September 19, 2026

‘हिंसा से समस्या केवल टलती है, सुलझती नहीं’ - यूएन महासभा अध्यक्ष

‘हिंसा से समस्या केवल टलती है, सुलझती नहीं’ - यूएन महासभा अध्यक्ष

बांग्लादेश के वरिष्ठ राजनयिक और विदेश मंत्री ख़लीलुर रहमान ने अपने एक वर्ष के कार्यकाल का मुख्य लक्ष्य संयुक्त राष्ट्र में भरोसा बहाल करना रखा है.

वह इसे 1945 में संगठन की स्थापना के समय की उम्मीदों और आज सदस्य देशों की अपेक्षाओं के बीच बढ़े फ़ासले से जोड़ते हैं.

संयुक्त राष्ट्र के सबसे व्यस्त, उच्चस्तरीय सप्ताह की शुरुआत पर यूएन न्यूज़ से बातचीत में ख़लीलुर रहमान ने बताया कि संयुक्त राष्ट्र में ज़रूरी बदलाव उनके लिए क्या मायने रखते हैं, कृत्रिम बुद्धिमत्ता क्यों एक अभूतपूर्व चुनौती है और रोहिंज्या संकट से मिले कौन-से सबक़ वह अपनी अध्यक्षता में साथ लेकर आए हैं.

उन्होंने उन आलोचनाओं पर भी जवाब दिया, जिनके अनुसार गतिरोध से जूझती सुरक्षा परिषद की तुलना में महासभा कम प्रभावी है. साथ ही उन्होंने चार दशक पहले बांग्लादेश की एक पूर्व महासभा अध्यक्षता के दौरान अपने अनुभवों और अब स्वयं इस पद तक पहुँचने के सफ़र को याद किया.

© UN Photo/Eskinder Debebe महासचिव एंतोनियो गुटेरेश (बाएँ) और महासभा की पूर्व अध्यक्ष ऐनालेना बेयरबॉक (दाएँ) के साथ ख़लीलुर रहमान, महासभा के 81वें सत्र की अध्यक्षता सम्भालते हुए.
यूएन न्यूज़: उच्चस्तरीय सप्ताह शुरू हो गया है. आपकी क्या अपेक्षाएँ हैं और आप चाहते हैं कि विश्व नेता इससे क्या सन्देश लेकर जाएँ?

ख़लीलुर रहमान: उच्चस्तरीय सप्ताह दुनिया को एक मंच पर लाने की संयुक्त राष्ट्र की क्षमता का सबसे प्रभावशाली उदाहरण है. यह विश्व नेताओं से सीधे सुनने का अवसर देता है कि वे दुनिया, अपने क्षेत्र और अपने देश की स्थिति को कैसे देखते हैं और संयुक्त राष्ट्र से क्या अपेक्षा रखते हैं.

मैं विशेष रूप से यह जानना चाहता हूँ कि वे संगठन में भरोसा बहाल करने के बारे में क्या सोचते हैं. यही मेरी अध्यक्षता की प्रमुख प्राथमिकता है और उनके विचार आगे के काम को दिशा देने में मदद करेंगे.

यूएन न्यूज़: आपकी अध्यक्षता के केन्द्र में भरोसा बहाल करना है. व्यवहार में इसका क्या मतलब है, और आपको कैसे पता चलेगा कि आप इसमें सफल हो रहे हैं?

ख़लीलुर रहमान: हमें 1945 में संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के समय की ओर लौटना होगा. उस वर्ष याल्टा में राष्ट्रपति रूज़वेल्ट, स्टालिन और चर्चिल ने युद्ध समाप्त करने की तैयारियों के साथ ऐसे विश्व संगठन की परिकल्पना की, जिसका मुख्य उद्देश्य विश्व युद्ध जैसी तबाही को दोबारा होने से रोकना था.

सैन फ़्रांसिस्को में संयुक्त राष्ट्र की औपचारिक स्थापना पर प्रतिनिधिमंडलों ने बहुत देर तक खड़े होकर तालियाँ बजाईं. यह उस उम्मीद का प्रतीक था कि संगठन दुनिया में शान्ति सुनिश्चित कर सकेगा.

मुझे यह कहते हुए ख़ुशी हो रही है कि पिछले आठ दशकों में हम बड़े पैमाने के वैश्विक युद्ध से बचे हैं. जो देश उस समय इस प्रक्रिया का हिस्सा नहीं थे, वे औपनिवेशिक शासन से मुक्त हुए और उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के भीतर विकास के एक मज़बूत स्तम्भ के निर्माण में योगदान दिया.

लेकिन हम अनेक हिंसक टकरावों को रोक नहीं पाए और विकास की प्रगति भी अक्सर धीमी रही है. हमें यह सुनिश्चित करने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी कि सुरक्षा परिषद अधिक समन्वित ढंग से काम करे और उससे जो अपेक्षा की गई थी, उसे पूरा करे.

शान्ति और विकास, दोनों मोर्चों पर अधूरी अपेक्षाओं ने निराशा और संयुक्त राष्ट्र के प्रति भरोसे में कमी को जन्म दिया है.

