर हमले करने और निगरानी के लिए किया जाता है।
सेरही बेस्क्रेस्टनोव के मुताबिक, तेज गति से चलने वाले उपकरणों पर इंटरनेट की सीमा का असर दिखाई दे रहा है। उन्होंने दावा किया कि 160 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक की रफ्तार पर स्टारलिंक कनेक्शन धीमा हो रहा है।
BBC की रिपोर्ट के अनुसार, यूक्रेनी रक्षा मंत्रालय के एक अधिकारी ने भी बताया कि कनेक्टिविटी की समस्या से सैन्य सामान पहुंचाने, ड्रोन संचालन और हमलों से जुड़े अभियानों में कठिनाइयां आ रही हैं। हालांकि, स्पेसएक्स की ओर से इस मामले पर आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आने की पुष्टि नहीं हुई है।
पोलैंड के विदेश मंत्री ने मस्क से उठाए सवाल
स्टारलिंक के मुद्दे पर पोलैंड के विदेश मंत्री रादोस्लाव सिकोरस्की ने एलन मस्क से सवाल किया कि क्या वह अपनी तकनीक के जरिए राजनीति कर रहे हैं। पोलैंड यूक्रेन के लिए स्टारलिंक सेवा का खर्च उठाने वाले देशों में शामिल है।
मस्क की ओर से इस सवाल पर तत्काल प्रतिक्रिया नहीं दी गई। इस विवाद ने निजी तकनीकी कंपनियों की भूमिका पर भी चर्चा तेज कर दी है, क्योंकि युद्ध के दौरान संचार व्यवस्था के लिए यूक्रेनी सेना स्टारलिंक जैसी सेवाओं पर निर्भर रही है।
मस्क के अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के साथ करीबी संबंधों को देखते हुए यूक्रेन में अमेरिकी सैन्य और खुफिया सहायता को लेकर भी चिंताएं जताई जाती रही हैं। हालांकि, स्टारलिंक की स्पीड पर लगी सीमा के पीछे राजनीतिक कारण होने की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
भारत में स्टारलिंक की एंट्री का इंतजार
यूक्रेन में विवाद के बीच भारत में स्टारलिंक की संभावित शुरुआत पर भी ध्यान गया है। कंपनी की तकनीक पारंपरिक मोबाइल टावरों और जमीन पर बिछी इंटरनेट केबल के बजाय सैटेलाइट के जरिए कनेक्टिविटी उपलब्ध कराती है। इससे दूरदराज के गांवों, पहाड़ी क्षेत्रों और उन इलाकों में इंटरनेट पहुंचाने में मदद मिल सकती है, जहां सामान्य नेटवर्क की सुविधा सीमित है।
भारत में स्टारलिंक को रिलायंस जियो और एयरटेल जैसी कंपनियों से प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ सकता है। इन कंपनियों के पास पहले से व्यापक मोबाइल और ब्रॉडबैंड नेटवर्क है। ऐसे में स्टारलिंक की सफलता उसकी कीमत, इंटरनेट की गुणवत्ता और उपलब्धता पर निर्भर करेगी।
सेवा शुरू करने के लिए जरूरी हैं मंजूरियां
भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सेवा शुरू करने के लिए कंपनियों को केवल लाइसेंस ही नहीं, बल्कि सुरक्षा और स्पेक्ट्रम से जुड़ी आवश्यक प्रक्रियाएं भी पूरी करनी होती हैं। स्टारलिंक को व्यावसायिक सेवा शुरू करने के लिए लागू नियमों और संबंधित मंजूरियों का पालन करना होगा।
कंपनी की सेवा दूरदराज के क्षेत्रों में इंटरनेट की समस्या दूर करने में उपयोगी साबित हो सकती है, लेकिन ग्राहकों के लिए इसकी कीमत एक महत्वपूर्ण मुद्दा रहेगी। जियो और एयरटेल की मौजूदा सेवाओं के मुकाबले स्टारलिंक कितनी किफायती होगी, यह उसकी बाजार में स्थिति तय करने में अहम भूमिका निभाएगा।
भारत में पहले भी मिले थे स्टारलिंक उपकरण
वर्ष 2024 में भारतीय एजेंसियों को अंडमान-निकोबार में मादक पदार्थों की तस्करी से जुड़ी जांच और मणिपुर में एक सैन्य अभियान के दौरान स्टारलिंक उपकरण मिलने की खबरें सामने आई थीं। उस समय एलन मस्क ने कहा था कि भारत में स्टारलिंक सेवा चालू नहीं थी।
स्टारलिंक के उपकरणों में आमतौर पर सैटेलाइट डिश, वाई-फाई राउटर, बिजली की केबल और डिश लगाने के लिए स्टैंड शामिल होते हैं। इंटरनेट इस्तेमाल करने के लिए डिश को ऐसी जगह स्थापित करना होता है, जहां आसमान का पर्याप्त खुला हिस्सा दिखाई दे।
निजी सैटेलाइट नेटवर्क पर निर्भरता को लेकर चर्चा
यूक्रेन में सामने आया मामला इस बात को रेखांकित करता है कि युद्ध या आपातकाल के दौरान किसी निजी कंपनी की संचार तकनीक पर निर्भरता कितनी महत्वपूर्ण हो सकती है। नेटवर्क की गति, उपलब्धता या सेवा की शर्तों में बदलाव से उन अभियानों पर असर पड़ सकता है, जो इस तकनीक पर निर्भर हैं।
हालांकि, यूक्रेन में हुई घटना के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि भारत में भी ऐसी ही स्थिति बनेगी। भारत में स्टारलिंक का संभावित उपयोग मुख्य रूप से दूरदराज के इलाकों तक इंटरनेट पहुंचाने के लिए होगा। फिर भी, सेवा शुरू होने पर नेटवर्क की विश्वसनीयता, नियमों और ग्राहकों को मिलने वाली सुविधाओं पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा।