October 1, 2026

हकीम से कैसे गीतकार बने मजरूह सुल्तानपुरी? नेहरू को हिटलर का चेला बताकर कसा था तंज

Majrooh Sultanpuri Birth Anniversary: मजरूह सुल्तानपुरी ने यूनानी हकीमी की पढ़ाई की थी, लेकिन रोगियों-दवाइयों की दुनिया उन्हें रास नहीं आई. उनका मन शेर-ओ-शायरी में रमता था. खुशकिस्मती से जिगर मुरादाबादी जैसे उस्ताद की उन्हें सरपरस्ती हासिल हुई. फिर उन्होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा. उर्दू अदब की प्रोग्रेसिव धारा से जुड़े. पंडित नेहरू के खिलाफ लिखी एक नज़्म ने जेल पहुंचा दिया. फिर भी नहीं झुके. शुरुआत में फिल्मों के लिए गीत लिखने में हिचक थी. फिर जब सिलसिला शुरू हुआ तो एक के बाद एक दिल को छू लेने वाले नगमों ने शोहरत की बुलंदी पर पहुंचा दिया.

ऐसा रचा कि जाने के बाद भी याद किए जाते हैं. गुनगुनाए जाते हैं. और लोगों के दिलों पर राज करते हैं. जन्मदिन के मौके पर उनकी जिंदगी के सफ़रनामे पर एक नज़र.

हकीमी पढ़ी, दवाखाना खोला

उनका मजरूह सुल्तानपुरी नाम लोगों के दिल-दिमाग पर ऐसा छाया कि असली नाम असरार उल हसन खान कम ही लोग जान सके. 1 अक्टूबर 1919 को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के गंजेहड़ी गांव में जन्म हुआ. पिता पुलिस विभाग की मुलाजमत में थे. उस दौर में सुल्तानपुर के गांवों की बात दूर शहर में भी पढ़ाई के इंतजाम बेहद मामूली थे. इन हालात में असरार उल हसन की शुरुआती तालीम मदरसे में मुमकिन हुई. वहीं उर्दू, अरबी और फारसी से रिश्ता बना. बाद में उन्होंने लखनऊ से यूनानी चिकित्सा की पढ़ाई की और हकीम बनने की राह पकड़ी.

Majrooh Sultanpuri

मजरूह सुल्तानपुरी ने लखनऊ से यूनानी चिकित्सा की पढ़ाई की और हकीम बनने की राह पकड़ी.

सुल्तानपुर शहर में दवाखाना खोला. लेकिन आगे की मंजिल के लिए उन्हें कोई और रास्ता उन्हें अपनी ओर खींच रहा था. मरीजों की नब्ज़ और हकीमी नुस्खों की उबाऊ जिंदगी की जगह शेर-ओ-शायरी उन्हें लुभाती थी. लिखना शुरू हुआ. तब मुशायरों की धूम थी. जल्दी ही उनमें शिरकत के मौके मिलने शुरू हुए. सिर्फ सुनने वाले ही नहीं , उस्ताद शायर भी उनकी नज़्मों और गज़लों के कायल हुए.

उर्दू अदब की दुनिया के बड़े नाम जिगर मुरादाबादी को इस नौजवान में बड़ी उम्मीदें नज़र आईं. उन्होंने मजरूह को शागिर्द बना उनके लिखे को संवारना शुरू किया. जिगर की सरपरस्ती ने मजरूह की अदबी जिंदगी में उजाले के नए रास्ते खोले.

शुरू में हिचक थी, फिल्मों के लिए लिखने में

1945 में एक मुशायरे में हिस्सा लेने वे मुंबई पहुंचे. श्रोताओं में फिल्म निर्माता ए.आर. कारदार और संगीतकार नौशाद भी शामिल थे. कारदार ने उन्हें अपनी फिल्मों के लिए गीत लिखने की पेशकश की. अदब में ऊंचे मुकाम के ख्वाहिशमंद शायर उन दिनों फिल्मों के लिए लिखना कम दर्जे का काम मानते थे. मजरूह भी हिचके. लेकिन उस्ताद जिगर मुरादाबादी ने समझाया कि घर-परिवार के लिए पैसा भी जरूरी है. फिल्मों के लिए लिखकर यह मिल सकेगा. फिर फिल्मों के लिखने का मतलब कुछ और बेहतर लिखने पर पाबंदी तो नहीं है.

उन्हें समझाया कि फिल्मी गीत लेखन से आर्थिक सहारा मिलेगा और शायरी भी जारी रखी जा सकेगी. मजरूह मान गए और हिंदी सिनेमा को एक ऐसा गीतकार मिला, जिसने चार हजार से ज्यादा गीत लिखे. उनमें तमाम आज भी दोहराए जाते और कानों में गूंजते हैं.

