कैंसर दवाओं की बेतहाशा कीमतों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, निजी अस्पतालों को दी सीधी चेतावनी
Supreme Court News: कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की ऊंची कीमतों पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है. अदालत ने केंद्र सरकार और निजी अस्पतालों को फटकार लगाते हुए कहा कि लागत से कई गुना ज्यादा दाम वसूलना बिल्कुल गलत है.
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सांकेतिक तस्वीर Photograph: (File Photo)
Supreme Court News: देश में गंभीर बीमारियों के इलाज का खर्च आम आदमी की कमर तोड़ रहा है. खासकर कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी के इलाज में लगने वाली दवाएं मरीजों के परिवारों को आर्थिक रूप से तबाह कर देती हैं. इसी गंभीर विषय पर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार और देश के बड़े निजी अस्पतालों को आड़े हाथों लिया है. शीर्ष अदालत ने कैंसर दवाओं की असली लागत और बाजार में बिकने वाले अधिकतम खुदरा मूल्य के बीच के भारी अंतर को लेकर गहरी चिंता जताई है. अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि इस मामले में सरकार की तरफ से अब तक कोई ठोस और संतोषजनक जवाब नहीं मिला है, जबकि यह सवाल बार-बार सामने आ रहा है.
दवाओं की कीमतों का भारी खेल
अदालत के सामने जब इस बात का ब्योरा आया कि दवाओं की मूल खरीद कीमत और उनके पैकेट पर छपे दाम में जमीन आसमान का फर्क है, तो पीठ ने तीखी टिप्पणी की. कोर्ट ने सीधे तौर पर पूछा कि आखिर ऐसा क्यों होता है कि जो दवा खुदरा विक्रेताओं या अस्पतालों को केवल 10 या 20 रुपये में मिल जाती है, उसी दवा पर अधिकतम खुदरा मूल्य यानी एमआरपी 100 रुपये दर्ज रहता है. इतना बड़ा अंतर सीधे तौर पर उस आम मरीज पर थोप दिया जाता है जो पहले से ही बीमारी और मानसिक तनाव से जूझ रहा होता है. अदालत ने केंद्र से पूछा कि गैर अनुसूचित दवाओं के मामले में इस तरह की मूल्य निर्धारण व्यवस्था को बनाए रखने की छूट आखिर क्यों दी जा रही है.
संतुलन के दावे पर अदालत की फटकार
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से यह दलील दी गई कि प्रशासन सभी पक्षों के हितों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है. सरकार ने बताया कि कैंसर की दवाओं पर 30 प्रतिशत ट्रेड मार्जिन की सीमा तय की गई है, जो खुदरा विक्रेता की खरीद कीमत पर नहीं बल्कि अधिकतम खुदरा मूल्य पर लागू की जाती है. सरकार के इस तर्क को अदालत ने सिरे से खारिज कर दिया. कोर्ट ने दो टूक कहा कि इस पूरी व्यवस्था में किसी भी तरह का कोई संतुलन दिखाई नहीं देता. जब दवा की मूल लागत से कई गुना ज्यादा दाम वसूले जा रहे हों, तो उसे किसी भी आधार पर संतुलित या न्यायसंगत नहीं माना जा सकता.
निजी अस्पतालों की कमाई पर सीधी बात
सुप्रीम कोर्ट ने निजी अस्पतालों के रवैये पर भी गहरी नाराजगी जाहिर की. अदालत ने कहा कि अस्पताल अपने इलाज, ऑपरेशन और दूसरी सेवाओं के लिए मरीजों से भारी भरकम फीस लेते हैं. लेकिन इन सेवाओं के नाम पर दवाओं की कीमतों को उनकी लागत से सौ या दो सौ गुना बढ़ाकर बेचना पूरी तरह गलत है. पीठ ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि निजी अस्पतालों को अपने संस्थान चलाने के लिए दूसरे उचित रास्तों की तलाश करनी होगी. दवाओं के नाम पर इस तरह से लोगों की मजबूरी का फायदा उठाकर अपना काम चलाने की इजाजत बिल्कुल नहीं दी जा सकती.
अस्पतालों की ओर से पेश की गई दलीलें
निजी अस्पतालों की तरफ से वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने अपना पक्ष रखा. उन्होंने अदालत को समझाने की कोशिश की कि देश की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर मरीजों का भारी दबाव है. ऐसे में निजी अस्पताल इस दबाव को कम करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं. उन्होंने कहा कि अस्पतालों की आय का एक बड़ा हिस्सा स्वास्थ्य बीमा और सरकारी योजनाओं से आता है, जबकि खुद अपनी जेब से भुगतान करने वाले मरीज केवल तीस प्रतिशत के करीब होते हैं. इसके अलावा अस्पतालों को दिन रात बेहतर सुविधाएं और आधुनिक मशीनें चालू रखनी पड़ती हैं, जिस पर बहुत भारी खर्च आता है.
मरीजों की सुरक्षा और इंफ्रास्ट्रक्चर का तर्क
वरिष्ठ वकील ने यह भी तर्क दिया कि अस्पताल मरीजों को बाहर से दवाएं खरीदने की खुली छूट नहीं दे सकते. इसका बड़ा कारण यह है कि बाहर बाजार में नकली या घटिया गुणवत्ता वाली दवाओं का बड़ा खतरा रहता है. इसलिए अस्पताल खुद दवाएं उपलब्ध कराते हैं ताकि मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके. साथ ही उन्होंने दोहराया कि बड़े अस्पतालों का इंफ्रास्ट्रक्चर और संचालन खर्च बहुत अधिक होता है, जिसे पूरा करना जरूरी है.
अदालत का अंतिम संदेश
अदालत ने निजी अस्पतालों के इंफ्रास्ट्रक्चर और चौबीसों घंटे सेवाएं देने के तर्क को तो सुना, लेकिन दवाओं के अंधाधुंध मुनाफे से उसे जोड़ने को पूरी तरह अनुचित बताया. कोर्ट ने साफ कर दिया कि अस्पतालों का खर्च अपनी जगह है, लेकिन उस खर्च की भरपाई दवाओं पर बेहिसाब मुनाफा कमाकर नहीं की जा सकती. लागत से सैकड़ों गुना दाम वसूलना किसी भी तरह से तर्कसंगत नहीं है. अदालत ने सरकार को निर्देश दिया कि वह दवाओं के इस भारी अंतर को खत्म करने और आम लोगों को राहत देने के लिए तुरंत सख्त और प्रभावी कदम उठाए.
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