September 29, 2026

पितृपक्ष में शारीरिक, आर्थिक व मानसिक ऋणों से मुक्ति की सबसे सरल विधि

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पितृपक्ष में शारीरिक, आर्थिक व मानसिक ऋणों से मुक्ति की सबसे सरल विधि

Updesh Awasthee

personUpdesh Awasthee

9/29/2026 11:08:00 AM

धर्म एवं ज्योतिष न्यूज़ डेस्क, 29 सितंबर 2026: सनातन संस्कृति में श्राद्धपक्ष को पितृपक्ष अथवा 'आश्विन' मास के नाम से भी जाना जाता है। आश्विन नाम भगवान सूर्य के पुत्र और देवताओं के वैद्य अश्विनीकुमार से लिया गया है, जो समस्त प्रकार के रोगों का हरण करते हैं। इसका अर्थ हुआ कि, भारतीय कैलेंडर "पंचांग" के अनुसार इस महीने में से 15 दिन पूर्वजों के लिए और पूरे 30 दिन रोगों से मुक्ति के लिए, स्वास्थ्य के लिए बेहद उपयोगी हैं। 

सूर्य देव, मनुष्य को कर्जमुक्त एवं तेजस्वी बनाता है

यह तो हम सब जानते हैं कि, केवल पृथ्वी नहीं बल्कि पूरे सौरमंडल के लिए सूर्य का अस्तित्व ही सबसे महत्वपूर्ण है। पृथ्वी पर हमको ऊर्जा, दिन-रात, ऋतुएं तथा फसलों का उत्पादन सूर्य देव के कारण ही संभव होता है। जिसके कारण हम सूर्यदेव के ऋणी हैं। आश्विन मास में जब भगवान सूर्य, ऋण की राशि 'कन्या' में प्रवेश करते हैं, तब इस समय किया गया दान-पुण्य मनुष्य के पापों को नष्ट करता है तथा उसे शारीरिक, आर्थिक और मानसिक ऋण (Debts) से मुक्त कर निरोगी, कर्जमुक्त एवं तेजस्वी बनाता है। 

सूर्य किरणों के माध्यम से पितरों का आगमन और तर्पण का महत्त्व

श्रावण-भाद्रपद मास एवं मानसून की विदाई के बाद, आश्विन मास, जिसे क्वार का महीना भी कहते हैं, के दौरान सूर्य की किरणें अत्यंत प्रखर हो जाती हैं। श्रुति ग्रंथ में कहा गया है कि, इन किरणों के माध्यम से पितरों का धरातल पर आगमन होना है, इसलिए आश्विन मास में सूर्य की किरण है प्रखर होती हैं। पितृ पूरे 15 दिनों तक पृथ्वी पर अपने परिवार के संपर्क में रहते हैं और परिजनों द्वारा अर्पित जल, तर्पण एवं अन्न ग्रहण करते हैं। श्रद्धालुओं द्वारा किए गए तर्पण को सूर्य की किरणें शोषित करके आपके पितरों तक पहुंचाती हैं। बुजुर्गों द्वारा यह भी कहा जाता है कि, यदि परिवार द्वारा तर्पण न किया जाए, तो पितृ निराश होकर लौट जाते हैं, जो भयंकर कष्ट, बीमारी और अवनति का कारण बनता है। इसी कारण इस पक्ष में हर व्यक्ति के लिए तर्पण करना तथा गौ (Cow), कुत्ते और कौओं को भोजन प्रदान करना अनिवार्य माना गया है। पितरों की तिथि ज्ञात होने पर विधि-विधान से ब्राह्मणों को बुलाकर तर्पण करवाएं; यदि ब्राह्मण उपलब्ध न हों तो पूजन-पाठ कर पितरों के मनपसंद भोजन का भोग लगाएं, सूर्य को जल चढ़ाएं तथा गौ, कुत्ते व कौओं को भोजन देकर श्रद्धापूर्वक नमन करें। 

पारिवारिक एकता, रक्त-संबंध और वंश समृद्धि

हर व्यक्ति में अपने पिता का डीएनए होता है। इसीलिए कहा जाता है कि, परिवार के सभी सदस्यों के बीच में रक्त संबंध होता है। जब कोई आपसी मनमुटाव, अबोलापन या वैमनस्य के कारण अपने रक्त संबंधी को हनी पहुंचाता तो, भारतीय परंपरा में यह माना जाता है कि वह स्वयं की क्षति कर रहा है। मनुष्य को हमेशा अपना मूल याद रखना चाहिए। अपने संबंधियों के प्रति शुभ विचार और पितृपक्ष के दौरान परिवार के साथ खान-पान करना चाहिए। 

गया जी तीर्थ और पितृपक्ष श्राद्ध से जुड़ी भ्रांति का समाधान

हिंदू धर्म में गया जी (Gaya Ji) को पितरों का मोक्ष स्थान स्वीकार किया गया है, जहाँ प्रेतशिला पर तर्पण और पूजन करने से पितरों को मोक्ष प्राप्त होता है। समाज में यह भ्रांति फैली हुई है कि गया जी में श्राद्ध करने के उपरांत पितृपक्ष में तर्पण की आवश्यकता नहीं होती, जबकि यह धारणा पूरी तरह अनुचित है। गया जी में श्राद्ध करने से पितरों की कृपा मिलती है, वहीं पितृपक्ष में तर्पण करने से भगवान सूर्य की कृपा, राज्यपक्ष की कृपा तथा सामाजिक प्रतिष्ठा (Prestige) प्राप्त होती है। इसलिए निरोगी काया, मानसिक सुख, प्रतिष्ठा और राज्यपद की अभिलाषा रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को पितृपक्ष में तर्पण एवं पूजन अवश्य करना चाहिए। लेखक: पंडित रामबली शर्मा, ग्वालियर।

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