October 2, 2026

Prem Keetanu Review: ‘प्रेमालु’ वाली फील या सिर्फ पुराना रोमांस, वीर पहाड़िया की ‘प्रेम कीटाणु’ में कितना दम?

Prem Keetanu Review: कॉलेज का पहला दिन, पहली नजर की दुश्मनी, दोस्तों के साथ बेवकूफियां और फिर कब वही लड़ाई मोहब्बत में बदल जाती है, पता ही नहीं चलता. ‘प्रेम कीटाणु’ इसी पुराने लेकिन हमेशा पसंद आने वाले फॉर्मूले को लेकर आती है. अगर आपने ‘प्रेमालु’ जैसी यंग और फ्रेश रोमांटिक कहानी देखी है, तो आपको अंदाजा होगा कि फिल्म किस मिजाज की है. फर्क बस इतना है कि यहां कहानी बनारस से दिल्ली तक घूमती है और प्यार के साथ दोस्ती, करियर की टेंशन और दिल टूटने का दर्द भी पैकेज में मिलता है.

कैसी है यह फिल्म और दर्शकों पर कैसा जादू चला पाती है, जानने के लिए पढ़ें हमारा रिव्यू...

पहली मुलाकात में प्यार नहीं, सीधा पंगा

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फिल्म की कहानी विशाल (वीर पहाड़िया) की है, जिसे पढ़ाई से खास लेना-देना नहीं है. बनारस इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी में पहले दिन उसकी मुलाकात सुहानी शर्मा (अफिया सैयद) से होती है. पहली नजर में प्यार तो दूर, दोनों के बीच ऐसा पंगा होता है कि चार साल तक सिंगल रहने की चुनौती तक दे डालते हैं. लेकिन कॉलेज लाइफ और दिल के मामले में प्लानिंग कहां चलती है.

समय दोनों को अलग कर देता है. सुहानी बेहतर कॉलेज में एडमिशन लेकर दिल्ली चली जाती है और बाद में एक सॉफ्टवेयर कंपनी में कैंपस प्लेसमेंट के जरिए अच्छी नौकरी हासिल कर लेती है. वहीं विशाल अभी भी अपनी जिंदगी और करियर को लेकर उलझा हुआ है. आगे की पढ़ाई के लिए अमेरिका जाने का सपना है, लेकिन वीजा के लिए बैंक अकाउंट में 5 लाख रुपये दिखाने हैं. नौकरी की तलाश उसे फिर सुहानी तक ले आती है और यहीं से पुरानी कहानी में नया ट्विस्ट आता है. इस बार दोनों के बीच लड़ाई कम और नजदीकियां ज्यादा हैं, लेकिन सुहानी का बॉस रंजीत (अपारशक्ति खुराना) इस कहानी में तीसरा एंगल लेकर आ जाता है.

जहां फिल्म दिल जीतती है

मेरे हिसाब से ‘प्रेम कीटाणु’ की सबसे बड़ी ताकत इसकी सादगी है. फिल्म अपने किरदारों को जरूरत से ज्यादा महान या फिल्मी बनाने की कोशिश नहीं करती. ये ऐसे लड़के-लड़की हैं, जिन्हें आप अपने कॉलेज, दोस्तों या शायद अपनी ही पुरानी जिंदगी में पहचान सकते हैं. कॉलेज की नोंकझोंक, दोस्तों की गंदी-मजेदार बातें, छोटी-छोटी लड़ाइयां और प्यार को लेकर कन्फ्यूजन फिल्म को काफी रिलेटेबल बनाते हैं.

खासकर लड़कों की दोस्ती वाले हिस्से फिल्म में जान डालते हैं. उनके बीच की चुहलबाजी और शरारती मजाक कई जगह हंसा देते हैं. अच्छी बात ये है कि कॉमेडी जबरदस्ती ठूंसी हुई नहीं लगती. फिल्म धीरे-धीरे मस्ती से इमोशनल जोन में जाती है और यहीं पर कहानी को थोड़ा वजन मिलता है.

