July 13, 2026

कहानी- द्रौपदी (Short Story- Droupadi)

मुट्ठी में दबे नोट अंटी में ठूंस बैसाखी के सहारे कमरे से बाहर निकलते गिरधारी की दृष्टि दरवाजे से चिपकी द्रौपदी को देख झेंप से नीची हो गई. हकलाते हुए बोला, "मैं बेटे को लेकर बाहर जा रहा हूं... तू तब तक सेठ..." आंधी के प्रचंड झोंके से बची चादर गिर गई. उस पार गिरधारी नग्न खड़ा था! कांप कर द्रौपदी ने आंखें बंद कर ली. पति का यह कौन सा रुप था. अभी तो बदन में बैसाखी के मार के घाव भी नहीं सूखे थे.

फुटपाथ से सटे बरांडे में खड़े-खड़े उसके पैर दुखने लगे तो वह खिसक कर बंद दुकान की सीढ़ी पर बैठ गई. ठंड से बचने के लिए उसने अपना शरीर अपने तन पर चढ़ी एकमात्र टेरीलीन की घिसी-पिटी धोती में गठरीनुमा सिकोड़ लिया पर आंखों के कटोरों में पूरनमासी के चंदा सी चमकती पुतलियां अभी भी सामने रेंगती काली सड़क पर निर्विकार जमी थीं.

यूं अभी सूरज ढले कुछ ज़्यादा समय नहीं बीता था, पर शाम से ही मौसम के नाज़ुक होते रुख ने समय की गति को धक्का देकर एक प्रहर आगे कर दिया था. सड़क पर अधिकांश दुकानें समय से पहले ही बंद हो चुकी थीं और बाज़ार की गहमा-गहमी हवा में ठंड की खुनगी बढ़ते ही फटाफट अपने-अपने घरों की ओर सिमट चली थी.

बेचैनी से बार-बार पहलू बदल रही थी द्रौपदी. कई दिन से मौसम की इस नज़ाकत के कारण सूखे हाथ ही लौटना पड़ा है...‌ आज भी अगर जुगाड़ नहीं लगा तो..? आगे के सोच अंधेरों के साए में कांप कर रह गए.

"खट... खट..." दूर सड़क पर बूटों का स्वर गूंजा तो द्रौपदी की आंखों में चढ़ती उम्मीद की लहर पर आशंकाओं का ढलता सूरज थरथरा उठा. कहीं मुआ... गश्ती पुलिस का सिपाही न हो... ऐसे माहौल में लाख बहाना बनाए पर ससुरों की नज़र भी पूरी घाघ होती है देखते ही ताड़ जाएंगे, फिर मुटुठी गरम करने के साथ उनका बिस्तर भी... पर करे भी क्या वह? भीड़-भाड़ वाले इलाके में किसी परिचित से टकरा जाने का भय ही तो उसे इस जल्दी सुनसान हो जाने वाले स्थान पर खींच लाता है, वरना तो घर के पास ही वह बनिया... सोच के साथ ही एक बदरंगी आकृति उसके ज़ेहन में बन बिगड़ गई.

बूटों का स्वर पास आने लगा तो बिजली की फुर्ती से उछल कर वह बरांडे के खंबे की ओट में चिपक गई, पर निरंतर पास आती पदचापों की आवाज़ साफ़ सुनाई पड़ने वाली अनियमित ध्वनि और सर्द हवा की लहर पर गूंजते किसी गीत के अस्पष्ट बहकते सुर द्रौपदी की उठती-गिरती सांसों को राहत का स्पर्श करा गए. पर साथ ही मुंह से उठती दुर्गंध के तेज़ भभके की कल्पना से ही जी मिचला गया. कदम पीछे लड़खड़ाए पर वमन होने से पहले ही गिरधारी का बुखार से तपता चेहरा और बंटी का भूख से बिलबिलाता स्वर नसों में तड़क उठा. पलटते पैर उलट पड़े, "क्यों बाबू अभी कुछ दम है पाकिट में या खल्लास होकर निकला है." रास्ता रोक कर उसने पहले ही बात साफ़ कर लेना ठीक समझा. इन दारूबाजों का क्या भरोसा कमबख़्त जेब की आख़िरी बूंद तक पी जाते हैं.

