हीरा धरती का सबसे सख्त प्राकृतिक पदार्थ माना जाता है. इसे आमतौर पर कभी न पिघलने वाला समझा जाता है लेकिन बेहद चरम परिस्थितियों में यह भी पिघल जाता है. वैज्ञानिकों ने हाल ही में एक नए लेजर प्रयोग से हीरे के पिघलने के तापमान का सबसे सटीक माप लिया है. नतीजे चौंकाने वाले हैं.
पहले के प्रयोगों में जो आंकड़े बताए गए थे वे असल तापमान से 1300 डिग्री फारेनहाइट यानी करीब 700 डिग्री सेल्सियस ज्यादा थे. यह गलती लगभग 20 प्रतिशत की थी. नया माप सैद्धांतिक मॉडल से मेल खाता है. दो दशक पुरानी पहेली सुलझाता है. यह खोज परमाणु संलयन ऊर्जा और यूरेनस व नेप्च्यून जैसे विशाल ग्रहों के अंदरूनी हिस्से को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है.
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वैज्ञानिकों ने सिंथेटिक हीरे की छोटी प्लेटों पर अल्ट्रावॉयलेट लेजर की तेज किरणें दागीं. इन किरणों से पैदा हुए शॉकवेव इतने शक्तिशाली थे कि हीरा पारदर्शी से आईने जैसा चमकदार हो गया. चमक में यह तेज बदलाव हीरे के पिघलने का संकेत था. शोधकर्ताओं ने हीरे की चमक और रिफ्लेक्शन को मापकर तापमान सही बताया.

लॉरेंस लिवरमोर नेशनल लैबोरेटरी के वैज्ञानिक मारियस मिलॉट के अनुसार उन्होंने हीरे के नमूनों को सूर्य की सतह से भी गर्म तापमान और नेप्च्यून व यूरेनस के केंद्र से ज्यादा दबाव पर संकुचित किया. फिर भी परमाणु संरचना तापमान घनत्व और ऑप्टिकल रिफ्लेक्शन को मापने में सफलता मिली.
एक्स-रे डिफ्रैक्शन से यह भी पता चला कि हीरा पिघलने से पहले किसी अन्य ठोस कार्बन रूप में नहीं बदला. परमाणुओं को फिर से व्यवस्थित करने के लिए जरूरी ऊर्जा बहुत अधिक होने के कारण ऐसा नहीं हुआ.
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पुरानी गलती और नई खोज का महत्व
पहले के प्रयोगों और सैद्धांतिक मॉडल के बीच 2240 डिग्री फारेनहाइट का अंतर था. वैज्ञानिक दो दशक से इस दिक्कत को समझाने की कोशिश कर रहे थे. नए प्रयोग ने साबित किया कि हीरे का असल पिघलने का तापमान पहले सोचे गए से काफी कम है. लगभग 660 से 1060 गीगापास्कल दबाव और 6727 डिग्री सेल्सियस तापमान पर हीरा ठोस टुकड़ों के रूप में तरल कार्बन में तैरता हुआ पाया गया.
जैसे-जैसे दबाव बढ़ता है ज्यादा हीरा तरल कार्बन में बदल जाता है. तरल कार्बन बहुत अजीब पदार्थ है. यह धातु जैसा व्यवहार करता है यानी बिजली का संचालन करता है और हीरे से भी सघन होता है. अगर किसी तरह इसे कप में रखा जा सके तो ठोस हीरे का टुकड़ा उसमें बर्फ के क्यूब की तरह तैर सकता है.

परमाणु संलयन और ग्रहों के अध्ययन में उपयोग
यह जानकारी परमाणु संलयन यानी न्यूक्लियर फ्यूजन रिसर्च के लिए बेहद जरूरी है. फ्यूजन स्टारों को ऊर्जा देने वाली प्रक्रिया है और भविष्य का संभावित ऊर्जा स्रोत भी. कई प्रयोगों में लेजर से हीरे के कैप्सूल को पिघलाकर और कुचलकर उसके अंदर ड्यूटेरियम और ट्रिटियम को 30 पेटापास्कल से ज्यादा दबाव और 100 मिलियन डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान पर लाया जाता है.
सही तापमान जानने से मॉडल ज्यादा सटीक बनेंगे और फ्यूजन प्रयोग बेहतर होंगे. इसी तरह यूरेनस और नेप्च्यून जैसे आइस जायंट ग्रहों के अंदर हीरों की बारिश होने और तरल कार्बन के महासागर में हीरे तैरने की परिकल्पना को भी अब बेहतर तरीके से समझा जा सकेगा.
शोधकर्ताओं का मानना है कि कई बार लगाए गए शॉक वेव हीरे को किसी अन्य ठोस रूप में बदल सकते हैं. यह समझना फ्यूजन प्रयोगों के लिए महत्वपूर्ण है. हीरे जैसी चरम परिस्थितियों में पदार्थों का व्यवहार जानने से न सिर्फ ऊर्जा अनुसंधान बल्कि खगोल विज्ञान और पदार्थ विज्ञान को भी नई दिशा मिलेगी.
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