केन-बेतवा की धारा में सिर्फ पानी नहीं, भरोसा भी बहना चाहिए
By कृष्णमोहन झा
Published: Thursday, September 24, 2026, 18:17 [IST]
बुंदेलखंड की धरती पानी की प्रतीक्षा की एक लंबी कहानी अपने भीतर समेटे हुए है। सूखे खेत, खाली कुएं और पानी के लिए दूर तक जाना यहां के जीवन का हिस्सा रहे हैं। ऐसे में केन-बेतवा लिंक परियोजना बुंदेलखंड के लिए केवल एक बड़ी नदी जोड़ो परियोजना नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों की एक बड़ी उम्मीद है। परियोजना से 10.62 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई, 62 लाख लोगों के लिए पेयजल तथा 103 मेगावाट जल विद्युत और 27 मेगावाट सौर ऊर्जा उत्पादन का प्रावधान है। निश्चित रूप से यह परियोजना बुंदेलखंड की तस्वीर बदलने की क्षमता रखती है।
लेकिन विकास की हर बड़ी परियोजना अपने साथ एक सवाल भी लेकर आती है-उस विकास की कीमत कौन चुका रहा है? केन-बेतवा परियोजना के संदर्भ में यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके कारण कई परिवारों को अपने पुश्तैनी घर, जमीन और गांव छोड़ने पड़ रहे हैं।

छतरपुर और पन्ना के प्रभावित परिवारों के लिए पुनर्वास किसी सरकारी प्रक्रिया का नाम भर नहीं है। यह उनके जीवन के उस अध्याय का अंत है, जिसमें घर के आंगन की स्मृतियां हैं, खेत हैं, गांव का सामाजिक संसार है और पीढ़ियों से जुड़ी हुई जमीन है। इसलिए उनके लिए पुनर्वास का अर्थ केवल मुआवजा पाना नहीं, बल्कि अपने जीवन को नए सिरे से खड़ा करना है। यहीं से किसी भी बड़ी विकास परियोजना की वास्तविक परीक्षा शुरू होती है।
छतरपुर में प्रभावित गांवों तक पहुंचकर लोगों से सीधे संवाद करने की जो पहल दिखाई दे रही है, उसने पुनर्वास के सवाल को एक मानवीय आयाम दिया है। करौंदिया, पलकौंहा, सुकवाहा, मैनारी, कदवारा और नैगुवां सहित 15 गांवों में लगाए गए शिविरों में विभिन्न विभागों के अधिकारी ग्रामीणों के बीच पहुंचे। इसका महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि किसी कार्यालय की फाइल में दर्ज समस्या और गांव में बैठे परिवार की वास्तविक जरूरत हमेशा एक जैसी नहीं होती।
किसी परिवार के सामने आवास का प्रश्न है तो किसी के सामने पेंशन का। किसी बच्चे की पढ़ाई और छात्रवृत्ति का सवाल है तो किसी परिवार के सामने खेती या पशुपालन से आजीविका चलाने की चुनौती। किसी को स्वास्थ्य सुविधा चाहिए तो किसी को बिजली और पानी। छह शिविरों में दो हजार से अधिक लोगों को विभिन्न योजनाओं और सेवाओं से जोड़ने की प्रक्रिया इसी व्यापक जरूरत की तस्वीर सामने रखती है। स्वास्थ्य विभाग ने 753 लोगों का परीक्षण किया, आयुष विभाग ने 722 लोगों को सेवाएं दीं, शिक्षा से जुड़े 326 मामलों पर कार्रवाई हुई और प्रधानमंत्री आवास योजना के 322 प्रकरणों पर काम हुआ। गरीबी रेखा की सूची में 239 नाम जोड़े गए। पेंशन, पशु शेड, मत्स्य, कृषि, बिजली, आयुष्मान कार्ड और दूसरी योजनाओं से जुड़े मामलों में भी कार्रवाई हुई।