मानवाधिकार हमारा तीसरा स्तम्भ है, लेकिन कुल ख़र्च का केवल चार प्रतिशत इस पर होता है. यहाँ भी काफ़ी प्रगति हुई है, मगर बहुत कुछ बाक़ी है.

संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के समय जैसा भरोसा था, उसे बहाल करने के लिए हमें शान्ति, विकास और मानवाधिकार - तीनों स्तम्भों पर मज़बूती से काम करना होगाइसके लिए सभी सदस्य देशों और हितधारकों का सहयोग ज़रूरी है.

यूएन न्यूज़: आपने कहा है कि यह 1945 की दुनिया नहीं है और परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं. ऐसा कौन-सा बड़ा बदलाव है, जिसकी ओर आप इशारा करेंगे?

ख़लीलुर रहमान: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI). यह मानव प्रगति को तेज़ करने का शक्तिशाली साधन बन सकती है, लेकिन कुछ विशेषज्ञों की चेतावनियों को देखें तो इससे मानवता के लिए गम्भीर ख़तरे भी पैदा हो सकते हैं.

नवाचार को धीमा नहीं करना चाहिए, लेकिन उसके लिए स्पष्ट सुरक्षा उपाय ज़रूरी हैं, ताकि AI मानवता के हित में काम करे, उसके ख़िलाफ़ नहीं.

यह केवल सरकारों की ज़िम्मेदारी नहीं है. AI के विकास और इस्तेमाल से जुड़े सभी पक्षों को चर्चा एवं निर्णय प्रक्रिया में शामिल करना होगा, ताकि इसके सुरक्षित और मानव-केन्द्रित इस्तेमाल की राह तय की जा सके.

यूएन न्यूज़: आलोचक कहते हैं कि महासभा के प्रस्तावों का नैतिक महत्व तो है, लेकिन उन्हें लागू कराने की शक्ति नहीं है, जबकि असली ताक़त गतिरोध से जूझती सुरक्षा परिषद के पास है. आप इस पर क्या कहेंगे?

ख़लीलुर रहमान: अगर महासभा का महत्व नहीं होता, तो उच्चस्तरीय सप्ताह नहीं होता और राष्ट्राध्यक्ष यहाँ नहीं आते. इसकी सबसे बड़ी ताक़त पूरी दुनिया को एक मंच पर लाने की क्षमता है. ऐसा दूसरा कोई मंच नहीं है.

कूटनीति हमेशा सार्वजनिक रूप से नहीं होती. महासभा, विश्व नेताओं को गम्भीर मुद्दों पर बातचीत और समाधान तलाशने के लिए एक सुरक्षित मंच देती है. यह विश्व नेताओं के विचार और प्राथमिकताएँ सीधे सुनने का भी एक अहम मंच है.

मेरा मानना है कि महासभा अन्तरराष्ट्रीय मानदंड तय करने और वैश्विक समुदाय को व्यापक दिशा देने में अहम भूमिका निभाती रहेगी.

यूएन न्यूज़: आपने रोहिंग्या संकट पर सीधे काम किया है. इस अनुभव से मिले कौन-से सबक़ आप अपनी अध्यक्षता में साथ लेकर आए हैं?

ख़लीलुर रहमान: यह एक गम्भीर मानवीय संकट है. लोगों पर हमले हुए, घरों पर बमबारी की गई, गाँव जला दिए गए और उन्हें अपने ही देश से खदेड़ दिया गया. गर्भवती महिलाओं पर भी भयावह अत्याचार हुए.

लेकिन मैंने उनकी सहनसक्षमता और घर लौटने की गहरी इच्छा भी देखी. पिछले वर्ष महासचिव के कॉक्सेस बाज़ार दौरे के दौरान रमज़ान की एक शाम एक लाख से अधिक शरणार्थी उनके साथ इफ़्तार के लिए जुटे. हर किसी के हाथ में तख़्ती थी, जिस पर लिखा था, “हम घर लौटना चाहते हैं.”

इससे मैंने यही सीखा कि हिंसा किसी समस्या का समाधान नहीं करती. वह उसे केवल टालती है और अधिक गम्भीर बना देती है. समाधान केवल बातचीत, वार्ता और मिलकर आगे बढ़ने से सम्भव है.

इसीलिए महासभा इतनी महत्वपूर्ण है - यह ऐसा सुरक्षित मंच है, जहाँ विश्व नेता साथ बैठकर आगे का रास्ता तलाश सकते हैं.

यूएन न्यूज़: जब आपकी अध्यक्षता का अन्तिम दिन आएगा, तो आप किन उपलब्धियों को गर्व से याद करना चाहेंगे?

ख़लीलुर रहमान: मैंने अपनी टीम से कहा है कि मेरी नज़र आज पर नहीं, बल्कि उस दिन पर है जब मैं महासभा का पारम्परिक हथौड़ा अपने उत्तराधिकारी को सौंपूँगा.

अगर मैं सदस्य देशों को संगठन में ज़रूरी सुधारों, उसकी वित्तीय स्थिरता बनाए रखने और ज़मीनी स्तर पर नतीजे तेज़ी से पहुँचाने पर सहमत कराने में कुछ प्रगति कर पाया, तो मैं प्रसन्नता से यह ज़िम्मेदारी अपने उत्तराधिकारी को सौंप पाऊँगा.