September 21, 2026

Sonia Gandhi Electoral Roll Controversy: नागरिकता मिलने से पहले वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाने के विवाद में सोनिया गांधी की कानूनी मुश्किलें बढ़ीं - Haribhoomi

भारतीय नागरिकता हासिल करने से तीन साल पहले नई दिल्ली की मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के मामले में कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी की कानूनी मुश्किलें बढ़ सकती हैं। दिल्ली की एक विशेष अदालत ने मजिस्ट्रेट कोर्ट के उस पुराने आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें सोनिया गांधी के खिलाफ जांच और एफआईआर दर्ज करने की याचिका को खारिज कर दिया गया था।

Sonia Gandhi

सोनिया गांधी

  • Published: 21 Sep 2026, 04:42 PM IST
  • Last Updated: 21 Sep 2026, 04:43 PM IST

कांग्रेस की वरिष्ठ नेता और पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी से जुड़े दशकों पुराने वोटर लिस्ट विवाद में दिल्ली की एक अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया है। भारतीय नागरिकता मिलने से तीन साल पहले (1980) कथित तौर पर फर्जी/जाली दस्तावेजों के जरिए मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के मामले में विशेष अदालत ने निचली मजिस्ट्रेट अदालत के उस फैसले को पूरी तरह रद्द कर दिया है।

जिसमें पुलिस को एफआईआर दर्ज करने का निर्देश देने से इनकार किया गया था। इस ताजा फैसले के बाद अब यह मामला एक बार फिर कानूनी चक्रव्यूह में लौट आया है और सोनिया गांधी की मुश्किलें बढ़ा सकता है।

क्या है पूरा मामला और सोनिया गांधी पर क्या हैं आरोप?
यह पूरा कानूनी विवाद याचिकाकर्ता विकास त्रिपाठी द्वारा दायर की गई एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका से जुड़ा हुआ है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि सोनिया गांधी को 30 अप्रैल 1983 को भारत की नागरिकता प्रदान की गई थी। हालांकि, उनका नाम इससे तीन साल पहले यानी 1980 की नई दिल्ली संसदीय क्षेत्र की आधिकारिक मतदाता सूची में दर्ज कर लिया गया था।

याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए मुख्य सवाल और कानूनी बिंदु:

  • नागरिकता से पूर्व पंजीकरण: जब सोनिया गांधी को 1983 में भारतीय नागरिकता मिली, तो 1980 की वोटर लिस्ट में उनका नाम किस कानूनी आधार पर दर्ज किया गया था?
  • फर्जी दस्तावेजों का आरोप: याचिका में दावा किया गया है कि 1980 की मतदाता सूची में नाम शामिल करवाने के लिए कथित तौर पर जाली व फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया था।
  • 1980, 1982 और 1983 का उलझा क्रम: याचिका में इस बात पर भी सवाल उठाया गया है कि 1980 की वोटर लिस्ट में नाम दर्ज होने के बाद 1982 में सोनिया गांधी का नाम मतदाता सूची से आखिर क्यों हटाया गया? इसके बाद जब उन्होंने अप्रैल 1983 में नागरिकता हासिल की, तो उनका नाम दोबारा वोटर लिस्ट में कैसे और किन कागजातों के आधार पर जोड़ा गया?

शिकायतकर्ता ने इन्हीं गंभीर सवालों के आधार पर पुलिस को प्राथमिकी दर्ज कर निष्पक्ष आपराधिक जांच का आदेश देने की गुहार लगाई थी, जिसे पूर्व में मजिस्ट्रेट कोर्ट ने खारिज कर दिया था।

विशेष अदालत ने मजिस्ट्रेट के आदेश को क्यों बताया गलत?
कानूनी मामलों की रिपोर्टिंग करने वाली वेबसाइट 'लाइव लॉ' के मुताबिक, द्वारका/राउज एवेन्यू कोर्ट के विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने ने याचिका पर सुनवाई करते हुए मजिस्ट्रेट कोर्ट की कार्यशैली और उसके फैसले की तीखी आलोचना की। विशेष अदालत ने निचली अदालत के आदेश को 'नॉन-स्पीकिंग ऑर्डर' करार दिया।

विशेष न्यायाधीश ने अपने फैसले में मुख्य रूप से गंभीर कमियां उजागर कीं:-

  • विवेचना का अभाव: निचली अदालत के आदेश में मामले से जुड़े प्राथमिक तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर उचित तरीके से विचार नहीं किया गया था।
  • प्रक्रियात्मक चूक (BNS की धारा 175(3) की अनदेखी): मजिस्ट्रेट ने एफआईआर की मांग पर कोई भी फैसला लेने से पहले न तो संबंधित पुलिस अधिकारी का पक्ष सुना और न ही संबंधित पुलिस स्टेशन से इस मामले पर कोई स्थिति रिपोर्ट (Status Report) मंगवाई, जो कि कानूनी प्रक्रिया का एक अनिवार्य हिस्सा था।
  • मुख्य मुद्दे से भटकाव: विशेष न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि मजिस्ट्रेट का मुख्य काम यह तय करना था कि शिकायत में दिए गए तथ्यों से कोई संज्ञेय अपराध बनता है या नहीं और एफआईआर दर्ज करने की आवश्यकता है या नहीं। लेकिन इसके विपरीत, पुराने आदेश में नागरिकता के संवैधानिक मुद्दे और संबंधित संस्थाओं के अधिकार क्षेत्र पर ज्यादा ध्यान दिया गया, जिससे मूल शिकायत की अनदेखी हो गई।
  • तथ्यों की अनदेखी: कोर्ट ने कहा कि शिकायत में लगाए गए आरोपों को केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता था कि उनमें पर्याप्त विवरण नहीं हैं, जब तक कि 1980, 1982 और 1983 के घटनाक्रमों के कानूनी महत्व का सही से विश्लेषण न कर लिया जाए।

अब आगे क्या होगा? कानूनी स्थिति और 29 सितंबर की तारीख
विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने ने अपने आदेश में यह स्पष्ट किया कि पुनरीक्षण अदालत खुद मजिस्ट्रेट की भूमिका नहीं निभा सकती। इसलिए, विशेष अदालत सीधे अपने स्तर पर पुलिस को एफआईआर दर्ज करने का आदेश नहीं दे सकती है। यह फैसला लेने का मूल अधिकार केवल संबंधित मजिस्ट्रेट के पास ही सुरक्षित रहता है।

इसी वजह से दिल्ली कोर्ट ने इस पूरे मामले को वापस एसीजेएम (ACJM) अदालत के पास भेज दिया है। अब एसीजेएम कोर्ट:-

  • मामले में दायर याचिका और उसमें लगाए गए आरोपों की नए सिरे से समीक्षा करेगी।
  • प्रक्रिया के तहत संबंधित पुलिस अधिकारियों की दलीलें और पुलिस की स्थिति रिपोर्ट (Status Report) मंगाकर उस पर विचार करेगी।
  • दोनों पक्षों को सुनने के बाद यह तय करेगी कि क्या इस मामले में संज्ञेय अपराध के तहत एफआईआर दर्ज करने के पर्याप्त कारण मौजूद हैं या नहीं।

अगली सुनवाई: यह मामला अब 29 सितंबर को एसीजेएम अदालत के समक्ष नए सिरे से सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कर दिया गया है।