September 3, 2026

क्या आप ऐसे और हादसों के लिए तैयार हैं? नेपाल की बाढ़ ने दुनिया से पूछा सवाल

किसी प्राकृतिक आपदा को देखते ही उसे जलवायु परिवर्तन से जोड़ देना विज्ञान नहीं है। नेपाल में 26 अगस्त को भोटेकोशी नदी के इलाके में आई विनाशकारी बाढ़ के मामले में भी अभी ऐसा कोई वैज्ञानिक अध्ययन नहीं है, जो इस खास घटना को सीधे जलवायु परिवर्तन के कारण हुई आपदा कह सके। लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि इस त्रासदी का जलवायु परिवर्तन से कोई लेना-देना नहीं है? यह सवाल थोड़ा अधिक जटिल है।

हिमालय तेजी से बदल रहा है। तापमान बढ़ रहा है। ग्लेशियर और बर्फ से जुड़ी प्राकृतिक व्यवस्थाओं में बदलाव हो रहे हैं। पहाड़ी इलाकों में ग्लेशियर से जुड़ी बाढ़, भूस्खलन और चट्टानों के खिसकने जैसी घटनाओं को लेकर वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं। इन बदलावों का मतलब यह नहीं कि हर घटना के पीछे जलवायु परिवर्तन ही कारण है। लेकिन यह जरूर बताता है कि ऐसी घटनाएं अब एक बदलती हुई जलवायु की पृष्ठभूमि में हो रही हैं।

भोटेकोशी की त्रासदी इसी बड़ी तस्वीर के बीच हुई है।

एक हजार से ज्यादा लोगों की मौत, हजारों लोगों का लापता होना और घरों, सड़कों, पुलों तथा बिजली के बुनियादी ढांचे का भारी नुकसान नेपाल के लिए सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि एक बड़ा आर्थिक संकट भी है।

और अब नेपाल ने इस संकट को वैश्विक जलवायु राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया है।

नेपाल ने संयुक्त राष्ट्र समर्थित फंड फॉर रिस्पॉन्डिंग टू लॉस एंड डैमेज से आपात वित्तीय सहायता मांगी है। यह पहली बार है जब नेपाल ने इस फंड से मदद की मांग की है। सरकार चाहती है कि फंड का बोर्ड अपनी नियमित बैठक का इंतजार किए बिना इस मामले पर विशेष फैसला करे।

यहीं से भोटेकोशी की कहानी नेपाल से आगे निकल जाती है।

जब नुकसान की कीमत बहुत बड़ी हो

जलवायु वार्ताओं में "लॉस एंड डैमेज" शब्द पिछले कुछ वर्षों में लगातार सुनाई देता रहा है। लेकिन इसके पीछे का सवाल बहुत सीधा है।

अगर कोई देश जलवायु परिवर्तन से हुए ऐसे नुकसान का सामना कर रहा है, जिसे वह पूरी तरह रोक नहीं सकता था, तो उसकी भरपाई कौन करेगा?

बाढ़ के बाद सड़क बनाई जा सकती है। पुल दोबारा खड़ा किया जा सकता है। बिजलीघर फिर बनाया जा सकता है।

लेकिन जान गंवाने वाले व्यक्ति को वापस नहीं लाया जा सकता।

किसी गांव की आजीविका उजड़ जाए, लोग अपने घर और जमीन छोड़ने को मजबूर हों या कोई समुदाय अपनी सामाजिक और सांस्कृतिक जड़ों से कट जाए, तो हर नुकसान को रुपये में नहीं मापा जा सकता।

यही वह खाली जगह है, जिसे लॉस एंड डैमेज फंड भरने के लिए बनाया गया है।

लेकिन नेपाल का मामला इस व्यवस्था की पहली बड़ी वास्तविक परीक्षाओं में से एक है।

फंड बनाया जा चुका है। पैसा देने की व्यवस्था पर सहमति बन चुकी है। लेकिन सितंबर 2026 की शुरुआत तक इस फंड से कोई पैसा वितरित नहीं हुआ है।

अब एक ऐसा देश, जो खुद को जलवायु संकट का बेहद कम जिम्मेदार पक्ष मानता है, दरवाजे पर खड़ा है और कह रहा है कि उसे अभी मदद चाहिए।

सवाल यह है कि क्या वैश्विक व्यवस्था उतनी ही तेजी से प्रतिक्रिया दे सकती है, जितनी तेजी से आपदा लोगों की जिंदगी बदल देती है?