देखने में ये आंकड़े प्रशासनिक गतिविधियों का हिस्सा लग सकते हैं, लेकिन इनके पीछे असल कहानी उन परिवारों की है जिनके लिए एक स्वास्थ्य जांच, एक पेंशन, एक आवास या बच्चे की पढ़ाई से जुड़ी छोटी-सी सुविधा भी नए जीवन की बड़ी जरूरत बन जाती है। पुनर्वास की असली कसौटी यही है कि विस्थापित व्यक्ति को केवल नया पता मिले या नया जीवन भी। आर्थिक पुनर्वास इस पूरी प्रक्रिया की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। पिछले लगभग डेढ़ माह में 254 पात्र प्रभावित व्यक्तियों के पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन से जुड़े मामलों में 21 करोड़ 15 लाख 58 हजार 396 रुपये की राशि स्वीकृत की गई। 20 अगस्त को ही 93 प्रभावित व्यक्तियों के लिए 3 करोड़ 52 लाख 10 हजार 83 रुपये स्वीकृत किए गए। विभिन्न तकनीकी कारणों से भुगतान में आई रुकावटों के मामलों में तत्काल स्वीकृति लेकर 18.42 करोड़ रुपये का भुगतान किए जाने की जानकारी भी सामने आई है।
निश्चित रूप से समय पर मिलने वाली राशि विस्थापित परिवार के लिए नए जीवन की शुरुआत का आधार बन सकती है। लेकिन पुनर्वास की सफलता का अंतिम पैमाना स्वीकृत राशि का आंकड़ा नहीं, बल्कि यह होगा कि उस राशि ने परिवार के जीवन में कितना बदलाव पैदा किया। क्या वह परिवार नए स्थान पर अपना घर और आजीविका व्यवस्थित कर पाया? क्या उसके बच्चों की पढ़ाई बाधित नहीं हुई? क्या उसके सामने रोजमर्रा की जरूरतों को लेकर नई कठिनाइयां खड़ी नहीं हुईं? यही वे प्रश्न हैं जो किसी भी पुनर्वास को महज कागजी प्रक्रिया से आगे ले जाते हैं।
करौंदिया पुनर्वास स्थल की तस्वीर भी इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण है। अतिरिक्त नलकूप, हैंडपंप, बिजली के खंभे, सड़क और दूसरी मूलभूत सुविधाओं की जरूरत यह बताती है कि मकान बन जाना पुनर्वास की अंतिम मंजिल नहीं है। घर तब घर बनता है, जब उसके बाहर सड़क हो, भीतर बिजली हो, पास पानी हो और परिवार के पास भविष्य चलाने का साधन हो। इस पूरी प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण शब्द शायद विश्वासहै।
जिस व्यक्ति को अपना पुश्तैनी घर छोड़ना पड़ रहा हो, उसके मन में स्वाभाविक रूप से कई सवाल होते हैं। नया घर कैसा होगा? बच्चों की पढ़ाई कैसे चलेगी? रोजगार कहां से मिलेगा? नई जगह पर सामाजिक जीवन कैसा होगा? जो जमीन पीछे छूट रही है, उसकी भरपाई क्या केवल पैसों से हो सकती है? इन सवालों का उत्तर केवल कागजों में नहीं मिलता। इसके लिए संवाद जरूरी है।