"क्या..." अजनबी स्वर कान में पड़ते ही नशा हिरन होते-होते रह गया, "पाकिट..." अगले ही पल नारी स्वर के एहसास ने स्वर में कई बोतलों का नशा और भर दिया, स्वर गर्दन की झोंक पर लहर खा उठा.

यह भी पढ़ें:‌ अपने रिश्ते के प्रति कितने ज़िम्मेदार हैं आप? (How responsible are you towards your relationship?)

"अरे वो कमीना चौकीदार... मुझे... धक्के देकर... बाहर न निकालता... तो... मैं... आज... अड्डे की... सारी दारू पी जाता.‌ आज तो पहली.. तारीख़‌ है... यह देख..." अपनी बात के सबूत में जेब से एक भारी भरकम पर्स निकाल कर उसने द्रौपदी की हैरत भरी आंखों के सम्मुख परचम सा लहरा दिया.

"पहली तारीख..." नारी चेतना को एक झटका-सा लगा. कितनी मुद्दत बीत गई इस तारीख़ को भूले हुए. और अब एक यही तारीख़ क्या द्रौपदी तो तारीख़ों की गिनती ही भूल चुकी है. एक पल को उसकी दृष्टि में पहली तारीख़ की सांझ की प्रतीक्षा करती किसी अनदेखे घर में उस शराबी की पत्नी का काल्पनिक चित्र घूम गया, पर उसकी अपनी ज़रूरतों के यथार्थ ने उसे बेरहमी से मसल दिया.

"चलेगा मेरे साथ?" पेशेवर बोली के साथ अदा से सीने का पल्लू खिसकाना भी अच्छी तरह सीख गई थी वह.

"चल... कहां ले जाएगी... मुझे..." शराब की खुमारी उफनते शबाब में डूबने को मचल उठी. "वह सामने वाले मंदिर के पीछे वहां कोई नही आता." धीमे से फुसफुसा हाथ पकड़ लिया द्रौपदी ने. कहीं नशे पर हल्का सा आघात होते ही मिला हुआ शिकार भी हाथ से न निकल जाए.

कुछ देर बाद यौवन से तृप्त नशे में पस्त वह अजनबी वहीं ज़मीन पर पसर गया तो द्रौपदी ने उसकी पाकिट के बटुए से पचास रुपए निकाल बटुआ वहीं वापिस रख दिया. अनाथ से पड़े उस व्यक्ति के लिए उसके मन में सहानुभूति की लहर उमड़ आई.

"बड़ी देर कर दी." रात के दस बजे कई-कई टुकड़ों में बंटती बड़ी मुश्किल से दवा और कुछ खाने का सामान लेकर वह घर पहुंची तो गिरधारी उसी की राह देख रहा था.

"हां, डॉक्टर किसी मरीज़ को देखने चला गया था वहीं देर हो गई." हाथ में थामे सामान के साथ ही अपने झूठ को भी लापरवाही से एक कोने में फेंक कर वह गिरधारी की बगल में लेटे बेटे की ओर लपकी.

"रोते-रोते बड़ी मुश्किल से कुछ देर पहले ही सोया है." गिरधारी के स्वर में भरे उलाहने ने ममता के बढ़ते हाथों को बेरहमी से लौटा दिया. भोले मासूम चेहरे पर आंसुओं की अभी भी गीली लकीरें थीं. द्रौपदी का हृदय सूखे पत्ते सा चरमरा उठा. घर आने का उत्साह पिचके गुब्बारे सा उसके बोझिल कदमों में लटक गया. निढाल सी वह चारपाई के एक कोने में बैठ गई.

"चाय बना देती हूं डबलरोटी के साथ खा लेना." पति का ध्यान आते ही कर्तव्य ने आगे बढ़ फिर उसे उठा दिया.

"और तुम..."

