UP Assembly Election 2027:यूपी में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं, जिसको लेकर सभी राजनीतिक दलों ने तैयारियां शुरू कर दी है. यूपी के प्रमुख जिलों में से एक सुल्तानपुर विधानसभा है, जिसमें पांच विधानसभा इसौलीस, सुलतानपुर, सदर, लम्भुआ, कादीपुर (असुरक्षित/SC) सीटें शामिल है. इसके साथ ही हमारे विशेष कार्यक्रम कुर्सी का काउंनडाउन में हम सुलतानपुर विधानसभा सीट के बारें में बात करेंगे.
सुलतानपुर की राजनीतिक हवा तय करती है लखनऊ का तख्त
उत्तर प्रदेश की राजनीति में सुल्तानपुर विधानसभा सीट का इतिहास बेहद दिलचस्प और अहम रहा है. परिसीमन से पहले इसे 'जयसिंहपुर' के नाम से जाना जाता था, लेकिन 2008 में हुए परिसीमन के बाद इस सीट का नया नाम 'सुल्तानपुर' रख दिया गया. यह सीट सुल्तानपुर संसदीय क्षेत्र की पांच विधानसभा सीटों में से एक है. इस सीट के बारे में एक बेहद मशहूर कहावत है कि जिस भी राजनीतिक दल का उम्मीदवार सुल्तानपुर से चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचता है, राज्य में सरकार उसी पार्टी की बनती है. 1977 से लेकर 1993 तक लगातार यह ट्रेंड देखने को मिला और जिस दल ने इस सीट पर जीत का परचम लहराया, उसी ने लखनऊ के सिंहासन पर राज किया.
2017 में बीजेपी के सूर्यभान सिंह ने जमाया था कब्जा
2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में इस सीट पर भारतीय जनता पार्टी का दबदबा देखने को मिला था. मोदी लहर के बीच बीजेपी प्रत्याशी सूर्यभान सिंह ने 86 हजार 786 वोट हासिल कर प्रचंड जीत दर्ज की थी. इस चुनाव में बहुजन समाज पार्टी के मुजीब अहमद 54 हजार 393 वोटों के साथ दूसरे स्थान पर रहे थे, जबकि समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार तीसरे नंबर पर पिछड़ गए थे.
2022 में भी कायम रही बीजेपी की बादशाहत
हालिया राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो 2022 के विधानसभा चुनाव में भी सुल्तानपुर सीट पर बेहद कांटे की टक्कर देखने को मिली. बीजेपी के विनोद सिंह ने समाजवादी पार्टी के अनूप अनूप सांडा को महज 1,009 वोटों के बेहद बारीक अंतर से हराकर इस सीट पर भारतीय जनता पार्टी का कब्जा बरकरार रखा. 2022 में जीत हासिल कर बीजेपी ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि सुल्तानपुर का सियासी किला भेदना विरोधियों के लिए आसान नहीं है.
2007 और 2012 में चला था सपा नेता अनूप सांडा का जादू
साल 2017 से पहले सुल्तानपुर सीट समाजवादी पार्टी के मजबूत गढ़ के रूप में जानी जाती थी. 2012 के विधानसभा चुनाव में सपा उम्मीदवार अनूप सांडा ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 57 हजार 811 वोट हासिल किए और बसपा के मोहम्मद ताहिर खान को मात देकर जीत का परचम फहराया. इससे पहले 2007 के चुनाव में भी अनूप सांडा ने अपनी राजनीतिक ताकत का परिचय देते हुए बीजेपी के ओम प्रकाश पांडे को हराया था, जबकि कांग्रेस उम्मीदवार मुईद अहमदी 23 हजार 892 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे थे.
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समाजवादी पार्टी का गढ़ रही इसौली सीट
उत्तर प्रदेश की राजनीति में सुल्तानपुर जिले की इसौली विधानसभा सीट समाजवादी पार्टी के लिए एक ऐसा मजबूत किला साबित हुई है, जिसे ध्वस्त करना विरोधी दलों के लिए पिछले दो दशकों से चुनौती बना हुआ है. साल 2002 से लेकर 2022 तक हुए लगातार पांच विधानसभा चुनावों में इसौली की जनता ने साइकिल के निशान पर ही भरोसा जताया है. मुलायम सिंह यादव के दौर में एमवाई (मुस्लिम-यादव) समीकरण और स्थानीय सामाजिक ताने-बाने के दम पर तैयार हुआ यह गढ़ इतना मजबूत रहा कि 2017 की प्रचंड 'मोदी लहर' में भी विरोधियों के हाथ निराशा ही लगी.