ग्राम साड़ा, कर्री और भरतला में रहवासी प्लाट को लेकर प्रभावित परिवारों की सहमति सामने आना इसी संवाद की महत्वपूर्ण कड़ी है। पुनर्वास जितना सहभागिता के साथ होगा, उतनी ही संभावना रहेगी कि विस्थापन की पीड़ा धीरे-धीरे स्वीकार्यता में बदले और प्रभावित परिवार स्वयं को इस पूरी प्रक्रिया का हिस्सा महसूस करें। करौंदिया पुनर्वास स्थल पर जल संसाधन मंत्री तुलसीराम सिलावट का पहुंचना और ग्रामीणों के बीच बैठकर उनकी समस्याएं सुनना भी इसी संवाद का हिस्सा है। एक आदिवासी परिवार के घर पहुंचकर उसके साथ भोजन करना निश्चित रूप से आत्मीयता का दृश्य है, लेकिन ऐसे प्रयासों की वास्तविक सार्थकता तभी होगी जब ग्रामीणों द्वारा उठाए गए सवालों के समाधान भी जमीन पर दिखाई दें। क्योंकि प्रभावित परिवारों को संवेदनशीलता के साथ-साथ परिणाम भी चाहिए।
केन-बेतवा परियोजना का महत्व केवल मध्यप्रदेश तक सीमित नहीं है। बुंदेलखंड के एक बड़े हिस्से के लिए यह पानी और विकास की उम्मीद है। लेकिन किसी भी बड़ी परियोजना का मूल्यांकन केवल उसकी लागत, क्षमता या उससे मिलने वाले लाभ के आधार पर नहीं किया जा सकता। यह भी देखना होगा कि उस विकास की राह में आने वाले परिवारों के साथ कैसा व्यवहार हुआ और उनके पुनर्वास की प्रक्रिया कितनी मानवीय रही।
विकास का अर्थ यह नहीं हो सकता कि कुछ लोगों के लिए भविष्य बनाया जाए और कुछ लोगों से उनका वर्तमान छीन लिया जाए। विकास की सार्थकता तभी है, जब आगे बढ़ते समय पीछे छूटने वालों का हाथ भी थामा जाए।
केन-बेतवा की धारा बुंदेलखंड की प्यास बुझाए, खेतों को पानी दे और गांवों में समृद्धि लाए-यह इस पूरे अंचल की उम्मीद है। लेकिन इसी उम्मीद के साथ उन परिवारों की चिंता भी जुड़ी है जिन्होंने इस परियोजना के लिए अपना घर, अपनी जमीन और अपनी पुरानी जीवन-व्यवस्था छोड़ी है।
उनके लिए नया घर केवल ईंट और सीमेंट की चारदीवारी नहीं है। उसमें उनके बच्चों का भविष्य, उनकी आजीविका, उनकी सुरक्षा और उनका सम्मान भी शामिल है। छतरपुर में गांवों तक पहुंचकर समस्याएं सुनने, लोगों को विभिन्न योजनाओं से जोड़ने और पुनर्वास से जुड़े आर्थिक मामलों को आगे बढ़ाने की जो तस्वीर सामने आ रही है, वह इसी बड़े सवाल का उत्तर तलाशती दिखाई देती है। आखिरकार केन-बेतवा केवल दो नदियों को जोड़ने की परियोजना नहीं है। यह पानी के साथ विकास को और विकास के साथ लोगों के भविष्य को जोड़ने की भी परीक्षा है।
बुंदेलखंड को पानी मिले, खेत हरे हों, गांव समृद्ध हों और आने वाली पीढ़ियां पानी के संकट से मुक्त हों-इससे सुंदर भविष्य की कल्पना क्या हो सकती है? लेकिन उस भविष्य की नींव में उन परिवारों का विश्वास भी होना चाहिए, जिन्होंने इस सपने के लिए अपना वर्तमान बदला है। किसी नदी को जोड़ना तकनीक का काम हो सकता है, लेकिन विकास को लोगों के दिलों से जोड़ना विश्वास का काम है। शायद केन-बेतवा की सबसे बड़ी सफलता उस दिन मानी जाएगी, जब इसकी धारा खेतों तक पानी पहुंचाने के साथ उन परिवारों तक भी यह संदेश पहुंचाएगी कि विकास की इस यात्रा में वे अकेले नहीं हैं। बुंदेलखंड को पानी जरूर मिले, लेकिन उस पानी की पहली बूंद उन परिवारों के विश्वास तक भी पहुंचे, जिन्होंने इस विकास के लिए अपना घर छोड़ा है-तभी केन-बेतवा वास्तव में विकास की धारा कहलाएगी।