
बंगाल में SIR पर 33 लाख अपीलों का मामला
पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR को लेकर विवाद अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है. SIR के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से बाहर किए जाने के बाद अब इन फैसलों के खिलाफ ट्रिब्यूनल में दाखिल अपीलों की सुनवाई भी सवालों के घेरे में है. मामला सिर्फ नाम कटने तक सीमित नहीं है, बल्कि अपीलीय ट्रिब्यूनलों में मामलों की सुनवाई की रफ्तार को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं.
11 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह बंगाल में वोटर लिस्ट से नाम कटने में दाखिल की गई अपीलों पर SIR अपीलीय ट्रिब्यूनल के कामकाज पर नजर रखेगा, लेकिन वह ट्रिब्यूनल के फैसलों के लिए कोई डेडलाइन तय नहीं कर सकता. कोर्ट ने इस मामले में चुनाव आयोग से यह बताने को कहा है कि अब तक कितनी अपीलों का निपटारा हुआ है.
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी की एक रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी. इस याचिका में SIR अपीलीय ट्रिब्यूनल द्वारा मामलों के निपटारे की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित और तेज करने के लिए कई निर्देश देने की मांग की गई थी.

हाईकोर्ट मे क्यों कहा था ऐसे अपीलों के निपटारे में लग जाएगा 30 साल का वक्त
SIR प्रक्रिया के बाद पश्चिम बंगाल बड़ी संख्या में लोगों के नाम वोटर लिस्ट से बाहर हुए. इन लोगों को अपने नाम दोबारा शामिल कराने के लिए अपील का रास्ता दिया गया. इन अपीलों की सुनवाई के लिए 19 अपीलीय ट्रिब्यूनल बनाए गए हैं. इनकी अध्यक्षता पूर्व हाईकोर्ट जज कर रहे हैं. लेकिन समस्या यहां से शुरू होती है. लंबित अपीलों की संख्या करीब 33-34 लाख बताई जा रही है.
जुलाई में सामने आए आंकड़ों के मुताबिक करीब 33 लाख अपीलों में से लगभग 30 हजार का ही निपटारा हुआ था, यानी कुल मामलों का एक फीसदी से भी कम. यही वजह है कि कलकत्ता हाईकोर्ट ने जुलाई में टिप्पणी की थी कि अगर अपीलों के निपटारे की मौजूदा रफ्तार बनी रही तो लंबित मामलों को निपटाने में करीब 21 साल लग सकते हैं.
फिर 30 साल का गणित कहां से आया?
मान लीजिए करीब 33 लाख अपीलें लंबित हैं. ट्रिब्यूनल रोजाना औसतन 300 मामलों का निपटारा करता है. ऐसे में अगर इस स्पीड से अपीलों को निपटारा किया जाए तो 11,000 दिन लगेंगे. 11,000 दिन को 365 से भाग देने पर करीब 30.1 साल आ रहा है. यानी अगर 33 लाख मामलों का बैकलॉग हो और रोजाना सिर्फ 300 मामलों का ही निपटारा हो, जबकि इस दौरान नए मामले न जुड़ें और काम की रफ्तार बिल्कुल न बढ़े, तो पूरा बैकलॉग खत्म करने में करीब 30 साल लगेगा. हालांकि यह महज एक गणितीय अनुमान है,कलकत्ता हाईकोर्ट का 21 साल वाला अनुमान भी उस समय की वास्तविक निपटान दर के आधार पर था.
19 ट्रिब्यूनल हैं, फिर भी इतनी धीमी रफ्तार क्यों?
सवाल यही है कि जब पश्चिम बंगाल में 33 लाख अपीलों को निपटान के लिए 19 ट्रिब्यूनल बनाए गए हैं तो लाखों अपीलों का निपटारा तेजी से क्यों नहीं हो पा रहा है? सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार की सुनवाई में इसी सवाल पर फोकस किया. कोर्ट ने कहा कि उसे यह देखना है कि ट्रिब्यूनल कितने मामलों का निपटारा कर रहे हैं, कितने घंटे काम कर रहे हैं और उनकी वास्तविक डिस्पोजल रेट क्या है. कोर्ट ने चुनाव आयोग से इसका पूरा डेटा मांगा है.
- अदालत के सामने यह मुद्दा भी आया कि दूरदराज के इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए ट्रिब्यूनल तक पहुंचना आसान नहीं है.
- ट्रिब्यूनल की संख्या बढ़ाने, डिजिटल प्लेटफॉर्म बनाने और जजों की संख्या आबादी के के हिसाब से नहीं है.
- इसका साफ मतलब है अपीलों का डिस्पोजल रेट में ट्रिब्यूनल की लोकेशन, इंफ्रास्ट्रक्चर, काम करने की क्षमता और पूरी प्रक्रिया की पहुंच भी शामिल है.
क्या वोटर लिस्ट से बाहर होने पर सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल रहा है?
सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया है कि जिन लोगों के नाम SIR के बाद वोटर लिस्ट से बाहर हुए और जिनकी अपीलें लंबित हैं, उन्हें राशन जैसे लाभ मिलने में भी परेशानी हो रही है. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि PDS या दूसरे कल्याणकारी लाभों का मुद्दा अलग कानूनी मामला है और इसके लिए हाईकोर्ट का रास्ता अपनाया जा सकता है.
सुप्रीम कोर्ट की चिंता क्या है?
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल ट्रिब्यूनल को यह आदेश नहीं दिया कि हर अपील इतने दिनों में निपटाई जाए. CJI ने चुनाव आयोग से पूछा है कि कि अब तक कितनी अपीलें निपटाए गई हैं कोर्ट 25 अगस्त को फिर इस मामले पर फिर सुनवाई करेगा. जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने इस बात पर जोर दिया कि सिर्फ अपील करने का अधिकार मिल जाना पर्याप्त नहीं है. अगर किसी व्यक्ति को अपने मामले के फैसले के लिए बहुत लंबा इंतजार करना पड़े तो पूरी प्रक्रिया की प्रभावशीलता पर सवाल उठता है.

सचिन धर दुबे
सचिन धर दुबे को डिजिटल पत्रकारिता में करीब 7 साल का अनुभव है. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत साल 2018 में न्यूज 18 से की. फिर गांव कनेक्शन, ANI, आजतक होते हुए अब TV9 Hindi तक पहुंचे. न्यूज 18 में असाइनमेंट पर कॉपी एडिटर, गांव कनेक्शन में मल्टीमीडिया जर्नलिस्ट, ANI में कंटेंट राइटर और आजतक में सीनियर सब एडिटर पद पर काम किया. सचिन ने कृषि पत्रकारिता में काफी समय बिताया. उनकी राजनीति, विश्व, स्पोर्ट्स, हिस्ट्री ओरिएंटेड विषयों पर लिखने में काफी इंटरेस्ट है. सचिन ने गांव कनेक्शन में रहते हुए ग्राउंड रिपोर्टिंग में भी हाथ आजमाया है. उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से Msc इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पोस्ट ग्रेजुएशन किया है. उत्तर प्रदेश में गोरखपुर के रहने वाले हैं.
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