September 29, 2026

बिजनेस और धार्मिक यात्राओं से कहीं ज्यादा महंगा है इलाज कराने जाना, आंकड़ों से समझें पूरी तस्वीर

बिजनेस और धार्मिक यात्राओं से कहीं ज्यादा महंगा है इलाज कराने जाना, आंकड़ों से समझें पूरी तस्वीर

मेडिकल ट्रिप पर कितना हो रहा खर्च

देश में इलाज के लिए सफर करना अब घूमने-फिरने, खरीदारी और धार्मिक यात्राओं से भी ज्यादा जेब पर भारी पड़ रहा है. राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) की 80वें दौर की रिपोर्ट ‘Domestic Tourism in India’ के मुताबिक, स्वास्थ्य और मेडिकल कारणों से की गई यात्रा पर प्रति ट्रिप औसतन 32,167 रुपये खर्च हुए, जो यात्रा की किसी भी दूसरी कैटेगरी से ज्यादा है. खास बात यह है कि इस खर्च में इलाज का खर्च शामिल नहीं है. यानी यह रकम सिर्फ अस्पताल या डॉक्टर तक पहुंचने और यात्रा से जुड़े खर्च को दिखाती है. यह सर्वे जुलाई 2025 से जून 2026 के बीच किया गया. इसमें पिछले 365 दिनों में हुई यात्राओं को आधार बनाया गया है.

रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले 365 दिनों में हुई यात्राओं में स्वास्थ्य और मेडिकल यात्रा पर औसत खर्च सबसे ज्यादा रहा. ग्रामीण इलाकों में यह खर्च 29,454 रुपये प्रति ट्रिप और शहरी इलाकों में 41,649 रुपये प्रति ट्रिप रहा. यानी शहरों में मेडिकल ट्रिप पर गांवों के मुकाबले ज्यादा खर्च हुआ. खरीदारी से जुड़ी यात्राएं 18,981 रुपये प्रति ट्रिप के औसत खर्च के साथ दूसरे नंबर पर रहीं. सर्वे में 1,42,603 ग्रामीण परिवारों और 1,03,510 शहरी परिवारों को शामिल किया गया. रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि जिन्हें इलाज के लिए अपने गांव, कस्बे या राज्य से बाहर जाना पड़ता है, उनके लिए सफर का खर्च भी बड़ा बोझ बन सकता है.

Sabse Jyada Kharch

कहां हुआ ज्यादा खर्च

गांवों और शहरों में कितनी मेडिकल ट्रिप हुईं?

सर्वे के मुताबिक, स्वास्थ्य से जुड़ी रात भर रुकने वाली यात्राएं ग्रामीण परिवारों में शहरी परिवारों की तुलना में काफी ज्यादा रहीं. ओवरनाइट ट्रिप का मतलब ऐसी यात्रा है, जिसमें व्यक्ति कम से कम एक रात घर से बाहर रुका हो.

ग्रामीण भारत में सालाना प्रति 100 परिवारों पर रात भर रुकने वाली यानी ओवरनाइट 127 यात्राएं दर्ज हुईं. ये यात्राएं तीर्थ और धार्मिक गतिविधि, स्वास्थ्य और मेडिकल, मनोरंजन और खरीदारी जैसी कैटेगरी में थीं. इनमें सबसे ज्यादा 62 ट्रिप तीर्थ और धार्मिक गतिविधि की रहीं. इसके बाद स्वास्थ्य और मेडिकल की 49, मनोरंजन की 16 और खरीदारी की एक ट्रिप रही.

Gaon Me Jyada Kharch

गांव में ज्यादा खर्च

वहीं, शहरी भारत में प्रति 100 परिवारों पर सालाना 132 रात भर रुकने वाली यात्राएं रिकॉर्ड की गईं. इनमें तीर्थ और धार्मिक गतिविधि की 61, मनोरंजन की 48, स्वास्थ्य और मेडिकल की 22 और खरीदारी की एक ट्रिप रही. यानी ग्रामीण इलाकों में मेडिकल ट्रिप की संख्या शहरी इलाकों की तुलना में दोगुने से भी ज्यादा रही.

