देहरादून में हिमालय दिवस पर सीएम पुष्कर सिंह धामी ने 'हिमालय विभूति सम्मान' और हिमालय परिषद् के लिए ₹1 करोड़ की घोषणा की। जानिए उत्तराखंड के सतत विकास का नया रोडमैप।
दून हॉराइज़न, देहरादून (07 सितंबर): उत्तराखंड की राजधानी स्थित वीर माधो सिंह भण्डारी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (UTU Dehradun) के सभागार में सोमवार को आयोजित ‘हिमालयो नाम नगाधिराजः’ कार्यक्रम में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने दो अहम नीतिगत घोषणाएं कीं।
यह भी पढ़ें : कभी भी हो सकता है बड़ा हादसा, दून के 8 गिरासू भवनों में जान जोखिम में डाल रह रहे लोग
मुख्यमंत्री ने राज्य में शोध और धरातलीय संरक्षण को गति देने के लिए हर साल ‘हिमालय विभूति सम्मान’ (Himalaya Vibhuti Award) प्रदान करने और हिमालय परिषद् के बुनियादी ढांचे के विस्तार हेतु ₹1 करोड़ की वित्तीय मदद जारी करने का ऐलान किया।
पर्वतीय राज्य में पर्यावरण और आधुनिक बुनियादी ढांचे के टकराव के बीच सीएम धामी ने स्पष्ट कहा कि उत्तराखंड के विकास का खाका राज्य की नाजुक भूगर्भीय बनावट और भौगोलिक सीमाओं को ध्यान में रखकर ही खींचा जा सकता है।
हिमालय विभूति सम्मान और शोध संस्थानों को वित्तीय संबल
सभागार में मौजूद वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों और छात्रों को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि ग्लेशियर, नदियां और जंगल केवल कागजी चिंताओं तक सीमित नहीं रह सकते। उन्होंने घोषणा की कि हिमालयी पारिस्थितिकी, जल संवर्धन और सतत विकास के क्षेत्र में ठोस काम करने वाले शोधकर्ताओं, वैज्ञानिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को राज्य सरकार हर साल 9 सितंबर को औपचारिक रूप से सम्मानित करेगी।
इसके साथ ही, हिमालय परिषद् में जरूरी संसाधनों की कमी दूर करने के लिए मौके पर ही 1 करोड़ रुपये के बजट का अनुमोदन किया गया। कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री ने राज्य में वैज्ञानिक जागरूकता बढ़ाने के मकसद से यू-कॉस्ट (UCOST) और विश्वविद्यालय की ओर से तैयार पांच पोस्टरों और ‘विज्ञान संप्रेषण’ पत्रिका के पांचवें वार्षिकांक का भी विमोचन किया। इनमें आगामी 7वें देहरादून इंटरनेशनल साइंस एंड टेक्नोलॉजी फेस्टिवल और 21वीं उत्तराखंड राज्य साइंस कॉन्फ्रेंस की रूपरेखा शामिल है।
इकोलॉजी और इकोनॉमी के संतुलन पर सरकार की दो-टूक
पहाड़ों में लगातार बढ़ रहे भूस्खलन, वनाग्नि, और अतिवृष्टि जैसी चरम मौसमी घटनाओं को रेखांकित करते हुए मुख्यमंत्री ने स्वीकार किया कि जलवायु परिवर्तन की सबसे भारी कीमत हिमालयी समाज चुका रहा है—भले ही कार्बन उत्सर्जन में उसका योगदान नगण्य हो।
“हमें ऐसी सड़कें चाहिए जो जंगलों को लील न जाएं, और ऐसा पर्यटन चाहिए जो पहाड़ों की भार वहन क्षमता (Carrying Capacity) के दायरे में रहे। आने वाली पीढ़ियां सिर्फ चौड़े हाईवे देखकर खुश नहीं होंगी, वे हमसे साफ हवा और जिंदा नदियों का हिसाब भी मांगेंगी।”
मुख्यमंत्री ने साफ किया कि पर्वतीय पलायन को थामने के लिए बुग्यालों और स्थानीय उत्पादों को आर्थिकी का जरिया बनाना होगा, तभी संरक्षण और आजीविका साथ-साथ चल सकेंगे।
बुग्याल दिवस से शुरू हुआ साझा संरक्षण सप्ताह
राज्य सरकार ने इस बार पर्यावरण संरक्षण को केवल एक दिन के जलसे तक सीमित न रखते हुए 2 सितंबर को मनाए जाने वाले बुग्याल दिवस से 9 सितंबर (हिमालय दिवस) तक पूरे हफ्ते को जनभागीदारी सप्ताह के रूप में मनाया है।
यह भी पढ़ें : BJP Protest in Uttarakhand : देहरादून में भाजपा का हल्लाबोल, कांग्रेस से मांगा दलित उत्थान का हिसाब
कार्यक्रम में पद्म भूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी, यूटीयू की कुलपति प्रो. तृप्ता ठाकुर और यू-कॉस्ट के महानिदेशक प्रो. दुर्गेश पंत सहित टिहरी विधायक किशोर उपाध्याय भी मौजूद रहे। मंच से सभी वक्ताओं ने इस बात पर सहमति जताई कि केंद्र सरकार के वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम और नेशनल मिशन फॉर सस्टेनिंग द हिमालयन इकोसिस्टम के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए उत्तराखंड को एक मॉडल हिमालयी राज्य के तौर पर नेतृत्व संभालना होगा।