Majrooh Sultanpuri Junior High School In Sultanpur

सुल्तानपुर के गांव में उनके नाम से एक स्कूल है. फोटो: TV9

जब दिल ही टूट गया गीत ने दी खूब शोहरत

यह शुरुआत थी. नौशाद ने उन्हें एक धुन और उसकी बहर दी. मजरूह ने उसे लफ़्ज़ों में ढाला. के.एल. सहगल की रेशमी आवाज का साथ मिला. और फिर वह गीत ” जब दिल ही टूट गया तो जी कर क्या करेंगे ” का सिर्फ उस वक्त और दौर में नहीं , उसका आज भी जादू बरकरार है. 1946 की फिल्म शाहजहां के लिए लिखे इस गीत ने उन्हें रातों-रात मकबूलियत के आसमान पर पहुंचा दिया.

इसके बाद दुलारी, अंदाज़ और दूसरी फिल्मों ने मजरूह की पहचान और मजबूत की. फिल्मी दुनिया में वे अपनी जगह बना चुके थे. लेकिन फिल्मी दुनिया की चकाचौंध के बीच उनके भीतर का शायर गरीबों-मजलूमों और मजदूरों की अंधेरी दुनिया और उनके साथ आजादी के बाद हो रही बेइंसाफी को लेकर बेचैन था.

मजरूह प्रगतिशील लेखक आंदोलन से जुड़े थे. वामपंथ का उनपर गहरा प्रभाव था. आजादी के बाद देश किस दिशा में जा रहा है? सत्ता की नीतियां क्या हैं और आम आदमी की जिंदगी में आजादी का अर्थ क्या है, ये सवाल उनकी शायरी में शिद्दत से उठ रहे थे.

Pandit Nehru

मजरूह सुल्तानपुरी ने नेहरू की नीतियों पर बेहद तीखा हमला करते हुए एक नज़्म पढ़ी थी.

वो नज़्म जिसने भेजा जेल

मजरूह की शायरी में इश्क़ और इंक़लाब दोनों साथ-साथ चलते रहे. आजादी के ये शुरुआती साल थे. लेकिन लेफ्टिस्ट को लगता था कि सत्ता बदल गई है. पर उस आम आदमी की जिंदगी नहीं बदल रही है, जिसके लिए आज़ादी का सपना देखा गया था. 1951 में मजरूह ने मुंबई में आंदोलित मजदूरों की एक सभा में पंडित जवाहरलाल नेहरू की नीतियों पर बेहद तीखा हमला करते हुए एक नज़्म पढ़ी.

मन में ज़हर डॉलर के बसा के,

फिरती है भारत की अहिंसा.

खादी की केंचुल को पहनकर,

ये केंचुल लहराने न पाए.

ये भी है हिटलर का चेला,

मार लो साथी जाने न पाए.

कॉमनवेल्थ का दास है नेहरू,

मार लो साथी जाने न पाए.

नज़्म में तत्कालीन सत्ता से शिकायत ही नहीं, बल्कि नेहरू की विदेश नीति और कॉमनवेल्थ से भारत के संबंधों पर भी जबरदस्त हमला था. खास तौर पर नेहरू को हिटलर का चेला और कॉमनवेल्थ का दास कहना बहुत गलत और अपमानजनक माना गया.

नतीजे में मजरूह की पुलिस ने तलाश शुरू की. कुछ दिन फरार रहे. जल्दी ही प्रगतिशील लेखकों की एक बैठक में हिस्सा लेने के लिए जाते समय उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया . मुंबई की आर्थर रोड जेल में उन्हें रखा गया. उनके साथ अभिनेता बलराज साहनी भी गिरफ्तार किए गए थे.

Majrooh Sultanpuri Life Story

पंडित नेहरू पर तंज कसने के बाद मजरूह ने माफी की पेशकश ठुकराई.

माफ़ी की पेशकश ठुकराई

माफी मजरूह को जेल से बचा सकती थी. लेकिन मजरूह ने जेल चुनी. परिवार के लिए यह मुश्किल समय था. बंदी जीवन में भी मजरूह फिल्मों के लिए गीत लिखते रहे. मजरूह की अदबी जिंदगी का यह दिलचस्प पहलू है – एक ओर सत्ता से गरीबों – जरूरतमंदों के लिए टकराव तो दूसरी ओर हिंदी सिनेमा की जरूरतों के मुताबिक प्यार – मोहब्बत और रुसवाई के नगमों का सिलसिला. लगभग साल भर की जेल की तकलीफों में मजरूह को हिम्मत हारने की जगह और मजबूत किया. रोजी-रोटी के लिए आगे भी फिल्मी सफ़र जारी रहा लेकिन जेल ने उनके इस यकीन को और पुख्ता किया कि शायर का काम महबूब की आंखों और ज़ुल्फ़ों – खम की बयानी तक महदूद नहीं है. उसे समाजी हालात को लेकर सचेत रहना है.

