सिर्फ़ ठहाकों, ताली बजाने, रोज एनिमा लेने और धूप एवं वाष्प स्नान तथा मिट्टी की पट्टियों से हर रोग दूर हो जाए, यह अकल्पनीय लगता है. मगर मिट्टी और पानी से रोग दूर करने की कला में गांधी जी भी माहिर थे. वे लंबे-लंबे उपवास सहज कर लेते. यह अब असंभव लगता है, परंतु यह अवैज्ञानिक नहीं है. यदि आपके पेट में कहीं कुछ जमा नहीं है तो उपवास भी किया जा सकता है, पर इसके लिए रोज Rectum और कोलन (Colon) की सफाई जरूरी है. Rectum यानी छोटी आंत या मलाशय और colon को बड़ी आंत बोलते हैं.
आजकल के खान पान तथा भयंकर प्रदूषण से महानगरों का हर तीसरा आदमी गट समस्या से जूझ रहा है. गट समस्या यानी पाचन तंत्र (Digestive system) में गड़बड़ी होना. इस समस्या के मूल में है Rectum और Colon की सफाई से उदासीन रहना. जानिए किस तरह से ठहाके लगाने से लेकर वाष्प स्नान तक आपको स्वस्थ रखने में सहायक हो सकते हैं.
पेट साफ तो रोग साफ
आदमी चाहे जितनी दवाएं खाएं, खान पान में संयम बरते अथवा व्रत-उपवास करे, पेट में जाने वाले बैक्टीरिया उसके पेट के अंदर उथल पुथल मचायेंगे ही. उसका जी उबकाएगा. अक्सर पेट दर्द, उल्टी-दस्त होंगे और अनिद्रा तथा एंजायटी का शिकार वह हो ही जाएगा. इसका अकेला इलाज है साल में दो बार एनिमा के जरिए बड़ी आंत यानी Colon को साफ कर लेना. घर पर रह कर यह सब संभव नहीं है इसलिए किसी नेचुरोपैथी सेंटर में जाना उचित है. आजकल बहुत सारे फाइव स्टार टाइप के नेचुरोपैथी सेंटर बने हैं परंतु नेचुरोपैथी का अर्थ किसी शानदार फाइव स्टार सेंटर में फाइव स्टार तरीके से रहना नहीं बल्कि प्रकृति के साथ रह कर उसके मुताबिक जीना है. अर्थात् प्रकृति और स्वयं के बीच सामंजस्य स्थापित करना और यह कठोर साधना मांगता है. इसमें इच्छाओं को मारना भी शामिल है.
प्रकृति के साथ रहने का सुख
मैं इन दिनों मेरठ में बागपत रोड पर शहर से 9 किमी की दूरी पर स्थित पांचली खुर्द गांव के एक नेचुरोपैथी सेंटर में हूं. महात्मा जगदीश्वरानंद आरोग्य धाम कोई पहाड़ों अथवा घने जंगलों के बीच नहीं है, पर यह जरूर है कि यह आरोग्य धाम खेतों और बागों की हरियाली के बीच स्थित है. चारों तरफ अमराइयां हैं, पास में अपर गंगा कैनाल की अथाह वाटर बॉडी है. गन्ने के खेत हैं और दिल्ली से इसकी दूरी मात्र 65 किमी है. इस केंद्र में आपको दूर जंगलों जैसा एकांतवास का सुख मिलता है, क्योंकि जब आप आरोग्य धाम के अंदर होते हैं तब बाहरी दुनिया से आपका कोई संपर्क नहीं रहता, सिर्फ आरोग्य धाम के कर्मी, यहां के गुरू जी यानी चिकित्सक और रह रहे यूजर्स ही आपके साथी होते हैं. एक साथ अधिक से अधिक 50 लोग इस आरोग्य धाम में रह सकते हैं. इनके बीच रहना, बोलना बतियाना और सुख-दुख बांटना आपको महानगर के डॉक्टरों, दवाओं और फालतू की किच किच से दूर रखता है. आप जितना प्रकृति के करीब होते हैं उतने ही खुश रहते हैं. यही इस आश्रम की बड़ी उपलब्धि है.
नेचर से इलाज
हरे-भरे खेतों, बागों के बीच काफ़ी लंबे-चौड़े दायरे में फैले इस आरोग्य धाम में किसी भी तरह की दवा-दारू से इलाज नहीं किया जाता बल्कि मिट्टी और पानी से चिकित्सा की जाती है. यह भी अपने आप में अद्भुत है. सिर्फ मिट्टी और पानी से इलाज! यहां के चिकित्सकों का मानना है कि हम प्रकृति में प्रकृति के अन्य जीव धारियों की तरह रहें. उनकी तरह अपने अनुभव जन्य वनस्पतियों का असर जानें. प्रकृति में कोई भी वस्तु अनुपयोगी नहीं है. हो सकता है, हमें उसके उपयोग न पता हों पर प्रकृति में मनुष्य के अलावा हर जीव प्रकृति की इन चीज़ों का उपयोग जानता है.