प्रेम कीटाणु फिल्म का एक सीन

वीर पहाड़िया विशाल के किरदार में ठीक-ठाक से बेहतर नजर आते हैं. ‘स्काई फोर्स’ के बाद उनका यह बिल्कुल अलग अवतार है और हल्के-फुल्के सीन में उनकी स्क्रीन प्रेजेंस अच्छी लगती है. हालांकि इमोशनल हिस्सों में उनसे थोड़ी और गहराई की उम्मीद रहती है. अफिया सैयद भी सुहानी के किरदार में अच्छी लगती हैं. दोनों की केमिस्ट्री फिल्म का मजबूत पक्ष है और उनका रिश्ता बहुत जल्दबाजी में आगे बढ़ता हुआ नहीं लगता. दोनों ने ही एक्टिंग करियर की शुरुआत की है, वो अभी अभिनय में कच्चे हैं, लेकिन बड़ी बात यह है कि यही कच्चापन इस फिल्म की कहानी के लिहाज से सटीक बैठता दिखता है. 

और फिर आते हैं अपारशक्ति खुराना. काफी समय बाद बड़े पर्दे पर उन्हें देखकर अच्छा लगता है. किरदार चाहे जैसा हो, अपारशक्ति अपनी मौजूदगी दर्ज कराने का हुनर जानते हैं. रंजीत के किरदार में भी वह यही करते हैं.

लेकिन हर चीज ‘प्रेम’ जैसी परफेक्ट नहीं

फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी भी वही है जो इसकी ताकत है. सादगी कई जगह कहानी को प्रेडिक्टेबल बना देती है. आपको कई मोड़ पहले से समझ आने लगते हैं कि अब क्या होने वाला है. रोमांस से इमोशनल ड्रामा की तरफ जाते हुए फिल्म की रफ्तार भी कुछ जगह लड़खड़ाती है.

खासकर सेकंड हाफ में कहानी अपने इमोशनल कॉन्फ्लिक्ट को बनाने में थोड़ा ज्यादा समय लेती है. हालांकि बाद में चीजें संभलती हैं और क्लाइमैक्स तक पहुंचते-पहुंचते फिल्म अपनी भावनात्मक पकड़ वापस हासिल कर लेती है. सपोर्टिंग कास्ट भी बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं करती और कुछ हिस्से ऐसे हैं जिन्हें थोड़ा छोटा किया जाता तो फिल्म और चुस्त लग सकती थी.

प्रेम कीटाणु फिल्म का एक सीन

गाने और रंगीन दुनिया बढ़ाते हैं कॉलेज वाला फील

‘प्रेम कीटाणु’ देखने में काफी कलरफुल है. कॉलेज का माहौल, लोकेशन, कोरियोग्राफी और सिचुएशनल गाने फिल्म के यंग वाइब को बनाए रखते हैं. ‘कहो तो’, ‘तू मेरा रैय्यो’ और ‘इश्क का गुलाम’ जैसे गाने कहानी के रोमांटिक मूड के साथ फिट बैठते हैं. कुछ गानों पर थिएटर में गुनगुनाने का मन भी कर सकता है.

डायरेक्टर अपूर्व सिंह कार्की ने फिल्म को बहुत भारी बनाने के बजाय इसे आसान और यूथफुल रखने की कोशिश की है. स्क्रिप्ट में नयापन बहुत ज्यादा नहीं है, लेकिन किरदारों की आपसी केमिस्ट्री, डायलॉग और ह्यूमर फिल्म को खींचते रहते हैं.

देखें या छोड़ दें?

मेरा मानना है कि ‘प्रेम कीटाणु’ कोई ऐसी फिल्म नहीं है जो रोमांस का नया अध्याय लिखने वाली हो. लेकिन हर फिल्म को क्रांति करने की जरूरत भी नहीं होती. यह पहली मोहब्बत, दोस्तों की बेवकूफियों, करियर की उलझनों और दिल टूटने के उस दौर को पकड़ती है, जिससे बहुत से लोग कभी न कभी गुजर चुके हैं.

अगर आपको हल्की-फुल्की कॉलेज रोमांस वाली फिल्में पसंद हैं और इस छुट्टी वाले वीकेंड पर कुछ ज्यादा दिमाग लगाए बिना प्यार, दोस्ती, कॉमेडी और थोड़े इमोशनल ड्रामे का पैकेज देखना है, तो विशाल-सुहानी के साथ डेट फिक्स की जा सकती है। हां, अगर आप कहानी में बहुत ज्यादा नयापन और ट्विस्ट की तलाश में हैं, तो यह फिल्म आपको थोड़ी जानी-पहचानी लग सकती है.

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