"मुझे भूख नहीं है... काम पर... कुछ खा लिया था." आधे सच पर उसने आधे झूठ का मुलम्मा चढ़ा दिया.

गिरधारी को खिला-पिला कर जब अपनी चारपाई पर लेटी तो द्रौपदी को तन की थकावट से अधिक मन की व्यथा जार-जार कर गई. आखिर कब तक झूठ की नींव पर वह सच्चाई की ईंटें चुनती रहेगी? पीतल के ऊपर चढ़ी सुनहरी पर्त कभी न कभी तो उतर ही जाएगी तब क्या होगा? क्या सत्य का सामना कर पाएगा गिरधारी? और वह स्वयं?

रोज़ की भांति आज भी पिछले तीन माह का इतिहास उसके ऊपर प्रश्नों की बौछार मारने लगा तो अनुत्तरित प्रश्नों के तीरों से हताहत होने के भय से उसने अतीत के पन्नों को कस कर अपने सीने से लिपटा लिया.

तीन माह... हां कुल तीन माह ही तो बीते थे पर जैसे एक अरसा गुज़र गया हो... इन मनहूस महीनों का उसकी ज़िंदगी पर साया पड़ने से. पहले कितनी सुखी थी द्रौपदी. प्यार करने वाला पति और एक फूल-सा बच्चा, बस इसी में सिमट गई थी उसकी दुनिया.

गिरधारी कपड़ा बनाने वाली एक औसत आमदनी में प्राइवेट मिल में मजदूरी करता था. तीन प्राणियों का गुज़ारा मज़े में चल जाता था, पर वह बेइमान दिन!.. उसे याद करके आज भी उसका कलेजा मुंह को आ जाता है. उसके सुखद अतीत का बंद दरवाज़ा बन गया. मिल से ख़बर आई थी कि मशीन पर काम करते समय गिरधारी दुर्घटनाग्रस्त हो गया है. रोती-कलपती ईश्वर से सौ-सौ मनौतियां मांगती वह अस्पताल पहुंची.

यह भी पढ़ें: क्यों टूट रही है हर रिश्ते की मर्यादा? (Why is the dignity of every relationship being broken?)

उसके आंसुओं पर द्रवित हो ईश्वर ने उसकी मांग के सिंदूर की लाज रख ली, पर उसका सुहाग अपाहिज़ हो गया था. गिरधारी का दाहिना पैर घुटने से ऊपर तक कट चुका था. महीना भर गिरधारी अस्पताल में रहा पर मिल मालिक ने उसके वहां रहने का ख़र्चा और एक माह का वेतन देकर अपनी सहृदयता की इतिश्री कर ली.

साथ ही इस अपंग स्थिति में मिल से उसकी स्थायी छुट्टी का आदेश भी द्रौपदी की फटी झोली में डाल दिया. बिलख कर रह गई उसकी आत्मा. महीने भर बाद बैसाखी थामे गिरधारी घर आ गया, पर उसका शरीर इतना निर्बल हो गया था कि दो कदम चलना भी दूभर था. बची-खुची तनख्वाह से किसी प्रकार महीने भर की डोर तो द्रौपदी ने लपेट ली. पर अगले दिन का हर उगता सूरज अब समस्याओं का जाल बन उसके सम्मुख था. अच्छी खुराक न मिल पाने के कारण गिरधारी के दुर्बल शरीर को मियादी बुखार ने घेर लिया. कुछ दिन तक रिश्तेदारों और परिचितों से कुछ उधार मांग कर काम चलाया द्रौपदी ने, पर अर्थाभाव के गड्ढे में सिसकती उस गरीब बस्ती में ऐसा धन्ना सेठ भी कौन था, जो अपनी तिज़ोरी का मुंह द्रौपदी की ओर किए रहता.