ऐसा तो संभव नहीं है कि प्रकृति में मनुष्य के अलावा अन्य प्राणी कभी बीमार न पड़ते हों अथवा व्याधि ग्रस्त न होते हों किंतु वे अपना इलाज स्वयं कर लेते हैं. वेटेनरी डॉक्टर या पशु चिकित्सक तो सिर्फ उन्हीं पशुओं का इलाज करते हैं, जो मनुष्य के साथ हैं. मगर प्रकृति में करोड़ों जीवधारी हैं, उन्हें चिकित्सक की जरूरत नहीं पड़ती. वे प्रकृति में उपलब्ध हर जड़ी, हर पौधे की इस देन को समझते हैं और उनके समीप रह कर वे उनका सेवन करते हैं.
जिम कॉर्बेट के अनुभव
साल 1993 में जब मैं जिम कॉर्बेट रिजर्व फारेस्ट गया तो एक दिन हाथी पर बैठ कर भ्रमण करते समय मैंने देखा कि एक बाघ ने हिरण पर झपट्टा मारा. हिरण घायल तो हो गया लेकिन निकल भागा. कुछ दूर जा कर मैंने देखा हिरण एक पौधे पर अपने शरीर का घायल हिस्सा रगड़ रहा है. उसके खून का प्रवाह बंद हो गया और वह उछलता कूदता जंगल में गुम हो गया. इसी तरह जिम कॉर्बेट के मलानी रेंज में स्थित फारेस्ट रेस्ट हाउस 2010 तक पर्यटकों के लिए उपलब्ध नहीं था, परंतु वाइल्ड लाइफ के प्रति मेरी दिलचस्पी समझ कर उत्तराखंड वन विभाग के सलाहकार श्री अनिल बलूनी ने मेरे लिए एक हफ़्ते का प्रवास वहां फिक्स करवाया.
यहां तब न कोई कैंटीन थी न ही कोई अन्य सुविधा. सिर्फ़ एक नेपाली चौकीदार था, जो यहां पिछले 28 वर्ष से रह रहा था. वह वन पशुओं की बोली समझ लेता था और उनकी कॉल का जवाब भी दे लेता था. वन विभाग के अफसरों ने विभाग की जिप्सी से मुझे वहां भिजवा दिया. साथ में एक हफ़्ते के राशन को भी साथ ले जाने का निर्देश दिया, क्योंकि वन विभाग की अगली जिप्सी कब आएगी, पता नहीं. हाथियों, बाघों और भालुओं की लड़ाई कभी भी रास्ता रोक लेती थी.
लो माचिस भूल आए
सब कुछ साथ ले जाने के बावजूद भी मैं माचिस भूल गया. अब वहां सब कुछ था पर बिना आग के भोजन बने तो कैसे! लेकिन उस चौकीदार ने इसका तोड़ ढूंढ़ निकाला. उसने पत्थरों को रगड़ कर आग जला ली और फिर आग को सुरक्षित कर लिया जिससे हफ़्ते भर का काम चला. कहने का आशय यह कि प्रकृति को विज्ञान की या आधुनिक मशीनों की कोई जरूरत नहीं बल्कि प्रकृति में उपलब्ध संसाधनों के इस्तेमाल की विधि आनी चाहिए. मलानी के उस FRH (Forest Rest House) में सब कुछ प्राकृतिक था. पास के कुंड में धूप सेंकते विशाल अजगर, हाथी, मगर, बाघ और हिरण उसी कुंड से पानी पीते. मगर कोई किसी पर हमला न करता. एक हफ्ते तक प्रकृति की यह विविधता देखते हुए मैं अचंभे में पड़ता रहा.