देशभर में रात भर रुकने वाली करीब 30 प्रतिशत यात्राएं स्वास्थ्य और मेडिकल कारणों से हुईं, जबकि तीर्थ और धार्मिक यात्राओं की हिस्सेदारी करीब 48 प्रतिशत रही. ग्रामीण इलाकों में रात भर की यात्राओं में मेडिकल ट्रिप की हिस्सेदारी 38.4 प्रतिशत रही, जबकि शहरों में यह 16.5 प्रतिशत थी. ये आंकड़े बताते हैं कि ग्रामीण इलाकों में इलाज के लिए लोगों को ज्यादा सफर करना पड़ सकता है.

मेडिकल ट्रिप में कौन सा वाहन सबसे ज्यादा इस्तेमाल हुआ?

रात भर रुकने वाली स्वास्थ्य और मेडिकल यात्राओं में ग्रामीण और शहरी, दोनों इलाकों में सबसे ज्यादा इस्तेमाल किराये के वाहनों का हुआ. ग्रामीण भारत में 46.7 प्रतिशत यात्राएं किराये के वाहनों से हुईं. इसके बाद बस, निजी वाहन, ट्रेन और हवाई यात्रा का नंबर रहा. शहरी इलाकों में किराये के वाहनों की हिस्सेदारी 39.8 प्रतिशत रही. इसके बाद निजी वाहन, बस, ट्रेन और हवाई यात्रा का इस्तेमाल हुआ.

Kis Vahan Se Jyada Jate Hai Log

कैसे इलाज कराने गए लोग

आंकड़ों से पता चलता है कि इलाज तक पहुंचने में सड़क परिवहन की बड़ी भूमिका है, खासकर ग्रामीण परिवारों के लिए. सर्वे में यह भी सामने आया कि सालभर की रात भर रुकने वाली स्वास्थ्य और मेडिकल यात्राओं में 32.3 प्रतिशत हिस्सेदारी 60 साल और उससे ज्यादा उम्र के लोगों की रही. यानी मेडिकल ट्रिप में बुजुर्गों की हिस्सेदारी काफी बड़ी है. हालांकि, आंकड़ों से यह पता नहीं चलता कि इन लोगों ने किस तरह का इलाज कराया या कितनी दूरी तय की.

NSO की रिपोर्ट के मुताबिक, इलाज के लिए सफर करना यात्रा की सबसे महंगी कैटेगरी रही. औसतन 32,167 रुपये प्रति ट्रिप का यह खर्च इलाज की फीस से अलग है. ग्रामीण इलाकों में प्रति 100 परिवारों पर 49 मेडिकल ट्रिप दर्ज हुईं, जबकि शहरों में 22 ट्रिप रही. ज्यादातर लोग किराये के वाहनों से सफर करते हैं और कुल मेडिकल ट्रिप में करीब एक तिहाई हिस्सा 60 साल या उससे ज्यादा उम्र के लोगों का रहा. हालांकि, आंकड़े यह नहीं बताते कि लोग किन वजहों से बाहर जाकर इलाज कराते हैं. इतना जरूर साफ है कि स्वास्थ्य से जुड़ी यात्रा भारतीय परिवारों, खासकर ग्रामीण परिवारों के लिए बड़ा आर्थिक और व्यावहारिक बोझ हो सकती है.

देवेश कुमार पांडेय

देवेश कुमार पांडेय

देवेश कुमार पांडेय TV9 Hindi में बतौर सब-एडिटर काम कर रहे हैं. उत्तर प्रदेश के अमेठी के रहने वाले देवेश को राजनीति के अलावा इतिहास, साहित्य में दिलचस्पी है.  साल 2024 में भारतीय जन संचार संस्थान (IIMC) के अमरावती कैंपस से पत्रकारिता की पढ़ाई की है. देवेश को घूमना, लिखना, पढ़ना और पॉडकास्ट सुनना पसंद है.

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