September 16, 2026

महिलाओं के उत्पीड़न के बावजूद तालिबान के लिए स्वीकार्यता क्यों? | Why the acceptance of the Taliban despite the oppression of women?

अगर महिलाओं की जगह पुरुषों से शिक्षा, करियर, आजादी और उनकी सार्वजनिक आवाज छीन ली जाती, तो क्या दुनिया की प्रतिक्रिया ऐसी ही होती? अफगानिस्तान की मिसाल बुनियादी मानवाधिकारों के बारे में कई सवाल उठाती है.

1978 में नारीवादी लेखिका ग्लोरिया स्टाइनम ने मिस मैगजीन नाम की पत्रिका के अक्टूबर एडिशन में ‘इफ मेन कुड मेंसट्रूएट' नाम का एक निबंध लिखा था. निबंध में उन्होंने पूछा था कि अगर महिलाओं की जगह पुरुषों को हर महीने पीरियड्स होते, तो समाज उन्हें किस तरह देखता. उनका कहना था कि शायद जिस चीज को आज महिलाओं के लिए शर्म या परेशानी से जोड़ा जाता है, वही पुरुषों के लिए गर्व की बात बन जाती.

इसी तरह नारीवादी फ्लोरिन्स कैनेडी ने भी कहा था कि अगर पुरुष गर्भवती हो सकते, तो समाज अबॉर्शन को एक पवित्र क्रिया जैसा देखता. इन बातों से एक बड़ा सवाल सामने आता है: अगर समाज के बनाए नियम सीधे तौर पर पुरुषों का अहित करते, तो क्या उन्हें भी वैसे ही नजरअंदाज किया जाता जैसे आज तालिबान और तालिबान जैसी शक्तियां दुनियाभर में कर रही हैं?

20 महिलाओं को जबरन हिरासत में लिया

हाल ही में डेली मेल और एएमयू टीवी के हवाले से सामने आई एक घटना में बताया गया है कि शनिवार शाम तालिबान के नैतिकता अधिकारियों ने राजधानी काबुल की सड़कों से कम से कम 20 महिलाओं और युवा लड़कियों को जबरन हिरासत में ले लिया. इसका एक वीडियो भी सामने आया है. इससे प्रतीत होता है कि तालिबान शासन में महिलाओं की बुनियादी स्वतंत्रता और मानवाधिकार सुरक्षित नहीं हैं.

इन रिपोर्टों के अनुसार, यह घटना काबुल के व्यस्त तैमानी इलाके की है. वहां तालिबान के 'सदाचार संवर्धन और बुराई निवारण' मंत्रालय के लोगों ने सड़कों पर गश्त करते हुए महिलाओं को निशाना बनाया. इस पूरी कार्रवाई का मुख्य आधार तथाकथित 'अनुचित हिजाब' और सख्त पोशाक नियमों का उल्लंघन बताया गया. फिलहाल इस घटना की वीडियो वायरल हो चुकी है. अभी तक तालिबान का कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है.

रिपोर्ट में प्रत्यक्षदर्शियों और स्थानीय निवासियों ने बताया के कि यह कोई साधारण पूछताछ नहीं थी, बल्कि बेहद हिंसक और अपमानजनक कार्रवाई थी. कहा जा रहा है कि गिरफ्तार की गई महिलाओं में एक गर्भवती महिला भी शामिल थी. तालिबानी अधिकारियों और उनके साथ मौजूद महिला कर्मचारियों ने आम नागरिकों के सामने ही महिलाओं को जबरन हिरासत में लिया.

महिला उत्पीड़न के मामले नए नहीं

केरल की लोकप्रिय महिला ट्रैवल ब्लॉगर 'बैकपैकर अरुणिमा' को अफगानिस्तान के बामियान प्रांत में तालिबान अधिकारियों द्वारा हिरासत में ले ली गईं और कई मिन्नतों के बाद उन्हें छोड़ा गया. और यह कोई नई बात नहीं है. अगस्त 2021 में तालिबान के दोबारा सत्ता में आने के बाद अफगानिस्तान में महिलाओं और लड़कियों के अधिकारों पर लगातार गंभीर प्रतिबंध लगाए गए हैं. तालिबान ने लड़कियों को माध्यमिक विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में पढ़ने से रोक दिया और महिलाओं के रोजगार पर भी व्यापक पाबंदियां लगाईं. महिलाओं को कई गैर-सरकारी संगठनों में काम करने से रोका गया तथा उनके पहनावे, आवाजाही और सार्वजनिक जीवन में भागीदारी पर कड़े नियम लागू किए गए.

