58 मिनट पहले
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RBI की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी की तीन दिन की मीटिंग आज यानी 5 अक्टूबर से शुरू होगी। एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस बार रिजर्व बैंक रेपो रेट में 0.25% की बढ़ोतरी कर सकता है।
अगर ऐसा होता है, तो फरवरी 2023 के बाद रेपो रेट में होने वाली यह पहली बढ़ोतरी होगी, जिससे रेपो रेट 5.25% से बढ़कर 5.50% पर पहुंच जाएगी। इस मीटिंग में लिए गए फैसलों की जानकारी 7 अक्टूबर को RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा देंगे।
2025 में 1.25% कटौती के बाद लगातार 4 बैठकों में स्थिर थी दरें
रिजर्व बैंक ने वर्ष 2025 में 4 बार में रेपो रेट में 1.25% की। इससे रेपो रेट 6.50% से घटकर 5.25% पर आ गई। वहीं 2026 में हुई अब तक चार बैठकों में रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं हुआ है।

त्योहारी सीजन में ग्राहकों की जेब और लोन पर पड़ेगा असर
अक्टूबर की यह बैठक देश के पीक फेस्टिव सीजन के दौरान हो रही है। इस दौरान ऑटोमोबाइल्स, इलेक्ट्रॉनिक्स और हाउसिंग सेगमेंट में क्रेडिट यानी लोन की मांग ज्यादा रहती है।
अगर RBI रेपो रेट में 0.25% की बढ़ोतरी करता है, तो बैंकों की एक्सटर्नल बेंचमार्क लेंडिंग रेट्स (EBLR) तुरंत बढ़ जाएंगी। इससे नए लोन महंगे हो जाएंगे और मौजूदा होम लोन व ऑटो लोन के ग्राहकों की EMI बढ़ सकती है, जो त्योहारी सीजन में उपभोक्ता मांग को प्रभावित कर सकती है।

रेपो रेट क्या है और इसका आपसे क्या संबंध है?
- रेपो रेट क्या है? रेपो रेट वह दर है जिस पर देश का केंद्रीय बैंक यानी RBI देश के बैंकों को पैसा उधार देता है।
- बढ़ोतरी से क्या होगा? रेपो रेट बढ़ते ही बैंकों के लिए RBI से कर्ज लेना महंगा हो जाता है। बैंक इस लागत का बोझ ग्राहकों पर डालते हैं, जिससे होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन की ब्याज दरें/ईएमआई बढ़ जाती हैं।
- FD पर असर: लोन महंगा होने के साथ-साथ बैंक जमाकर्ताओं को आकर्षित करने के लिए FD दरों में भी बढ़ोतरी कर सकते हैं।
रिजर्व बैंक रेपो रेट बढ़ाता और घटाता क्यों है?
रेपो रेट महंगाई से लड़ने का टूल है। जब महंगाई ज्यादा होती है, तो सेंट्रल बैंक इसे बढ़ाकर इकोनॉमी में मनी फ्लो कम करने की कोशिश करता है। पॉलिसी रेट ज्यादा होगी तो बैंकों को सेंट्रल बैंक से मिलने वाला कर्ज महंगा होगा। बदले में बैंक ग्राहकों के लिए लोन महंगा कर देते हैं। इससे इकोनॉमी में मनी फ्लो कम होता है। मनी फ्लो कम होने पर डिमांड घटती है और महंगाई कम हो जाती है।
जब इकोनॉमी बुरे दौर से गुजरती है, तो रिकवरी के लिए मनी फ्लो बढ़ाने की जरूरत पड़ती है। ऐसे में सेंट्रल बैंक पॉलिसी रेट कम कर देता है। इससे बैंकों को सेंट्रल बैंक से मिलने वाला कर्ज सस्ता हो जाता है और ग्राहकों को भी सस्ती दर पर लोन मिलता है।
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