1977 से 2022 तक का सियासी इतिहास और दलीय स्थिति
अगर 1977 से 2022 तक के पिछले 12 विधानसभा चुनावों के आंकड़ों पर नजर डालें, तो शुरुआत में इस सीट पर किसी एक दल का स्थायी वर्चस्व नहीं रहा, लेकिन 2002 के बाद से यहां का पूरा सियासी परिदृश्य बदल गया. इस अवधि में समाजवादी पार्टी ने लगातार 5 बार (2002, 2007, 2012, 2017 और 2022) जीत दर्ज की है. वहीं, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 2 बार, भारतीय जनता पार्टी ने 1 बार (1991), बहुजन समाज पार्टी ने 1 बार (1996), जनता दल ने 1 बार (1989), जनता पार्टी ने 1 बार (1977) और निर्दलीय प्रत्याशी ने 1 बार (1993) इस सीट पर परचम फहराया है.
2002 से जारी है सपा का विजयी सफर
इसौली सीट पर समाजवादी पार्टी के विजयी अभियान की नींव 2002 में चंद्रभद्र सिंह 'सोनू' ने रखी थी. इसके बाद से चुनाव दर चुनाव चेहरे भले बदलते रहे, लेकिन नतीजे हमेशा सपा के पक्ष में ही रहे। वर्ष 2002 और 2007 में चंद्रभद्र सिंह 'सोनू' सपा के टिकट पर विधायक बने. इसके बाद 2012 और 2017 के चुनाव में सपा के अबरार अहमद ने जीत की हैट्रिक बनाई. वहीं 2022 के हालिया चुनाव में सपा ने मोहम्मद ताहिर खान पर दांव लगाया और उन्होंने भी पार्टी के विजय रथ को रुकने नहीं दिया.
2022 का चुनाव: महज 269 वोटों का सांसें थाम देने वाला मुकाबला
2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में इसौली सीट पर पूरे राज्य की सबसे रोमांचक जंग देखने को मिली थी. भारतीय जनता पार्टी ने इस किले को फतह करने के लिए पूरी ताकत झोंक दी थी. सपा के मोहम्मद ताहिर खान ने बेहद कड़े मुकाबले में भारतीय जनता पार्टी के ओम प्रकाश पांडे 'बजरंगी' को महज 269 वोटों के बेहद बारीक अंतर से मात दी थी. जीत का यह सूक्ष्म अंतर यह साफ बयां करता है कि अब इस सीट पर मुकाबला बेहद करीबी और तीखा हो चुका है.
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इसौली का जातीय गणित और सामाजिक ताना-बाना
सपा का 'एमवाई' किला:इसौली में लगभग 80 हजार मुस्लिम और 40 हजार से अधिक यादव मतदाता सपा की सबसे बड़ी ताकत माने जाते हैं, जो चुनाव की शुरुआत में ही पार्टी को मजबूत बढ़त दिला देते हैं.
सवर्ण और गैर-यादव ओबीसी का ध्रुवीकरण: भाजपा मुख्य रूप से ब्राह्मण, क्षत्रिय और गैर-यादव ओबीसी मतदाताओं की लामबंदी पर भरोसा करती है. 2022 में बीजेपी के ओम प्रकाश पांडे को इन वर्गों का भारी समर्थन मिला, जिससे हार-जीत का फासला सिमटकर 269 वोटों पर आ गया.
सोनू-मोनू का व्यक्तिगत प्रभाव: पूर्व विधायक चंद्रभद्र सिंह 'सोनू' और उनके भाई यशभद्र सिंह 'मोनू' का व्यक्तिगत प्रभाव भी स्थानीय राजनीति में काफी मायने रखता है. उनके समर्थक सवर्ण और अति-पिछड़ा वर्ग के वोट बैंक में अच्छी पैठ रखते हैं.
दलित मतों की भूमिका: बसपा के कैडर वोट का विभाजन इस सीट पर एक्स-फैक्टर साबित होता है. दलित मतों का बसपा के पाले में रहना या भाजपा-सपा की ओर शिफ्ट होना सीधे तौर पर चुनावी नतीजों को प्रभावित करता है.
