September 5, 2026

एक एकड़ में ड्रैगन फ्रूट और खजूर की सहफसली खेती से किसान की बदली किस्मत

एक एकड़ में ड्रैगन फ्रूट और खजूर की सहफसली खेती से किसान की बदली किस्मत

06 सितंबर 2026, महेंद्रगढ़: एक एकड़ में ड्रैगन फ्रूट और खजूर की सहफसली खेती से किसान की बदली किस्मत – पारंपरिक फसलों से हटकर बागवानी की राह पकड़ने वाले हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के मुंडिया खेड़ा गांव के किसान मनीराम यादव आज इलाके में मिसाल बन गए हैं। उन्होंने महज एक एकड़ जमीन पर ड्रैगन फ्रूट और खजूर की सहफसली खेती शुरू की और अब सालाना करीब 3 लाख रुपये की कमाई कर रहे हैं।मनीराम ने अपने खेत में 500 पिलरों पर करीब 2,000 ड्रैगन फ्रूट के पौधे लगाए हैं। इन्हीं पिलरों के आसपास उन्होंने 64 खजूर के पेड़ भी रोपे हैं, जो गर्मी के मौसम में ड्रैगन फ्रूट के पौधों को छांव देने का काम करते हैं।

कैसे काम करती है सहफसली तकनीक

खजूर के ऊंचे पेड़ गर्मियों की तेज धूप से ड्रैगन फ्रूट के नाजुक पौधों को बचाते हैं, जिससे फल झुलसने की समस्या कम होती है। दोनों फसलों की जड़ें अलग-अलग गहराई में पानी और पोषक तत्व लेती हैं, जिससे एक ही जमीन का बेहतर इस्तेमाल हो पाता है।पानी की बचत के लिए मनीराम ने अंडरग्राउंड ड्रिप सिंचाई प्रणाली लगाई है, जिससे हर पौधे की जड़ तक सीधे पानी पहुंचता है और बर्बादी नहीं होती। खजूर के सूखे पत्तों का इस्तेमाल वे मल्चिंग के लिए करते हैं, जिससे खेत की नमी बनी रहती है और खरपतवार भी कम उगते हैं।महेंद्रगढ़ जैसे अर्ध-शुष्क इलाके में पानी की कमी हमेशा से किसानों के लिए बड़ी चुनौती रही है। ऐसे में ड्रिप सिंचाई और मल्चिंग की जोड़ी ने मनीराम को कम पानी में भी दो-दो बागवानी फसलें एक साथ उगाने का भरोसा दिया।

सब्जी और दलहन से भी अतिरिक्त कमाई

पौधों की दो कतारों के बीच करीब 13 फीट की खाली जगह को मनीराम ने बेकार नहीं जाने दिया। इस जगह में वे मौसमी सब्जियों और दलहनी फसलों की खेती करते हैं, जिससे उन्हें अतिरिक्त आमदनी होती है और साल भर खेत से कोई न कोई उपज मिलती रहती है।ड्रैगन फ्रूट की मांग शहरी बाजारों और सुपरमार्केट में तेजी से बढ़ रही है, क्योंकि इसे सेहत के लिए फायदेमंद माना जाता है। खजूर की भी स्थानीय मंडियों में अच्छी कीमत मिलती है, खासकर त्योहारी सीजन में मांग और बढ़ जाती है।मनीराम का कहना है कि परंपरागत फसलों की तुलना में इस मॉडल में शुरुआती मेहनत और निवेश भले ही ज्यादा लगता है, लेकिन तीन-चार साल बाद आमदनी कई गुना बढ़ जाती है। पौधे लंबी उम्र के होने से एक बार लागत लगाने के बाद वर्षों तक फल मिलता रहता है, जिससे बार-बार बिजाई का खर्च नहीं उठाना पड़ता।गांव के कई अन्य किसान अब मनीराम के खेत में आकर यह तकनीक सीखने और अपने खेतों में आजमाने की तैयारी कर रहे हैं। कृषि विशेषज्ञों की सलाह है कि नई बागवानी फसल अपनाने से पहले किसान अपनी मिट्टी और पानी की जांच जरूर करा लें और नजदीकी बागवानी विभाग या कृषि विज्ञान केंद्र से तकनीकी मार्गदर्शन लें।

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