October 18, 2026

ग्लैमर से परे, अपनी शर्तों पर किया काम; हिंदी सिनेमा की 'मर्दानी' Rani Mukerji के सफर पर एक नजर - rani mukerji 30 years in bollywood mardaani actress journey awards all you need to know

रानी मुखर्जी ने हिंदी सिनेमा में तीन दशक पूरे किए हैं, जहां उन्होंने अपनी शर्तों पर लीक से हटकर कई दमदार भूमिकाएं निभाईं।

रानी मुखर्जी को मिले चुके हैं कई पुरस्कार

रानी मुखर्जी को मिले चुके हैं कई पुरस्कार

HighLights

  1. रानी मुखर्जी ने हिंदी सिनेमा में 30 साल पूरे किए

  2. निभाया 'मर्दानी' जैसा लीक से हटकर अलग किरदार

  3. आठ फिल्मफेयर और राष्ट्रीय पुरस्कार से हैं सम्मानित

संजीत नार्वेकर, मुंबई। हिंदी सिनेमा में अपनी शर्तों पर तीन दशक बिताना कोई छोटी बात नहीं है, लेकिन रानी मुखर्जी (Rani Mukerji) ने इसे कर दिखाया है। आज दुनिया उन्हें मर्दानी (Mardaani) सीरीज की जांबाज पुलिस अफसर शिवानी शिवाजी राय जैसी जबर्दस्त भूमिकाओं से पहचानती है।

साल 1996 में किया था डेब्यू

मगर इस सफलता के पीछे एक ऐसी साहसी अभिनेत्री छिपी है, जिसने अधिकतर लीक से हटकर चौंकाने वाले रोल चुने। आज से 30 साल पहले 18 अक्टूबर 1996 को प्रदर्शित अपनी पहली ही फिल्म 'राजा की आयेगी बारात' में उन्होंने एक ऐसी लड़की का दर्द जिया, जिसे अपने बलात्कारी से शादी करनी पड़ती है। वहीं अइय्या में वह एक ऐसी प्रेम दीवानी बनीं, जो सिर्फ खुशबू के अहसास पर अपना दिल हार बैठती है।

Rani (4)

इसके बाद हिचकी में टारेट सिंड्रोम से जूझती टीचर बनकर उन्होंने दिखाया कि कमजोरियों को ताकत कैसे बनाया जाता है। नो वन किल्ड जेसिका से तलाश तक ऐसे किरदारों की सूची बहुत लंबी है, मगर निर्देशक से लेकर दर्शक तक भरोसा एक कि रानी है तो मुमकिन है!

नामचीन परिवार से है रानी का नाता

फिल्मी परिवार की विरासत रानी के खून में सिनेमा दौड़ता है। वह झांसी के नामचीन मजिस्ट्रेट रवींद्र मोहन मुखर्जी के पोते और निर्देशक राम मुखर्जी की बेटी हैं। उनके बड़े पापा शशधर मुखर्जी ने बांबे टाकीज और फिल्मिस्तान जैसे ऐतिहासिक स्टूडियोज की नींव रखी थी, जिन्होंने भारतीय सिनेमा का सुनहरा दौर गढ़ा। उनके पिता ने दिलीप कुमार को लेकर सुपरहिट फिल्म लीडर बनाई थी।

सुपरस्टार काजोल उनकी चचेरी बहन हैं। इतनी बड़ी फिल्मी विरासत होने के बाद भी रानी इस दुनिया में कदम नहीं रखना चाहती थीं। वह अक्सर कहती थीं, घर में पहले से ही इतनी अभिनेत्रियां हैं, मुझे कुछ अलग करना है। लेकिन मां कृष्णा मुखर्जी की मनुहार के आगे उन्हें झुकना पड़ा और उन्होंने अभिनय को महज एक प्रयोग की तरह शुरू किया।

Rani (5)