2023 में महिलाओं के लिए विश्वविद्यालय की शिक्षा पर प्रतिबंध और 2024 में महिलाओं के सार्वजनिक जीवन, रोजगार और स्वतंत्रता को सीमित करने वाले नए नियमों ने स्थिति को और गंभीर बना दिया. महिलाओं के लिए ब्यूटी सैलून, जिम और मनोरंजन स्थलों पर भी प्रतिबंध लगाए गए, जबकि चिकित्सा शिक्षा से महिलाओं को बाहर करने के फैसले ने उनके स्वास्थ्य और भविष्य के रोजगार को प्रभावित किया. इन लगातार और व्यवस्थित प्रतिबंधों को देखते हुए अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय के अभियोजक ने तालिबान के वरिष्ठ नेताओं पर महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ लैंगिक आधार पर उत्पीड़न के आरोप लगाए. और इन सभी मामलों और आरोपों के बावजूद तालिबान को आखिरकार दुनियाभर में एक तरीके की स्वीकार्यता मिल ही गई है.

महिलाओं के अधिकारों पर चोट फिर भी तालिबान को समर्थन क्यों?

तालिबान के 2021 में सत्ता में वापस आने को केवल उनकी धार्मिक विचारधारा के कारण नहीं समझा जा सकता. एलएसी पब्लिक पॉलिसी रिव्यु में शोधकर्ता फ्लोरियन वाइगैंड ने लिखा है कि अमेरिका और दूसरे देशों के लंबे हस्तक्षेप के दौरान अफगान सरकार और आम लोगों के बीच दूरी बढ़ती गई और उस सरकार को कई लोगों ने भ्रष्ट और अपने हित में काम करने वाली सरकार के रूप में देखा. इसके विपरीत, तालिबान ने खुद को विदेशी हस्तक्षेप और भ्रष्ट सरकार के खिलाफ खड़ी एक ताकत के रूप में पेश किया, जिससे उन्हें कुछ इलाकों में समर्थन मिला. वाइगैंड के अनुसार, लोगों को तालिबान जरूरी नहीं कि अच्छे लगते थे, लेकिन कई जगह वे उन्हें सरकार से "कम बुरा” विकल्प मानते थे, खासकर जब तालिबान स्थानीय विवादों को जल्दी और आसानी से सुलझाने जैसी सेवाएं देते थे.

लेखक फिन्टन ओ'टूल ने भी अफगानिस्तान में अमेरिकी हस्तक्षेप की आलोचना करते हुए सवाल उठाया कि क्या किसी बाहरी ताकत के लिए दूसरे देश पर अपनी राजनीतिक व्यवस्था थोपना वास्तव में सफल हो सकता है. लेकिन ऐसा कैसे है कि इतनी महिलाओं के अधिकारों का हनन हुआ और फिर भी हम आए दिन ऐसी रीलें, ऐसे वीडियो देखते हैं जिनमें बड़े बड़े इन्फ्लुएंसर उनके गुणगान गा रहे हैं, लोग तालिबान की रणनीतिक समझ की तारीफों के पुल बांध रहे हैं, उनके साथ कारोबार बहाल किया गया और उनकी अर्थव्यवस्था और देश चलाने की मिसालें पेश की गईं.

इन सभी तथ्यों और तर्कों के बावजूद नारीवादी दार्शनिकों और लेखकों का सवाल वही है: कि यदि ऐसे मानवाधिकार उल्लंघन पुरुषों के साथ हो रहे होते, क्या तब भी तालिबान को वही स्वीकार्यता हासिल होती जो आज उन्हें कहीं न कहीं मिली है?