पति का बुखार से भभकता चेहरा द्रौपदी के दिल में अंगारे भर देता और बेटे की भूख उसकी ममता को कोंच-कोंच कर रुलाती. हार कर काम की तलाश में अपनी देहरी लांघ ली उसने, पर भाग्य तो उसके पैरों में विष भरे नाग-सा लिपटा था. झुग्गी झोपड़ी की उस दुनियां में जहां हर हाथ पर छपी कुछ खुरदरी रेखाएं आप अपनी कहानी कह रही थीं. द्रौपदी की चिकनी हथेली को कौन पनाह देता? और दूर बसी धनी वर्ग की कॉलोनी में उसके परिचय पर अजनबीपन की गंध शिकारी कुत्तों सा दिखा. सूंघ उसे मिथ्यारोपों की छड़ी से खदेड़ उतर आई.

एक शाम झमाझम बरसते पानी के बीच जब ज्वर से तपते पति और भूख से बेहाल बच्चे की ममता ने उसे परचूनी की दुकान के बनिए के आगे गिड़गिड़ा कर अपना दामन फैलाने पर विवश कर दिया तो उसने भी दो टूक शब्दों की लाठी से प्रहार कर दिया, "हमारे यहां खैरात नहीं बंटती बन्नो... एवज में कुछ देने को हो तो बता."

"देने को तो अब कुछ नहीं बचा लालाजी... पर चार दिन से घर में चूल्हा नहीं जला. बेटे का बापू ताप से अचेत पड़ा है और बेटा..." बच्चे का सुखा चेहरा ध्यान में आते ही वह फफक कर रो पड़ी.

"अरे रोती क्यों है तू, चाहे तो तेरी हर मुश्किल आसान हो जाए."

पानी की तेज बौछार पड़ी तो गीली साड़ी में सिमटते उभारों से लाला की दृष्टि भीग उठी.

"मैं... चाहूं... तो?" अनभिज्ञ स्वर पुरुष की आंखों की चमक पड़ते ही धीमा हो गया.

"दो घंटे के पूरे पचास रुपए दूंगा." इधर-उधर दृष्टि को चौकन्ना कर फुसफुसाहट के साथ ही पीले दांतों की बत्तीसी कानों की कोर तक लम्बी हो गई.

पर तड़ाक...भीगे सुर्ख गाल जैसे तमाचा मार दिया लाला ने, अपमान के दर्द से बिलबिला उठी द्रौपदी.

"ख़बरदार लाला जो आगे तूने बात भी की. इज्ज़त पर आंच आने से पहले मर जाना बेहतर समझूंगी." हिसक शेरनी ज़ख़्मों की पीड़ा से बिफर उठी.

"जा... जा..." लाला के स्वर में हार की खिसियाहट उतर गई.

"देखी है तुझ जैसी इज़्ज़त वाली. जब खसम और बेटा भूख से तड़प के मर जाएं तो इसी इज़्ज़त को गठरी में सहेज लेना... वह तो तुझ पर दया करके मैंने कह दिया... वर्ना तेरी जैसी..."

आगे कुछ सुनने से पहले ही भाग चली द्रौपदी. मन कर रहा था दौड़ कर गिरधारी के सीने में मुंह छिपा कर फूट-फूट कर रो दे, पर घर की देहरी पर पैर रखते ही भीतर से आते बंटी के स्वर ने उसे वहीं रोक दिया.

"बापू, मां सच में खाना लाएगी क्या? मुझे बहुत भूख लगी है." स्वर रुलाई से भी अधिक करुण था.

"आज तेरी मां तेरे लिए ज़रूर खाना लाएगी, उसे कोई न कोई काम ज़रूर मिल जाएगा." बापू ने दिलासे की थपकी दी.

"सचमुच बापू?" भोली दपदपाती आंखों में आशा और विश्वास के कितने ही दिए जल उठे तो दरवाज़े की झिरी से देखकर कांप उठी द्रौपदी.

भीतर खाली हाथ जा कर बेटे की आंखों में जलते प्रकाश पर कैसे फूंक मार कर अंधेरा साया फैला दे, नन्ही उम्मीदों पर निराशा की सर्द ओस का पाला कैसे डाल दे वह, लड़खड़ाते पैर लौट पड़े और बहकते कदम कब और कैसे बाज़ार की ओर उठ गए, उसके होश से परे था...