चॉकलेटी हीरोइन से आगे

शुरुआती सफर आसान नहीं था। उनकी पहली फिल्म बाक्स आफिस पर कोई खास कमाल नहीं दिखा सकी। पहचान मिली विक्रम भट्ट की गुलाम से, जिसमें आती क्या खंडाला गाने ने उन्हें रातों-रात हर दिल अजीज बना दिया, हालांकि वह पूरी तरह आमिर खान की फिल्म थी। इसके बाद करण जौहर की ब्लाकबस्टर फिल्मों कुछ कुछ होता है और कभी खुशी कभी गम ने उन्हें सफलता का स्वाद चखाया।

फिर तो चलते चलते, हम तुम और वीर-जारा जैसी फिल्मों ने उन्हें हिंदी सिनेमा की रोमांटिक क्वीन बना दिया। मगर रानी सिर्फ पेड़ों के इर्द-गिर्द नाचने वाली पारंपरिक हीरोइन बनकर खुश नहीं रहने वाली थीं। उनके भीतर का कलाकार कुछ और ही तलाश रहा था।

हर रोल में दिखाया दम

साल 2000 में आई बादल, बिच्छ और कमल हासन की हे राम जैसी फिल्मों से रानी ने साफ कर दिया कि वह पुरुषों के वर्चस्व वाली एक्शन फिल्मों में भी धाक जमा सकती हैं। इसके बाद मणिरत्नम की राजनीतिक थ्रिलर युवा में एक प्रताड़ित पत्नी का किरदार हो या संजय लीला भंसाली की ब्लैक में हेलेन केलर से प्रेरित एक मूक-बधिर लड़की का जीवंत अभिनय, रानी ने हर रोल में दर्शकों को झकझोरा।

Rani (6)

उन्होंने बहुत ही संजीदगी से व्यावसायिक सिनेमा के ग्लैमर और समानांतर सिनेमा की गहराई के बीच संतुलन बनाया। दिल बोले हड़िप्पा में क्रिकेट खेलने की खातिर लड़के का भेष बदलना हो, या तलाश में एक ऐसी मां का दर्द जीना हो जो अपने मासूम बच्चे की मौत के सदमे से उबर नहीं पाती-रानी ने हर रूप में खुद को ढाला। हालांकि इनमें से कई फिल्में टिकट खिड़की पर नाकाम रहीं, लेकिन रानी के किरदारों की धार कभी कम नहीं हुई।

परदे पर दमदार वापसी

उनके इस सिनेमाई सफर का सबसे चमकीला पड़ाव था साल 2014 में आई मर्दानी। इसमें उन्होंने मुंबई पुलिस की सीनियर इंस्पेक्टर शिवानी शिवाजी राय बनकर अपराधियों के छक्के छुड़ा दिए। इस ऐतिहासिक कामयाबी के बाद, रानी ने मातृत्व और परिवार को वक्त देने के लिए सिनेमा से दूरी बना ली। यह उनके पति और फिल्म निर्माता आदित्य चोपड़ा थे, जिन्होंने रानी के भीतर की अभिनेत्री को फिर से जगाया।

चार साल बाद उन्होंने हिचकी से ऐसी धमाकेदार वापसी की कि दुनिया देखती रह गई। मर्दानी की दमदार सीरीज तो थी ही, मिसेज चटर्जी वर्सेज नार्वे में अपने बच्चों के लिए दूसरे देश की सरकार से लड़ जाने वाली मां के किरदार में उन्होंने शानदार अभिनय का नया अध्याय लिख दिया।

मिल चुके हैं 8 फिल्मफेयर

उनके नाम आज आठ फिल्मफेयर पुरस्कार हैं। वह हिंदी सिनेमा इतिहास की इकलौती ऐसी अभिनेत्री हैं, जिन्होंने एक ही साल (2004) में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री और सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री (युवा के लिए) दोनों का फिल्मफेयर पुरस्कार अपने नाम किया।

मिसेज चटर्जी वर्सेज नार्वे के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला तो वहीं इसी साल उन्हें महाराष्ट्र सरकार के प्रतिष्ठित राज कपूर सम्मान से भी नवाजा गया है!

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार तथा फिल्म इतिहासकार हैं)

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