2027 के महासंग्राम पर टिकीं सब की निगाहें
2022 में मामूली अंतर से चूकने के बाद बीजेपी इस सीट पर बूथ स्तर पर माइक्रो-मैनेजमेंट कर रही है ताकि 269 वोटों के फासले को पाटा जा सके. दूसरी ओर, सपा पर अपना दो दशक पुराना गढ़ बचाने का भारी दबाव है. स्थानीय लोगों में अब यही चर्चा जोरों पर है कि मुलायम सिंह यादव के दौर में बना सपा का यह मजबूत किला क्या 2027 के चुनाव में भी अखिलेश यादव के नेतृत्व में अभेद्य बना रहेगा, या फिर सीएम योगी की अगुवाई में बीजेपी इस बार इसौली पर अपना परचम लहराने में कामयाब होगी.
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पिछले दो चुनावों में सदर सीट पर रहा है भाजपा का कब्जा
उत्तर प्रदेश की राजनीति में आदिगंगा गोमती के तट पर बसी सुल्तानपुर सदर (पूर्व में जयसिंहपुर) विधानसभा सीट को बेहद खास और 'लकी' माना जाता है. सियासी गलियारों में यह चर्चा आम है कि सुल्तानपुर सदर का जनादेश ही लखनऊ की सत्ता का रुख तय करता है. पिछले कई चुनावों के आंकड़े गवाही देते हैं कि इस सीट से जिस राजनीतिक दल का प्रत्याशी चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचता है, राज्य में सरकार भी उसी पार्टी की बनती है. राजधानी लखनऊ से 165 किलोमीटर और रामनगरी अयोध्या से महज 65 किलोमीटर दूर स्थित यह सीट आध्यात्मिक रूप से भी बेहद समृद्ध है, जहां ऊंचे टीले पर स्थित प्रसिद्ध 'चौरासी बाबा का आश्रम' जन-जन की आस्था का केंद्र है.
जयसिंहपुर से बदलकर सुल्तानपुर सदर हुआ नाम
वर्ष 2008 के परिसीमन से पहले इस सीट को 'जयसिंहपुर' विधानसभा के नाम से जाना जाता था. इस सीट के राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो 1969 में कांग्रेस के श्यो कुमार, 1977 में जनता पार्टी के मकबूल हुसैन खान और 1980 में कांग्रेस के देवेंद्र पांडेय ने यहां से जीत हासिल की थी. 1989 में जनता दल से सूर्यभान सिंह जीते, जबकि 1991 में राम मंदिर आंदोलन के दौरान पहली बार इस सीट पर कमल खिला. इसके बाद 1993 में सपा के ए. रईस ने जीत का परचम लहराया.
बसपा की हैट्रिक से लेकर सपा-बीजेपी के दबदबे तक की कहानी
जयसिंहपुर सीट पर सबसे लंबा और मजबूत कब्जा बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का रहा है. 1996 में बसपा के राम रतन यादव विधायक बने, जिसके बाद 2002 और 2007 के चुनाव में बसपा के ही ओ.पी. सिंह ने लगातार जीत दर्ज कर पार्टी की हैट्रिक पूरी की. हालांकि, 2008 के नए परिसीमन के बाद जब 2012 में पहली बार सुल्तानपुर सदर नाम से मतदान हुआ, तो बसपा का विजय रथ रुक गया और समाजवादी पार्टी के युवा नेता अरुण वर्मा चुनाव जीतकर पहली बार विधानसभा पहुंचे.
2017 में बीजेपी के सीताराम वर्मा ने लहराया परचम
2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने बीएसपी छोड़कर आए अनुभवी नेता सीताराम वर्मा पर दांव लगाया. सीताराम वर्मा ने शानदार प्रदर्शन करते हुए अपने निकटतम प्रतिद्वंदी बसपा के राज प्रसाद को 18 हजार से अधिक मतों के बड़े अंतर से पराजित किया, जबकि निवर्तमान सपा विधायक अरुण वर्मा तीसरे स्थान पर खिसक गए थे. 17 फरवरी 1948 को जन्मे 73 वर्षीय सीताराम वर्मा पेशे से अधिवक्ता हैं और सुल्तानपुर के जिला पंचायत अध्यक्ष भी रह चुके हैं.