पर फुटपाथ पर गुज़रते हुए कोई स्वर उसको छू कर निकलते हुए उसके कान में फुसफुसाया, "चलेगी मेरे साथ पूरे पचास रुपए दूंगा." तो क्रूर यथार्थ में लौटी चेतना को हज़ार डंक एक साथ चुभ गए.

क्या चरित्र की सीढ़ी पर वह इतना नीचे उतरी दिखाई देती है... पर उस नादान को क्या ख़बर थी कि वासना के लोलुप गिद्ध तो केवल विपन्नता और बेबसी का नंगा तांडव उसके चेहरे पर देख उसकी युवा देह को गिरवी रखने का षडयन्त्र कर रहे थे. इससे पूर्व कि वह प्रत्युत्तर में कुछ सोचती उसका पीछा करता हुआ बंटी का स्वर ज़ेहन में चीत्कार कर उठा और अगले ही पल वह अजनबी के पीछे एक गली में मुड़ रही थी.

"कहां मिली है नौकरी?"

खाना और दवा लेकर द्रौपदी जब घर पहुंची तो पति-पुत्र के स्वर ख़ुशियों की लय पर नृत्य कर उठे, पर द्रौपदी रात में ही कई बार रगड़ कर स्नान करने के बाद भी रात्रि भर अपने शरीर पर लिपटे लिजलिजे कीड़ों का एहसास कर जागती रही. गिरधारी को उसने बता दिया था कि नई कॉलोनी में बस शाम को तीन-चार घंटे के काम की उसे नौकरी मिल गई है. मेमसाब के बाहर जाने के पश्चात उनके बच्चों की देखभाल करनी है पगार अच्छी देगें.

और तब से आज तक द्रौपदी बिकती आ रही है. अपने जज़्बातों को नीलाम कर वह गिरधारी की दवा ख़रीदती है और अपनी पीड़ाओं का मोल-तोल कर वह बेटे के लिए खाना जुटाती है. दर्द के उन बिखरे क्षणों में भी एकाएक उसके सूखे अधरों पर हंसी की हल्की रेखा खिंच गई, पता नहीं मां-पिता ने क्या सोच कर उसका नाम द्रौपदी रखा था.

घर की स्थिति अब सामान्य होती जा रही थी. गिरधारी के पीले मुख की चपलता फिर अंगड़ाइयां ले उठीं, पर अचानक ही समय की गति एक तूफ़ान से लड़खड़ा कर उलट-पुलट हो उठी.

मुंबई से गिरधारी का कोई पुराना मित्र एक अरसे बाद शहर आया था, पर गिरधारी से भेंट की गंगा-जमुना अभी थमी भी न थी कि द्रौपदी के उदास मुख पर अमावस की कालिमा छा गई- यह तो वही है जो कल रात को...

सत्यवादी हरिश्चन्द्र की औलाद उस मित्र ने भी मित्रता का पूरा दायित्व निभाया और उस पूरी रात द्रौपदी बैसाखियों के कुन्दे की मार से तड़पती बिलखती रही.

दूसरे दिन से उसे घर पर रहने की कड़ी ताकीद कर गिरधारी काम की तलाश में घर से निकलने लगा, पर हर बीती सांझ घर लौटे गिरधारी की आंखों में धुंधलकों से लिखी अधूरी इबारत देख द्रौपदी बिना कुछ पूछे हो समझ जाती है.

"क्या करूं जहां जाता हूं यह बैसाखी मेरे और काम के बीच दीवार बन जाती है. एक दिन टूटे स्वर में पति ने कहा तो द्रौपदी तड़प उठी. पति का निराश स्वर उसे भीतर तक झकझोर गया.

"तू‌ कोई अपना धंधा क्यों नही कर लेता?"

"पागल हुई है धंधे के लिए पैसा चाहिए वह कहां से लाऊं?" गिरधारी चिड़चिड़ा उठा.

