September 1, 2026

एक तरफ SIR का डर, दूसरी तरफ नहीं मिल रही CAA के तहत नागरिकता, महाराष्ट्र में ये बांग्लादेशी परेशान

भारत में अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशी नागरिकों के खिलाफ लगातार अभियान चलाया जा रहा है. पश्चिम बंगाल से लेकर महाराष्ट्र तक कई राज्यों में बांग्लादेशी रह रहे हैं. इस बीच महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले के कुछ गांवों में रहने वाले बांग्लादेश से आए लोगों के बीच इन दिनों डर का माहौल है. वजह है मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR (Special Intensive Revision) की प्रक्रिया.

लंबे समय से भारत में रह रहे इन लोगों को डर है कि अगर वो खुद को भारतीय नागरिक साबित करने में नाकाम रहे तो उनका नाम मतदाता सूची से हटाया जा सकता है. इसके बाद उन्हें घुसपैठिया मानकर देश से बाहर कर दिया जाएगा. यही वजह है कि इन दिनों ये लोग बैचेन हैं.

भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन

इसी बीच गढ़चिरौली के तरुणनगर और भवानीपुर गांवों में रहने वाले 30 से ज्यादा लोगों ने अपनी पहचान बांग्लादेशी के रूप में स्वीकार करते हुए नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के तहत भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन किया है. इन लोगों में रीपा नाम की एक महिला भी शामिल हैं.

डर के साए में रीपा का परिवार

शादी के कुछ ही समय बाद, रीपा और उनके पति बांग्लादेश के खुलना जिले में स्थित अपने गांव को छोड़कर गढ़चिरोली के भीतरी इलाके में स्थित तरुणनगर पहुंच गए. 40 साल की उम्र पार कर चुकीं रीपा और उनका परिवार स्थानीय परिवेश में आसानी से घुलमिल गया. बांग्लादेश को वो बहुत पीछे छोड़ आए थे. लेकिन कुछ महीने पहले गढ़चिरोली में मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (SIR) की खबर सुनकर उनकी शांति भंग हो गई. इस डर से कि न सिर्फ उनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए जाएंगे, बल्कि भारतीय होने का प्रमाण न दे पाने पर उन्हें देश से भी निकाल दिया जाएगा.

बांग्लादेश में रह रहे रिश्तेदारों से मंगाए दस्तावेज

इसी के चलते रीपा और पूर्व रेड कॉरिडोर के तरुन्नगर एवं भवानीपुर गांवों के 30 से ज्यादा लोगों ने नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के तहत भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन किया है. बांग्लादेश से होने का कोई प्रमाण न होने के कारण उनके आवेदन अधर में लटके हुए हैं. ऐसे में इन लोगों ने बांग्लादेश में रह रहे रिश्तेदारों से व्हाट्सऐप के जरिए पुराने दस्तावेज मंगवाए, जिनसे उनके या उनके माता-पिता के निवास का प्रमाण मिल सकता है.

PDF या दस्तावेजों की फोटो कॉपी स्वीकार नहीं

चूंकि खुली सीमाओं के कारण ये लोग बिना किसी रोक-टोक के भारत में घुस आए थे, इसलिए कई लोगों के पास सीमा पर्ची नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि वो CAA के तहत निर्धारित अंतिम तिथि 31 दिसंबर, 2014 से पहले भारत आए थे. हालांकि अधिकारियों ने PDF या दस्तावेजों की फोटो कॉपी स्वीकार करने से इनकार कर दिया. अधिकारियों का कहना है कि सिर्फ मूल दस्तावेजों की ही जरूरत है. इसके चलते कई लोगों के आवेदन तीन महीने से ज्यादा समय से लंबित हैं.

CAA की सुनवाई में भाग लिया

इन लोगों के वकील निखिलेश अधिकारी ने बताया कि कम से कम 30 लोगों ने गढ़चिरौली में CAA के तहत आवेदन किया है और सुनवाई में भी शामिल हुए हैं. उनका कहना है कि आने वाले समय में ऐसे आवेदकों की संख्या और बढ़ सकती है. उन्होंने बताया कि गढ़चिरोली में कम से कम 30 ऐसे लोगों ने आवेदन दाखिल किए हैं और CAA की सुनवाई में भाग लिया है, और कई और लोग इंतजार कर रहे हैं.

बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के बाद भारत आए

गढ़चिरौली में बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जो 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के बाद भारत आए थे. इनमें से कुछ लोगों को भारत में शरण भी दी गई थी. इसके बाद 1990 और 2000 के दशक में भी बांग्लादेश से आए कई परिवार गढ़चिरौली और विदर्भ के दूसरे हिस्सों में बस गए.