2022 में भी सदर सीट पर भाजपा का जलवा रहा कायम
2022 के उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में इस सीट पर एक बार फिर से भाजपा ने कब्जा किया. भाजपा प्रत्याशी राज प्रसाद उपाध्याय ने 15,754 वोटों से इस सीट पर कब्जा जमाया. राज प्रसाद उपाध्याय को 85,249 वोट मिलें. वहीं समाजवादी पार्टी प्रत्याशी अलोक वर्मा 69,495 वोट के साथ दूसरे और बहुजन समाजवादी पार्टी प्रत्याशी ओपी सिंह 39,920 वोट के साथ तीसरे स्थान पर रहे थे. ऐसे मे अगले साल यानी कि 2027 में एक बार फिर यूपी विधानसभा के चुनाव होने है, ऐसे में समाजवादी पार्टी इस सीट पर कब्जा, वहीं भाजपा इस सीट पर जीत की हैट्रिक लगाने का प्रयास करेगी.
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यूपी की लंभुआ विधानसभा सीट
चाय की टपरियों से लेकर गलियारों तक 2027 की सुगबुगाहट तेज उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले की लंभुआ विधानसभा सीट (190) का राजनीतिक मिजाज हमेशा से बेहद अनोखा और दिलचस्प रहा है. वर्ष 2008 के परिसीमन के बाद वजूद में आई यह सीट भले ही चुनावी कागजों पर नई नजर आती हो, लेकिन इसका राजनीतिक इतिहास बेहद समृद्ध है. परिसीमन से पहले 'चांदा विधानसभा' के नाम से पहचानी जाने वाली इस धरती ने उत्तर प्रदेश की सियासत में कई बड़े सियासी उलटफेर देखे हैं. अब जबकि 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट तेज हो रही है.
1974 से 2022 तक का गणित
ठाकुर और ब्राह्मण प्रत्याशियों का दबदबा अगर लंभुआ और इसकी पूर्ववर्ती चांदा सीट के 1974 से 2022 तक के 13 विधानसभा चुनावों के आंकड़ों पर नजर डालें, तो यहां का चुनावी ट्रेंड काफी साफ दिखता है. अब तक 13 में से 6 बार क्षत्रिय (ठाकुर) और 5 बार ब्राह्मण नेताओं ने इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया है. ब्राह्मण और क्षत्रिय बहुल माने जाने के बावजूद यहां यादव, वर्मा (ओबीसी) और दलित मतदाताओं का भी खासा असर है. यही वजह है कि जनसंघ, जनता पार्टी, कांग्रेस, बीएसपी, सपा और बीजेपी, हर प्रमुख राजनीतिक दल यहां अपनी जीत दर्ज करा चुका है.
किसी एक दल की जागीर नहीं बनी लंभुआ सीट
2008 में चांदा सीट के विलोपन और लंभुआ तहसील के 450 से अधिक गांवों को जोड़कर बनी इस सीट पर 2012 के बाद से तीन चुनाव हुए हैं. इन तीनों चुनावों ने साबित कर दिया है कि यहां का मतदाता किसी पार्टी को 'टेकन फॉर ग्रांटेड' नहीं लेता.
2012 का चुनाव: समाजवादी पार्टी के संतोष पांडे ने 74,352 (41.25%) वोट हासिल कर बसपा के विनोद सिंह को 17,372 वोटों के बड़े अंतर से मात दी थी.
2017 का चुनाव: प्रचंड 'मोदी लहर' के दौरान बीजेपी के देवमणि द्विवेदी ने 78,627 (38.98%) मत पाकर 12,903 वोटों के अंतर से बसपा के विनोद सिंह को हराया, जबकि सपा तीसरे स्थान पर खिसक गई.
2022 का चुनाव: बीजेपी ने प्रत्याशी बदलते हुए सीताराम वर्मा पर दांव लगाया. उन्होंने 82,999 (39.37%) वोट हासिल कर सपा के संतोष पांडे को 9,533 मतों से शिकस्त दी.
2027 के महासंग्राम की रणनीति
SP का 'OBC कार्ड' बनाम BJP का 'ब्राह्मण दांव'?
2022 के नतीजों में बहुजन समाज पार्टी के वोट बैंक में आई गिरावट के बाद लंभुआ का मुकाबला सीधे तौर पर बीजेपी बनाम सपा हो चुका है. आगामी 2027 के चुनाव को लेकर सियासी गलियारों में नई रणनीतियों पर मंथन जारी है.