सत्ता से आंखें मिला सवाल करने के लिए भी तैयार रहना है. यही वजह है कि मजरूह सुल्तानपुरी को याद करते हुए केवल जब दिल ही टूट गया, एक लड़की भीगी भागी सी या चुरा लिया है तुमने जो दिल को याद करना उनकी शख्सियत का अधूरा परिचय है. उनके भीतर वह शायर भी था जिसने सत्ता से असहमति की कीमत जेल जाकर चुकाई. माफी मांगकर अपनी आवाज़ को छोटा करने से इनकार किया. खासियत यह थी कि लेखन की यह ईमानदारी और खुद्दारी ताउम्र कायम रही.

Majrooh Sultanpuri Gate In Sultanpur

कुड़वार रोड पर गंजेहड़ी बाजार में उनके का नाम का गेट निर्मित है. फोटो: TV9

हर रंग के गीत रचे

वो मजरूह जिनका लबो-लहज़ा गरीबों के हक में सत्ता के सामने तन कर खड़ा दिखता है, उसी मजरूह की कलम से खिले अशआर प्यार-मोहब्बत, शरारत, झुकती-छिपती निगाहों, धड़कते दिलों और लरजते होठों की बेमिसाल दास्तां बयां कर गए. उनकी शायरी के अलग और इतने रंगों ने सिर्फ फिल्मी नहीं बल्कि अदबी दुनिया में भी उन्हें ऊंचा मर्तबा और बड़ा मुकाम दिया.

मजरूह ने गुरु दत्त, एस.डी. बर्मन, ओ.पी. नैयर, नौशाद, मदन मोहन, आर.डी. बर्मन, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जैसे अनेक संगीतकारों के साथ काम किया. उनके गीतों की खूबी केवल यह नहीं है कि वे हिट हो गए. असली खूबी यह है कि वे चंद दिनों में भुला नहीं दिए गए. आज भी वे दोहराए और उसी चाहत-मोहब्बत के साथ सुने और गाये जाते हैं. कैसे भूल सकते हैं -राही मनवा, दुःख की चिंता क्यों सताती हैदुःख तो अपना साथी है.कितने सहज शब्द हैं. लेकिन यही सहजता मजरूह की ताकत थी. और एक लड़की भीगी भागी सी, चुरा लिया है तुमने जो दिल को, अच्छा जी, मैं हारी, चलो मान जाओ ना. मजरूह का लिखा लोगों की जुबां पर इसलिए भी चढ़ गया , क्योंकि उन्होंने गीतों के शब्द रोज-मर्रा की बोलचाल के बीच से चुने. भाषा को बोझिल नहीं किया. शब्दों को सादगी का श्रृंगार दिया.

Majrooh Sultanpuri Park

सुल्तानपुर की पॉश ऑफिसर्स कॉलोनी में उनके नाम से एक पार्क है. फोटो: TV9

बदलते दौर की नब्ज़ पर उंगलियां

फिल्मी दुनिया में मजरूह ने पांच दशक से ज्यादा का सफ़र तय किया. इस बीच तीन पीढ़ियों के साथ काम किया. शुरूआत के.एल. सहगल के साथ की. फिर देव आनंद, गुरुदत्त, किशोर कुमार, राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन से होता हुआ यह सफ़र आमिर-सलमान खान की पीढ़ी तक पहुंचा. बदलते समय की धड़कनों को उन्होंने सुना-समझा और उन्हें शब्दों में ढाला.

ऐसा शायर जो 1940 के दशक में “जब दिल ही टूट गया” लिख चुका था, वह वह 1990 के दशक में युवा पीढ़ी की उम्मीद के पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा या फिर “पहला नशा, पहला खुमार जैसे प्रेम गीत लिख गया. चुरा लिया है तुमने जो दिल को — यादों की बारात (1973), ओ मेरे दिल के चैन, चैन आए मेरे दिल को दुआ कीजिए — मेरे जीवन साथी (1972), “हमें तुमसे प्यार कितना, ये हम नहीं जानते — कुदरत (1981),अब तो है तुमसे हर खुशी अपनी — अभिमान (1973) ,बचपन के दिन भुला न देना — दीदार (1951) आ जा आ जा मैं हूं प्यार तेरा — चाइना टाउन (1962), “अच्छा जी मैं हारी, चलो मान जाओ ना — काला पानी (1958), बूझ मेरा क्या नाम रे, नदी किनारे गांव रे पीपल झूमे मोरे आंगना, ठंडी-ठंडी छाँव रे – सी.आई. डी. (1956) जैसे तमाम मशहूर गीत उनकी कलम से निकले और पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों की जुबां पर चढ़े रहे.