"मेरी समझ से तो तू पहले बूट पालिश का धंधा कर ले. बीस-पच्चीस रुपए में काम चल जाएगा उतने का जुगाड़ तो किसी तरह कर ही सकता है तू." पर द्रौपदी की सोच बारूद के पलीते में चिंगारी बन गई.

"मैं जूता पालिश करूंगा? पहले ही तूने कौन सी इज़्ज़त रखी है जो बची-खुची भी..." अपमान के उल्टे थप्पड़ से द्रौपदी आहत तो हुई पर मौन रहना ही श्रेयस्कर था.

महीना बीतने को था पर गिरधारी की नौकरी का कोई अता-पता न था. रसोईघर के डिब्बे तली दिखाने लगे और हवाओं में खालीपन की गंध भर गई. गिरधारी की मुखाकृति पर रेखाओं के उतार-चढ़ाव परिवर्तित होते रहे और एक शाम जब उसने द्रौपदी से कहा, "काम बन गया है साझा व्यापार है, बस तेरी मदद की ज़रूरत है." तो असमंजस की सीढ़ियों पर भी प्रसन्नता दबे पांव चढ़ गई.

दूसरे दिन द्रौपदी को अच्छी तरह तैयार रहने को कह गिरधारी तीसरे प्रहर घर से निकल गया. पर पति की सफलता की मनौतियां मन में गुनगुनाती पत्नी के स्वर शाम के गहरे धुंधलके में द्वार पर पड़ी थाप के साथ ही ख़ामोश हो गए. रेशमी धोती कुर्ता, गले में मोटी चेन, मोटी काली उंगलियों में रत्न जड़ित मुंदरियां, चेचक भरे चेहरे पर लपलपाती मुस्कान, यह धनाड्य कंगाल गिरधारी के साथ कौन-सा साझा व्यापार करेगा? कहीं, नशीली दवा या तस्करी का धंधा तो नहीं? अब तक सुनी सुनाई बातों के अंश मस्तिष्क में मौक़ा पाते ही एकजुट हो गए- नहीं वह किसी भी क़ीमत पर पति को इस गड्‌डे में नहीं गिरने देगी चाहे इसके लिए उसे जान की बाज़ी ही क्यों न लगा देनी पड़े.

यह भी पढ़ें: पति की हर बात मानना नहीं है ज़रूरी, इन 7 बातों को मानने से करें इनकार (It is not necessary to agree to everything your husband says, refuse to agree to these 7 things)

"द्रौपदी इधर तो आ... अरे इनसे क्या शरमाना, यह तो अपने सेठ जी हैं." कमरे से गिरधारी का चाशनी में डूबा स्वर उभरा तो पल भर को वह संकुचित हो उठी. इतना बड़ा सेठ इस टूटी-फूटी झोपड़ी में... पर भीतर जाकर उस बड़े की दृष्टि को तराज़ू में अपने जिस्म की हर बोटी तुलती देख उसने अपनी शंका पर निर्णय की मुहर लगा दी, यह व्यक्ति अच्छा नहीं, इसका साथ गिरधारी के हित में नहीं.

"तू जा अब." गिरधारी ने आंख से इशारा किया तो द्रौपदी पलट गई. पर कमरे की देहरी लांघते कदम हवा में सड़ांध का एहसास कर वहीं थम गए.

"माल तो चोखा है." सेठ का स्वर लपलपाया. द्रौपदी ने उत्सुकतावश भिड़े दरवाज़े की झिरी से आंख लगा दी, किस माल की बात कर रहा है यह?

"मैंने तो पहले ही कहा था सेठ, खरा सोना है अब लाओ मेरा एडवांस." होंठों पर भद्दी मुस्कुराहट ओड़ गिरधारी ने हाथ फैला दिया तो द्रौपदी का पांव जैसे अंगारे पर पड़ गया. तो यह सोने की तस्करी कर रहा है... पलभर में ही जेल की यातनाओं से ले कर फांसी का फंदा तक उसके सम्मुख नाच उठा.