कादीपुर विधानसभा सीट
उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले की कादीपुर (अनुसूचित जाति सुरक्षित) विधानसभा सीट पूर्वांचल की सबसे दिलचस्प और राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण सीटों में से एक मानी जाती है. एक समय पर बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) का अभेद्य किला मानी जाने वाली यह सीट अब भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का एक मजबूत गढ़ बन चुकी है. वर्तमान में यहां से बीजेपी के राजेश गौतम लगातार दूसरी बार विधायक चुने गए हैं. अब जबकि आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर हलचल तेज हो रही है, कादीपुर के सियासी गलियारों में यह चर्चा आम है कि क्या बीजेपी यहां अपनी हैट्रिक लगाएगी या सपा का PDA फॉर्मूला बाजी मारेगा.
1977 से 2022 तक का चुनावी ट्रैक रिकॉर्ड: किसका कब रहा दबदबा?
कादीपुर सीट पर जीत का रास्ता हमेशा से सामाजिक ताने-बाने और जातीय आंकड़ों के इर्द-गिर्द घूमता रहा है. 1977 से 2022 तक यहां हुए कुल 12 चुनावों के इतिहास पर नजर डालें तो:
भारतीय जनता पार्टी: 4 बार जीत दर्ज कर सबसे आगे रही है.
बहुजन समाज पार्टी: 3 बार जीत हासिल की (1993, 2002 और 2007 में भगेलूराम विधायक बने).
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस: 3 बार जीत का स्वाद चख चुकी है.
समाजवादी पार्टी और जनता पार्टी: 1-1 बार चुनाव जीतने में सफल रही हैं.
बीएसपी भले ही यहां 3 बार जीती हो, लेकिन 1996, 2012 और 2017 के चुनावों में भी वह दूसरे नंबर (रनर-अप) पर रही थी. हालांकि, 2017 की मोदी लहर के बाद से यहां की राजनीतिक हवा पूरी तरह बदल गईं
पिछले तीन चुनावों की पूरी कहानी: 2012 से 2022 तक के आंकड़े
2012 का चुनाव: समाजवादी पार्टी के रामचंद्र चौधरी ने 97,283 (51.4%) वोट हासिल कर एकतरफा जीत दर्ज की थी और बीएसपी के दिग्गज भगेलू राम को बड़े अंतर से मात दी थी.
2017 का चुनाव: बीजेपी ने नई रणनीति के तहत राजेश कुमार गौतम को मैदान में उतारा. राजेश गौतम ने 87,353 (41.5%) वोट हासिल किए और बीएसपी के भगेलू राम को 26,604 वोटों से हराकर सीट बीजेपी की झोली में डाल दी.
2022 का चुनाव: बीजेपी ने दोबारा राजेश कुमार गौतम पर भरोसा जताया. इस बार मुकाबला बेहद दिलचस्प था क्योंकि बीएसपी छोड़कर सपा में आए भगेलू राम साइकिल के निशान पर मैदान में थे. राजेश गौतम ने 96,405 (43.44%) वोट पाकर भगेलू राम को 25,723 वोटों से शिकस्त दी और लगातार दूसरी बार विधायक बने.
सुरक्षित सीट होने के कारण कादीपुर में दलित मतदाताओं की संख्या 26 प्रतिशत से अधिक है. इसके अलावा मौर्य, यादव, निषाद और कुर्मी मतदाता यहां हार-जीत तय करने में सबसे बड़ी भूमिका निभाते हैं.
लोकसभा चुनाव के बाद बदला माहौल
2027 का रण होगा बेहद रोमांचक सुल्तानपुर लोकसभा सीट पर 2024 के आम चुनाव में बड़ा उलटफेर देखने को मिला था, जहां सपा के रामभुआल निषाद ने बीजेपी की मेनका गांधी को शिकस्त दी थी. इस बदलाव ने कादीपुर के स्थानीय समीकरणों में भी हलचल पैदा कर दी है. समाजवादी पार्टी अपने 'PDA' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले और सवर्णों को साधने की कोशिश के जरिए कादीपुर में अपनी खोई हुई जमीन दोबारा तलाश रही है. वहीं बीजेपी अपने मजबूत कैडर, डबल इंजन सरकार के विकास कार्यों और संगठन के दम पर इस सीट पर अपना वर्चस्व बरकरार रखने की रणनीति पर काम कर रही है.
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