उम्र बूढ़ा करती रही लेकिन शायर के तौर पर मजरूह के शब्द और संवेदना जवां बने रहे. फिल्मी दुनिया का अर्थशास्त्र बाजार पर टिका है. मजरूह इससे बेख़बर नहीं थे. उन्होंने प्रेमगीत लिखे. मस्ती के हल्के-फुल्के और शरारत के गीत भी लिखे. लेकिन लोकप्रियता के इस पूरे सफर में उन्होंने अपनी भाषा-भाव की गरिमा को बाजार के हवाले नहीं किया.

महज फिल्मी गीतकार नहीं

मजरूह को केवल सफल फिल्मी गीतकार कहना उनके कद को छोटा करना है. वे बाजार के भीतर रहकर भी अपने भीतर के शायर को बचाए रखने में कामयाब रहे.1965 में दोस्ती के गीत चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे के लिए उन्हें फिल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ गीतकार पुरस्कार मिला.

1993 में उन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया. यह सम्मान पाने वाले वे पहले गीतकार थे. इस लंबे सफ़र में पुरस्कारों-सम्मानों की लंबी फेहरिस्त है. लेकिन मजरूह को सिर्फ पुरस्कारों से नहीं मापा जा सकता. फिल्मी दुनिया में रहते हुए भी उर्दू अदब में वे अपना मुकाम बना सके. उनका मशहूर शेर बार-बार आज भी दोहराया जाता है ,

मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर,

लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया.

मजरूह सिर्फ प्रेम के शायर नहीं थे. वे सिर्फ विरोध के शायर नहीं थे. वे सिर्फ फिल्मी गीतकार ही नहीं थे. बेशक फिल्मों ने उन्हें घर-घर पहुंचाया. लेकिन उनकी शख्सियत फिल्मों तक सिमट कर नहीं रह गई. वे उस पीढी के शायर थे, जिन्होंने आजाद भारत के सपने देखे. उन सपनों को टूटते देख मुखालफ़त का झंडा बुलंद किया. एक शायर के तौर पर ताउम्र अपनी गज़लों – शेरों के जरिए सामाजिक सरोकारों के संघर्ष की आग को बुझने न देने के लिए वे बेचैन रहे. 24 मई 2000 को उनकी जिंदगी का सफ़र थम गया.

गांव-घर-सुल्तानपुर को कभी नहीं भूले

पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक छोटे जिले सुल्तानपुर का नाम मजरूह के जरिए दूर तक पहुंचा. इसका स्थानीय लोगों को अहसास और अभिमान है. वे लंबे समय तक मुंबई में रहे. लेकिन अपने गांव-देस की जड़ों से वे हमेशा जुड़े रहे. कभी सुल्तानपुर के मुशायरों में शिरकत की तो कभी अपने दोस्त तफ़ज़्जुल साहब के गंगेव हाउस की नशिस्तों में हिस्सा लिया.

सुल्तानपुर में साहित्य-संस्कृति या फिर उसके इतिहास से जुड़े हर छोटे-बड़े आयोजनों में आज भी मजरूह सुल्तानपुरी का जिक्र जरूर होता है. अखबारों के स्थानीय पन्नों में उनके जन्म-पुण्यतिथि के मौके पर उनसे जुड़ी सामग्री के जरिए जिले के बाशिंदे उनकी यादें ताजा करते हैं.

युवा पत्रकार विशाल तिवारी के अनुसार उनके पैतृक गांव गंजेहड़ी में परिवार और प्रशंसकों ने मजरूह सुल्तानपुरी की यादों को संजोए रखने की कोशिश की है. कुड़वार रोड पर गंजेहड़ी बाजार में उनके का नाम का गेट निर्मित है. गांव में उनके नाम से एक जूनियर हाई स्कूल भी संचालित है. शहर की पॉश ऑफिसर्स कॉलोनी में उनके नाम से एक पार्क है. वर्षों से यह बदहाल था. लेकिन कुछ अर्सा पहले शासन से इसके सुंदरीकरण और खेल सुविधाओं के लिए पच्चासी लाख की राशि प्रदान की. अब इस पार्क को संवारा जा रहा है.

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राज खन्ना

राज खन्ना

पत्रकारिता से दशकों का जुड़ाव. आजादी के संघर्ष, राजनीति, इतिहास, समाज और संविधान से जुड़े सवालों पर सतत् अध्ययनशील. निरंतर लिखते-छपते रहते हैं. ' आजादी से पहले - आजादी के बाद ' और ' इंडिया अर्थात् भारत ' किताबें भी लिखी हैं. दोनों ही किताबें चर्चित और प्रशंसित.

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