August 6, 2026

SC-ST में आर्थिक आधार पर आरक्षण मांग रहे गरीबों पर केंद्र ने भारी जुर्माना का अनुरोध किया

नई दिल्ली, 6 अगस्त 2026: जातिगत आरक्षण में क्रीमी लेयर की मांग कर रहे याचिकाकर्ताओं पर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना जवाब दाखिल किया। इसमें केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया है कि इस प्रकार की याचिका लगाने वालों पर भारी जुर्माना लगाया जाए। उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई है जिसमें कहा गया है कि, जातिगत आधार पर जो आरक्षण व्यवस्था है उसमें क्रीमी लेयर का प्रावधान किया जाना चाहिए। इसका मतलब हुआ कि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के उन युवाओं को आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए जो गरीब है। आरक्षित जातियों के अमीरों को आरक्षण का लाभ नहीं दिया जाना चाहिए।

देश के लाखों युवा एक ही सुर में आवाज उठा रहे हैं, आरक्षण का आधार जाति नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिति होनी चाहिए। युवाओं का तर्क है कि शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ केवल उन गरीब परिवारों को मिलना चाहिए जिन्हें वास्तव में इसकी आवश्यकता है, ताकि संपन्न लोग इसका अनुचित लाभ न उठा सकें। इस बढ़ते आंदोलन और जन-आक्रोश के बीच, केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना रुख स्पष्ट कर दिया है, जो इस बहस को एक नया मोड़ दे सकता है। 

'क्रीमी लेयर' लागू करने का विरोध 

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया है कि वह उस याचिका का कड़ा विरोध करती है जिसमें SC, ST, OBC और EWS आरक्षण के भीतर "क्रीमी लेयर" जैसी आय-आधारित प्राथमिकता तय करने की मांग की गई थी। सरकार का तर्क है कि 'क्रीमी लेयर' को आरक्षण के लाभ से बाहर रखने का सिद्धांत अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) पर लागू नहीं होता है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि आरक्षण की सूचियों में बदलाव करना पूरी तरह से संसद का अधिकार है। 

अनुच्छेद 341 और 342 के तहत SC/ST की सूचियों में केवल संसद ही बदलाव कर सकती है, अदालतें नहीं। 

इसी तरह, सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (OBCs/SEBCs) की केंद्रीय सूची में किसी भी प्रकार का संशोधन या किसी समूह को बाहर करने का कार्य केवल संसद द्वारा पारित अधिनियम के माध्यम से ही किया जा सकता है। राज्य सरकारों, अदालतों या ट्रिब्यूनल के पास इन सूचियों को संशोधित, संशोधित या परिवर्तित करने का कोई अधिकार नहीं है। हालाँकि, राज्य और केंद्र शासित प्रदेश अपनी स्वयं की पिछड़े वर्गों की सूची रख सकते हैं। 

न्यायिक दायरे से बाहर है नीति निर्धारण 

केंद्र सरकार ने इस बात पर भी जोर दिया है कि याचिकाकर्ता द्वारा नीति बनाने के लिए अदालती आदेश (mandamus) की मांग करना न्यायिक दायरे से बाहर है। सरकार का मानना है कि नीति निर्माण का कार्य विधायिका और कार्यपालिका का है। इसी आधार पर सरकार ने इस याचिका को भारी जुर्माने (exemplary costs) के साथ खारिज करने की मांग की है। 

जहाँ एक तरफ देश का युवा वर्ग आर्थिक समानता के लिए आरक्षण के मानदंडों को बदलने की मांग कर रहा है, वहीं केंद्र सरकार का यह कड़ा रुख दर्शाता है कि वह वर्तमान संवैधानिक ढांचे और जाति-आधारित आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था को बनाए रखने के पक्ष में है। अब देखना यह है कि सुप्रीम कोर्ट इस संवेदनशील मुद्दे पर क्या निर्णय लेता है और युवाओं का यह आंदोलन भविष्य में क्या रुख अपनाता है।