पुरुषों के उत्पीड़न को मिली अलग नजर

अगर हम इतिहास और अलग-अलग समाजों को देखें, तो एक सवाल सामने आता है कि क्या हम किसी मानवाधिकार उल्लंघन को केवल उसके स्वरूप से देखते हैं, या इस बात से भी कि उसका शिकार कौन है. पुरुष भी युद्ध, हिंसा, जबरन काम करवाने, बिना कारण हिरासत में रखने, यातना,घरेलू हिंसा और दूसरे गंभीर अत्याचारों के शिकार हुए हैं. लेकिन कई मामलों में यह भी देखा गया है कि जब पुरुष किसी ऐसी स्थिति में पीड़ित होते हैं जिसे समाज आमतौर पर "कमजोरी” या "महिलाओं की समस्या” मानता है, तो उनकी तकलीफ को पहचानने में समय लगता है.

उदाहरण के लिए, ब्रिटेन की सरकार ने अपनी मेल विक्टिम्स पोजीशन स्टेटमेंट 2019 में माना है कि पुरुष भी घरेलू हिंसा और दूसरे प्रकार की हिंसा के शिकार हो सकते हैं और "पुरुष पीड़ित नहीं हो सकते” जैसी सामाजिक धारणाएं उन्हें मदद लेने से रोक सकती हैं. यह केवल यौन हिंसा का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह दिखाता है कि कभी-कभी समाज पीड़ित की पहचान के आधार पर किसी अन्याय को देखने का अपना नजरिया बदल देता है.

तालिबान की वैश्विक स्वीकार्यता?

तालिबान के साथ दुनिया का व्यवहार एक दिलचस्प विरोधाभास दिखाता है. जुलाई 2025 में रूस तालिबान सरकार को औपचारिक रूप से मान्यता देने वाला पहला देश बना, लेकिन बाकी दुनिया ने अभी तक ऐसा कदम नहीं उठाया. इसके बावजूद कई देशों ने तालिबान को पूरी तरह अलग-थलग भी नहीं किया है. चीन, पाकिस्तान, संयुक्त अरब अमीरात और उज्बेकिस्तान ने काबुल में राजदूत नियुक्त किए हैं, जबकि भारत ने औपचारिक मान्यता दिए बिना तालिबान के साथ उच्च-स्तरीय बातचीत, मानवीय सहायता और व्यापारिक संबंध जारी रखे हैं.

भारत ने ईरान के चाबहार बंदरगाह के जरिए अफगानिस्तान के साथ व्यापार और अफगान व्यापारियों से जुड़े मुद्दों पर भी बातचीत की है. ईरान और खाड़ी के कुछ देशों ने भी तालिबान के साथ व्यावहारिक संबंध बढ़ाए हैं. यानी औपचारिक मान्यता न देने और व्यवहार में तालिबान के साथ काम करने के बीच एक अंतर बना हुआ है.

कई देश तालिबान की नीतियों, खासकर महिलाओं के अधिकारों पर उसके प्रतिबंधों को स्वीकार करने की बात किए बिना, सुरक्षा, व्यापार, सीमा, प्रवासन, ऊर्जा और क्षेत्रीय हितों के कारण उसके साथ काम कर रहे हैं. लेकिन अगर किसी समाज में पुरुषों को महिलाओं की तरह शिक्षा से रोका जाता, काम करने से रोका जाता, अकेले बाहर निकलने पर पाबंदियां लगाई जातीं, उनके कपड़े और पहनावा तय किया जाता, उनकी सार्वजनिक आवाज दबाई जाती और उनके जीवन के बड़े फैसले उनके लिए कोई दूसरा करता, तो क्या दुनिया इसे उसी गंभीरता और उसी तत्परता से देखती? सवाल यह नहीं है कि पुरुषों के साथ होने वाले अन्याय कम महत्वपूर्ण हैं या महिलाओं के साथ होने वाले ज्यादा. सवाल यह है कि क्या हम किसी अन्याय को इसलिए अलग तरह से देखते हैं क्योंकि उसका शिकार वह व्यक्ति है जिसे समाज आमतौर पर ताकतवर मानता है?