लोगों में निष्कासन का डर

भले ही SIR और CAA का सीधा संबंध न हो, लेकिन SIR ने इनके अंदर निष्कासन का डर पैदा कर दिया है. निखिलेश अधिकारी, जो पूर्व पूर्वी पाकिस्तान और बांग्लादेशी प्रवासियों के संगठन निखिल बांग्ला समन्वय समिति के लिए भी काम करते हैं, उन्होंने कहा कि लोगों को लगता है कि एक बार मतदाता सूची से नाम हटा दिए जाने के बाद, उन्हें घुसपैठिए के रूप में चिह्नित करने का आधार बन सकता है.

पश्चिम बंगाल में प्रमाण पत्र जारी करने का अधिकार

हाल ही में केंद्र सरकार ने पश्चिम बंगाल सरकार को CAA की सुनवाई करने और प्रमाण पत्र जारी करने का अधिकार दिया है. हालांकि, पश्चिम बंगाल सरकार केवल अपने राज्य में रहने वाले प्रवासियों के मामलों पर ही सुनवाई कर सकती है. सूत्रों के अनुसार, इससे वहां रहने वाले हजारों बांग्लादेशियों को मदद मिल सकती है. लेकिन गढ़चिरोली और विदर्भ के अन्य हिस्सों में रहने वालों का संघर्ष अभी भी जारी है.

लोगों ने बयां किया दर्द

सब्ज़ियां बेचकर गुज़ारा करने वाले संजय सरकार भी खुलना के रहने वाले हैं और सीमा पार करके भवानीपुर में बस गए हैं. सरकार ने बताया ‘बांग्लादेश में जीवन आसान नहीं था. तब आजकल की तरह भीड़ हिंसा नहीं होती थी, लेकिन ताने और धमकियां आम बात थीं, इसलिए मैं यहां सम्मान से जीने के लिए आया’. अब सरकार के पास अपने दावे को साबित करने के लिए सिर्फ़ वोटर कार्ड की एक कॉपी है, जो उन्हें बांग्लादेश से व्हाट्सएप के ज़रिए मिली थी. गढ़चिरोली के 47 साल के किसान आशीष मंडल को भी बांग्लादेश से वोटर कार्ड की सिर्फ़ PDF कॉपी ही मिल पाई है.

रतन मलिक तरुणनगर में एक दुकान चलाते हैं, उनके दो बच्चे हैं. उन्होंने बताया ‘मैं बहुत पहले यहां आया था. मेरा बड़ा बेटा कोलकाता में और छोटा गडचिरोली में पैदा हुआ था. SIR के बाद अपने बच्चों की स्थिति को लेकर चिंतित होने के कारण मैंने बांग्लादेशी नागरिक के रूप में अपनी पहचान घोषित करना और CAA के तहत आवेदन करना बेहतर समझा. मैंने सुना है कि पश्चिम बंगाल में यह प्रक्रिया बहुत आसान होने वाली है, तो यहां बांग्लादेशियों के लिए नियमों में ढील क्यों न दी जाएच. वबांग्लादेश के बारीसाल से मलिक कहते हैं कि उनके किसी भी रिश्तेदार ने उन्हें कागजात नहीं भेजे हैं.

जूही उरूषा खान

जूही उरूषा खान

जूही उरूषा खान पिछले 12 साल से पत्रकारिता से जुड़ी हुई हैं. भोपाल के माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय से फिल्म जर्नलिज्म की पढ़ाई की. इसके बाद दिल्ली आकर BAG में एंटरटेनमेंट बीट पर इंटर्नशिप की. बाद में CNEB न्यूज चैनल में एंटरटेनमेंट बीट में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया, साथ ही प्रोग्रामिंग को भी देखा.<p></p>CNEB के बाद VOICE OF INDIA में  एंटरटेनमेंट बीट पर बतौर असिस्टेंट प्रोड्यूसर काम करना शुरू किया. यहां से फिर जनसंदेश न्यूज चैनल के साथ जुड़ीं और प्रोग्रामिंग में काम किया. इसके बाद 4 REAL NEWS चैनल में करीब चार साल न्यूज के साथ ही प्रोग्रामिंग और धार्मिक शोज पर काम किया.<p></p>यहां से राज्यसभा टीवी का रुख किया और प्रोग्रामिंग में काम किया. इसके साथ ही एंकरिंग करना भी शुरू की. इसके बाद सूर्या समाचार में प्रोग्रामिंग में एंटरटेनमेंट बीट पर बतौर प्रोड्यूसर काम किया.<p></p>जी बिहार झारखंड में भी काम करने का अनुभव है. फिलहाल टीवी9 भारतवर्ष से जुड़ी हुई हैं.

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