अंदर की खुशी ही वास्तविक
मनुष्य जीवन की यह उपलब्धि नहीं है कि उसने कितना धन अथवा यश कमाया या कितनी लंबी उम्र हासिल की. उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है, उसने जीवन के कितने वर्ष स्वस्थ रह कर जिये. डॉक्टर लंबी उम्र दे सकता है पर जीवन की लंबी अवधि सिर्फ वेंटीलेटर पर रख कर या अस्पताल में सड़ा कर अथवा दवाएं देकर वह उसे ज़िंदा रखता है. इसके पीछे तर्क है कि उसने मरीज को मौत के मुंह से निकाला. यह सही है परंतु क्या इससे मरीज सुखी हुआ अथवा रोज वह घुट-घुट कर मरने लगा, यह सवाल भी अहम है. उन दवाओं के साइड इफ़ेक्ट्स झेलते हुए मनुष्य जीते हुए भी मृत समान ही रहता है. मनुष्य सुखी तब ही माना जाएगा जब वह अंदर से प्रसन्न होगा. इसके लिए किसी आध्यात्मिक गुरू या धर्म की शरण में जाने की जरूरत नहीं है. इसके लिए जरूरी है कि मनुष्य प्रकृति के साथ साहचर्य स्थापित करे.
रोते हुए मरीज भी खिलखिलाते हैं
इस आश्रम में आदमी की जीवन शैली को प्रकृति के अनुरूप ढाला जाता है. दवाई के लिए रोते-बिलखते मरीजों को यहां गर्म पानी, ठंडा पानी, गर्म भाप दी जाती है और कोई दवा न तो यहां खिलाते हैं और कोई ख़ुद चोरी से खा ले तो साफ़ कह देंगे कि आपका इलाज़ संभव नहीं. इसके बावजूद जो मरीज़ यहां रोता हुआ आता है, हंसते हुए घर को जाता है. इस आरोग्यधाम की प्रकृति ही ऐसी है कि व्यक्ति को खुश कर दे. यहां के चिकित्सक गुरू काशीनाथ जी आपके लिए आवश्यक आहार विहार तय करते हैं और देवेन्द्र जी एक्सरसाइज और कुछ योग कराते हैं. इसके बाद गुरू जी व्यक्ति के स्वस्थ रहने के गुर समझाते हैं और मुस्कुराना, हंसना तथा ठहाके लगाना सिखाते हैं.
सबसे कठिन है हंसना और वह भी बेवजह. चेहरे पर यदि स्मित मुस्कान रहती है तो वह व्यक्ति यूं ही ख़ुश रहता है और कोई भी बीमारी उसके दिमाग़ में नहीं बैठेगी. बीमारी व्यक्ति को कुंठित कर देती है. फिर वह फालतू में डॉक्टरों के पास भागता है.
हंसना सबसे अच्छा इलाज
मन ही मन हंसना एक कठिन प्रक्रिया है, लेकिन इससे उसके पेट, हृदय, छाती पर पॉजिटिव असर पड़ता है. खिलखिलाने में आवाज मद्धम होती है. सुर और ताल की तरह. इसके बाद ठहाके लगाना यानी मुंह ऊपर कर गले से ज़ोरों की हंसी निकालना. गले से हंसने की वजह से थायरायड दूर होता है. यह सब कुछ सुबह 5 से 7 तक निपट जाता है. ठहाके के बाद दस मिनट का शवासन होता है. यह बहुत जरूरी क्रिया है. यह आसन मनुष्य को चिंताओं से दूर करता है, जिस कारण उसकी एंजॉयटी दूर होती है. इसके बाद हवन होता है. महात्मा जी चूंकि आर्य समाज से थे इसलिए हर जाति का आदमी पुरोहित और यजमान बन सकता है. यह बराबरी का द्योतक है. फिर शरीर पर दर्द वाली जगहों पर मिट्टी की पट्टी रखी जाती है. पहले गरम और फिर ठंडी.
भोजन के कड़े नियम
इसके बाद नेती क्रिया होती है, यह जटिल है पर जिन लोगों को साइनस, सिरदर्द, कफ आदि की समस्या है, उनके लिए बेहतर है. फिर एनीमा दिया जाता है जिससे रेक्टम और कोलन दोनों साफ़ होते हैं. इसके बाद मरीज के रोग के अनुसार धूप स्नान और वाष्प स्नान कराते हैं. तब तक 11 बज जाते हैं. अपने-अपने रूम में जाकर आराम करें. ठीक 11.30 पर भोजन शुरू हो जाता है. ढेर सारा सलाद, एक चम्मच अंकुरित चने और इतना ही अंकुरित मूंग मिलता है. दो उबली हुई सब्जियां, जिनमे तेल, घी और मसाले नहीं होते. शाम 5.30 पर इसी तरह की दो उबली सब्जियां (लौकी, तोरी, करेला या बैगन आदि की) मिलती हैं. चौथे दिन से मरीज की स्थिति देख कर उसकी रोटी बंद भी कर सकते हैं और वह बस लौकी करेले के जूस पर रहेगा.
