September 26, 2026

दाखिले और मुकाम के बाद भी अपनापन नहीं: हर तीसरा विद्यार्थी खुद को मानता है बाहरी, उच्च शिक्षण संस्थानों का हाल

देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में हर तीसरा विद्यार्थी परिसर में खुद को बाहरी महसूस करता है। जेईई एडवांस और नीट जैसी कठिन परीक्षाएं पास करके प्रतिष्ठित संस्थानों में पहुंचने वाले विद्यार्थियों को सीट तो मिल जाती है, लेकिन अव्वल होने का टूटता भ्रम, भाषा, सामाजिक हैसियत, आर्थिक तंगी और भेदभाव उन्हें भीतर से अकेला कर देते हैं। सुप्रीम कोर्ट की गठित नेशनल टास्क फोर्स की रिपोर्ट के अनुसार, विद्यार्थियों का यही अकेलापन तनाव और पढ़ाई बीच में छोड़ने की बड़ी वजह बन रहा है। टास्क फोर्स के 2.43 लाख विद्यार्थियों पर किए सर्वे में 15% ने माना कि बीते छह माह में गंभीर तनाव महसूस किया। 15% ने माना कि एक साल में उन्हें बार-बार आत्महत्या के विचार आए। तनाव के चलते 2018 से 2023 के बीच 13,600 विद्यार्थियों ने पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी।



पिछड़ने और कमजोर होने का भय पड़ रहा भारी


रिपोर्ट बताती है कि शीर्ष संस्थानों में पहुंचने वाला हर विद्यार्थी स्कूल और घर में अव्वल रहा होता है। परिसर में पहली बार उसका सामना ऐसी कक्षा से होता है, जहां सब उसके बराबर या उससे ज्यादा तेज हैं। कठिन पढ़ाई और होड़ में जब वह पिछड़ने लगता है, तो हीनभावना घर करने लगती है। कई विद्यार्थी शिक्षकों से अपनी कमजोरियों पर बात तक नहीं करते, क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे वे सबके सामने कमजोर साबित हो जाएंगे। प्रभाकर कृष्णमूर्ति के 2025 के अध्ययन के हवाले से रिपोर्ट कहती है कि हाशिये पर रहे सामाजिक समूहों के विद्यार्थियों के लिए प्रतिष्ठित संस्थानों में दाखिला आगे बढ़ने का रास्ता तो खोलता है, लेकिन परिसर में भेदभाव उन्हें पढ़ाई छोड़ने की ओर भी धकेलता है।

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महाराष्ट्र में आत्महत्या के मामले सबसे ज्यादा


आत्महत्या के मामलों में महाराष्ट्र सबसे आगे है। यहां 1,764 मामले दर्ज हुए। इसके बाद उत्तर प्रदेश में 1,060, दिल्ली में 385, हरियाणा में 237, पंजाब में 150, हिमाचल प्रदेश में 74 और उत्तराखंड व जम्मू-कश्मीर में 60-60 मामले सामने आए।

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खुदकुशी के 31.7% मामलों में पारिवारिक कारण


देश में 15 से 29 साल के आयु वर्ग में मौतों की वजह कोई बीमारी नहीं, बल्कि आत्महत्या है। देश में होने वाली कुल आत्महत्याओं में करीब 40% लोग 30 साल से कम उम्र के हैं। परीक्षा में नाकामी से जुड़े मामले 1.2 फीसदी ही हैं। आत्महत्या के सबसे ज्यादा 31.7 फीसदी मामलों में पारिवारिक कारण दर्ज हुए, जबकि बेरोजगारी 1.9% और परीक्षा में असफलता के चलते महज 1.2% मामले सामने आए।



2022 में 1.71 लाख आत्महत्या के मामले, 13,044 विद्यार्थी


वर्ष 2022 में देश में 1.71 लाख आत्महत्या के केस दर्ज हुए। इनमें 13,044 विद्यार्थी थे, यानी कुल मामलों में विद्यार्थियों की हिस्सेदारी 7.6 फीसदी रही।



पढ़ाई छोड़ने वालों में केंद्रीय विश्वविद्यालयों के विद्यार्थी सबसे ज्यादा


2018 से 2023 के बीच केंद्रीय विश्वविद्यालयों के 9,642, आईआईटी के 3,542 और आईआईएम के 42 विद्यार्थियों ने पढ़ाई बीच में छोड़ी। आईआईटी दिल्ली और खड़गपुर में एससी-एसटी के विद्यार्थियों में पढ़ाई छोड़ने की दर सामान्य वर्ग की तुलना में 318% अधिक है। रिपोर्ट के अनुसार, पढ़ाई छोड़ने वाले विद्यार्थियों में 47.6% ने आर्थिक तंगी के चलते पढ़ाई छोड़ी।



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कक्षा नौवीं से ही शुरू हो जाता है दबाव


विद्यार्थियों में गहरे तनाव की जड़ें कक्षा नौ से 12वीं तक पनपती हैं। कोचिंग का थकाने वाला दौर, पूरे समय तैयारी के बाद भी मनचाहे अंक न आना, मानसिक और शारीरिक थकान, घर से दूर होने का अकेलापन, कॉलेज में मिली नई आजादी को न संभाल पाना और माता-पिता का लगातार दबाव विद्यार्थियों के लिए बड़ी चुनौतियां बन रहे हैं। कुछ विद्यार्थी इस दबाव से उबर जाते हैं, जबकि कुछ अवसाद में घिर जाते हैं। समय पर मदद न मिले तो यही तनाव गंभीर संकट में बदल सकता है।