मुट्ठी में दबे नोट अंटी में ठूंस बैसाखी के सहारे कमरे से बाहर निकलते गिरधारी की दृष्टि दरवाजे से चिपकी द्रौपदी को देख झेंप से नीची हो गई. हकलाते हुए बोला, "मैं बेटे को लेकर बाहर जा रहा हूं... तू तब तक सेठ..."

आंधी के प्रचंड झोंके से बची चादर गिर गई. उस पार गिरधारी नग्न खड़ा था! कांप कर द्रौपदी ने आंखें बंद कर ली. पति का यह कौन सा रुप था. अभी तो बदन में बैसाखी के मार के घाव भी नहीं सूखे थे.

"तो... तू... मेरा सौदा... करने  का... धन्धा... करेगा?" अविश्वास की चोट से अधर कांप उठे.

"अब तू कौन सी सती सावित्री बची है? फिर घर में किसी को कानों कान ख़बर भी नहीं होगी." बेशर्म हंसी के बगुलों से वह अपनी झेंप उड़ा कर बोला.

द्रौपदी के हृदय में इतने अरसे से चुभे कांटे को कुरेद कर बजाय बाहर निकालने के बीच में ही तोड़ दिया गिरधारी ने. कनी तरकने से भीतर सब कुछ लहू लुहान हो उठा पर थक्का बाहर गिरने से पहले ही बंद होंठों से लहू पी गई द्रौपदी.

गिरधारी आधी रात के क़रीब सोते बंटी को कंधे पर डालकर किसी तरह लौटा था पर तब तक द्रौपदी के भीतर का हर एहसास किरच-किरच हो कर बिखर चुका था.

दूसरी सांझ रेशमी अंधेरे लपेटे कोई गिरधारी के साथ फिर आया. पर आज भूखी आंखों से टपकती लोलुपता को द्रौपदी मुस्कुरा कर पी गई तो गिरधारी के चेहरे पर भी संतोष की रेखाएं बन बिगड़ गई.

"एडवांस!" मोटी आंखों में स्वीकृति के चिह्न मिलते ही गिरधारी ने बैसाखी कांख के नीचे दबा हाथ फैला दिया पर हथेली खाली ही रह गई. सेठ के हाथ से निकले नोट तो द्रौपदी की मुटठी में कब के बंद हो चुके थे.

"अरे, ऐसे दीदे फाड़-फाड़ कर क्या देख रहा है?" गिरधारी की हैरत और क्रोध से चौड़ाई आंखों के पीछे पुरुष का घायल अहम् और मर्द के अधिकार की ठनक द्रौपदी को साफ़ नज़र आ गई.

"पैसे इधर ला." शांत स्वर में भी जैसे लबालब लावा भरा था.

"ले..."‌ काग़ज़ के एक नोट को लापरवाही से उसकी ओर उछाल दिया द्रौपदी ने.

"ये तेरा हिस्सा है... दलाली के...‌ इज़्ज़तदार..."

"धंधे का..." शब्दों को बुरी तरह चबा लिया उसने.

"और सुन... पत्नी के अस्तित्व के लिए मुझे तेरी ज़रूरत थी इसलिए तन बेच कर भी तुझे खिलाया पिलाया पर आज... अपनी इज़्ज़त की आड़ में... तू मुझे जिस बाज़ार में बैठा रहा है वहां मुझे तेरी ज़रूरत नहीं... उसके लिए तो मेरे बदन का गोश्त ही काफ़ी है... आज से तू मेरा पति नहीं... दलाल है... सिर्फ़ दलाल." पैसे अंगिया में ठूंस गले में पड़े दुपट्टे को बिछे पलंग पर लापरवाही से फेंकती हुई द्रौपदी हैरान खड़े गिरधारी की ओर देख किसी पेशेवर अंदाज़ में हो होकर हंस पड़ी.

पर उसकी हंसी करुण विलाप से भी अधिक भयानक थी. सुहाग की चूड़ियों के ढेर सारे पैने टुकड़े उसके हृदय में धंस गए थे.

- मंजू सक्सेना

अधिक कहानियां/शॉर्ट स्टोरीज़ के लिए यहां क्लिक करें – SHORT STORIES