आश्रम के कड़े नियम
दोपहर ढाई बजे से धूप स्नान और कुछ को वाष्प स्नान दिया जाता है. फिर शरीर की मालिश होती है. चार बजे सब खत्म और साढ़े पांच बजे भोजन. रात 8 पर सो जाएं. सुबह 4 बजे जगा दिया जाएगा. शाम को भी वॉक कर सकते हैं. इस आरोग्य धाम में डॉरमेट्री भी है और रूम भी.अटैच्ड बाथरूम सिर्फ कमरों में हैं. कमरों का किराया 12 सौ से ले कर 16 सौ के बीच है. एसी और टीवी की उम्मीद न करें। खाना फ्री है और सारी चिकित्सा भी. डॉरमेट्री का किराया 600 रुपये रोज है. कम से कम 10 दिन रुकना अनिवार्य है. इस अवधि में आप गेट के बाहर नहीं जा सकते.
यहां स्टे भी बजट के अनुकूल है, तथा दिल्ली से दूरी भी अधिक नहीं है. अगर नियमों का उल्लंघन किया तो आश्रम आपको बाहर कर सकता है और जो राशि जमा की है, वह वापस नहीं मिलेगी. अधिकांश मरीज़ यहां कोलन की सफ़ाई कराने और वेट लॉस करने आते हैं. गठिया, साइटिका, सुगर और बीपी के मरीज भी आते हैं.
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शंभूनाथ शुक्ल
शंभूनाथ शुक्ल वरिष्ठ पत्रकार हैं. 1974-75 के छात्र आंदोलन के दौरान वे B.Sc. कर रहे थे किंतु पढ़ाई अधूरी छोड़ कर वे कलकत्ता चले गए. तब वहां सिद्धार्थ शंकर रॉय की सरकार आंदोलन कर रहे छात्रों पर गोलियाँ चलवा रही थी. श्री शुक्ल किसी तरह वहां से कानपुर आ गए और आईआईटी में वामपंथी छात्रों के साथ रह कर मार्क्स, एंजेल्स और लेनिन को पढ़ा. सोवियत (रूसी) और चीनी कम्युनिस्ट साहित्य की खूब पढ़ाई शुरू की. यूरोप और अमेरिका का इतिहास पढ़ा. देश और विदेश को समझने की नई दृष्टि उन्हें मिली. आईआईटी और मेडिकल छात्रों के साथ रहने से अंग्रेजी से अनुवाद में पारंगत हुए. देश में युवाओं, किसानों और दलित व पिछड़ी जातियों की पीड़ा को उन्होंने गहराई से समझा. यहीं से लेखन उनकी प्रेरणा बना क्योंकि लेखों के ज़रिए ही वे अपनी इस दृष्टि का विस्तार कर सकते थे. कोलकाता से प्रकाशित होने वाली आनंद बाज़ार पत्रिका समूह की साप्ताहिक पत्रिका ‘रविवार’ ने उनकी एक स्टोरी को कवर स्टोरी बना कर छापा- ‘अर्जक संघ; उत्तर प्रदेश का डीएमके’ यह स्टोरी बहुत चर्चित हुई और वे सक्रिय रूप से पत्रकारिता में आ गए. कानपुर में ही दैनिक जागरण ने उन्हें अपने स्टाफ में रख लिया और कुछ सीरियस विषयों पर उनसे खोजपूर्ण काम करवाए. उन दिनों आईआईटी में कई दलित छात्र अंग्रेजी के भय से सुसाइड कर लेते थे, उस पर उन्होंने इन एलीट संस्थानों के भीतर हरिजन (अब दलित) छात्रों की पीड़ा को तह तक जा कर उजागर किया. भागलपुर के आंख फोड़ो कांड की रिपोर्ट के लिए उन्हें वहां भेजा गया. उस कांड को तब तक विस्तार के साथ अरुण शौरी ने इंडियन एक्सप्रेस में रिपोर्ट लिखी थी. शुक्ल जी श्री शौरी से वहां मिले और दैनिक जागरण के लिए इस कांड की ज़मीनी रिपोर्टिंग की. 1983 में जब जनसत्ता निकला तब संपादक प्रभाष जी की शुरुआती टीम में शंभूनाथ शुक्ल भी थे. बाद में वे जनसत्ता के चंडीगढ़ और कोलकाता संस्करणों के संपादक बनाये गये. 2003 में अमर उजाला के कानपुर संस्करण का कामकाज संभाला और फिर दिल्ली, लखनऊ और मेरठ में अमर उजाला में कार्यकारी संपादक रहे. फ़िलहाल वे फ्री लांसिंग कर रहे हैं. पिछले कई वर्षों से वे TV 9 डिजिटल में लेख भी लिख रहे हैं. राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, दर्शन और समाज शास्त्रीय विश्लेषण में उनकी गहन रुचि है.
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