नेपाल का 'मुआवजे' वाला सवाल

नेपाल की सरकार अब सिर्फ आपात वित्तीय मदद की बात नहीं कर रही।

विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने अमेरिका, चीन और भारत जैसे बड़े उत्सर्जक देशों का नाम लेते हुए जलवायु से हुए नुकसान के लिए मुआवजे की बात की है। नेपाल इसे दान नहीं, जिम्मेदारी के सवाल के रूप में पेश कर रहा है।

यह मांग विवाद से परे नहीं है।

किसी खास आपदा के लिए किसी खास देश की जिम्मेदारी तय करना आसान नहीं होगा। जलवायु परिवर्तन दशकों और सदियों में जमा हुए उत्सर्जन का परिणाम है। इसमें ऐतिहासिक उत्सर्जन, मौजूदा उत्सर्जन, प्रति व्यक्ति उत्सर्जन और किसी देश की आर्थिक क्षमता जैसे कई सवाल शामिल हैं।

लेकिन नेपाल के सवाल को सिर्फ इसलिए नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता कि भोटेकोशी आपदा और जलवायु परिवर्तन के बीच सीधा वैज्ञानिक संबंध अभी साबित नहीं हुआ है।

क्योंकि जलवायु न्याय का सवाल केवल यह नहीं है कि किसने कितनी कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ी।

यह भी सवाल है कि उसका असर कौन झेल रहा है।

एक असहज वैश्विक असमानता

जलवायु परिवर्तन की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक यही है।

जिन देशों का वैश्विक उत्सर्जन में योगदान बहुत कम है, वे कई बार जलवायु के बदलते असर के प्रति सबसे ज्यादा संवेदनशील हैं।

नेपाल इसका एक उदाहरण है।

छोटे द्वीपीय देश समुद्र के बढ़ते स्तर का सामना कर रहे हैं। अफ्रीका के कई हिस्से सूखे और बाढ़ की मार झेल रहे हैं। दक्षिण एशिया में गर्मी, भारी बारिश और बाढ़ का जोखिम बढ़ रहा है। हिमालयी देशों के सामने ग्लेशियर और पहाड़ों से जुड़े खतरे हैं।

इन देशों के पास आपदा के बाद पुनर्निर्माण के लिए वही वित्तीय क्षमता नहीं है, जो दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के पास है।

इसलिए लॉस एंड डैमेज सिर्फ जलवायु वित्त का एक और अध्याय नहीं है।

यह वैश्विक असमानता का सवाल है।

और शायद यही वजह है कि नेपाल की मांग पर दुनिया को ध्यान देना चाहिए।

न कि इसलिए कि हर नेपाली आपदा को जलवायु परिवर्तन की देन मान लिया जाए।

बल्कि इसलिए कि जलवायु परिवर्तन की दुनिया में जोखिम और जिम्मेदारी का बंटवारा बराबर नहीं है।

अब परीक्षा दुनिया की है

नेपाल ने एक रास्ता चुना है। उसने अपनी त्रासदी को वैश्विक जलवायु वित्त की बहस से जोड़ दिया है।

अब असली सवाल यह है कि दुनिया क्या करती है।

अगर लॉस एंड डैमेज फंड का उद्देश्य उन देशों की मदद करना है जो जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले नुकसान का सामना कर रहे हैं, तो उसे वास्तविक आपदाओं के सामने काम करते हुए दिखना होगा।

साथ ही, विज्ञान की अपनी भूमिका बनी रहनी चाहिए।

हमें हर बाढ़, हर भूस्खलन और हर हिमालयी आपदा को जलवायु परिवर्तन कहने से बचना होगा। हमें यह भी समझना होगा कि किसी एक घटना का कारण और बदलती जलवायु से पैदा हो रहा व्यापक जोखिम, दो अलग लेकिन जुड़े हुए सवाल हैं।

इस फर्क को बनाए रखना जरूरी है।

क्योंकि जलवायु पर दुनिया को भावनात्मक तर्क से नहीं, प्रमाण और जिम्मेदारी दोनों से आगे बढ़ना होगा।

नेपाल की त्रासदी ने फिलहाल दुनिया के सामने एक सवाल रख दिया है।

अगर बदलती जलवायु का जोखिम वैश्विक है, लेकिन उसकी कीमत कुछ कमजोर देश disproportionately चुका रहे हैं, तो क्या उस कीमत की जिम्मेदारी भी वैश्विक होनी चाहिए?

इस सवाल का जवाब अब सिर्फ जलवायु सम्मेलनों में नहीं दिया जाएगा।

भोटेकोशी जैसी आपदाओं के बाद, इसका जवाब जमीन पर देना होगा।