भगवान शिव को क्यों चढ़ाई जाती है भांग और धतूरा? जानें इसके पीछे की पौराणिक कथा और महत्व
भगवान शिव को भांग और धतूरा अर्पित करने की परंपरा क्यों निभाई जाती है? जानें इससे जुड़ी पौराणिक कथा, धार्मिक महत्व और चढ़ाने का सही नियम।
भगवान शिव को भांग और धतूरा अर्पित करने की परंपरा क्यों निभाई जाती है? (Ai Image)
- Published: 02 Sep 2026, 04:34 PM IST
- Last Updated: 02 Sep 2026, 04:34 PM IST
Shiv bhang dhatura mahatva: हिंदू धर्म में भगवान शिव की पूजा में भांग और धतूरा अर्पित करने की परंपरा अत्यंत प्राचीन काल से चली आ रही है। मान्यता है कि भगवान शिव को ये दोनों वस्तुएं अत्यंत प्रिय हैं, इसी वजह से खासतौर पर सावन के महीने और महाशिवरात्रि के अवसर पर शिवलिंग पर भांग और धतूरा अर्पित करने की परंपरा विशेष रूप से निभाई जाती है। यही कारण है कि इस दौरान शिव मंदिरों में भांग और धतूरे की भारी मांग देखने को मिलती है।
समुद्र मंथन से जुड़ी है इसकी पौराणिक कथा
धार्मिक ग्रंथों में एक प्रचलित कथा के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान जब हलाहल नामक विष निकला, तो उसकी तीव्रता से संपूर्ण सृष्टि जलने लगी थी। सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान शिव ने वह विष स्वयं पी लिया और उसे अपने कंठ में ही रोक लिया, जिससे उनका कंठ नीला पड़ गया और उन्हें "नीलकंठ" कहा जाने लगा। मान्यता है कि विष के तीव्र प्रभाव और गर्मी को शांत करने के लिए देवताओं ने भगवान शिव को भांग और धतूरा अर्पित किया, जिससे उन्हें राहत मिली।
इसी घटना के बाद से भांग और धतूरे को भगवान शिव से जोड़कर देखा जाने लगा, और तभी से उनकी पूजा में इन दोनों वस्तुओं को अर्पित करने की परंपरा शुरू हुई। मान्यता है कि यह अर्पण भगवान शिव के त्याग और सृष्टि की रक्षा के लिए किए गए उनके बलिदान के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का प्रतीक है।
भांग-धतूरा चढ़ाने का धार्मिक महत्व
मान्यता है कि सावन के महीने में शिवलिंग पर भांग और धतूरा अर्पित करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। इसके अलावा यह भी कहा जाता है कि भगवान शिव को वैराग्य और सांसारिक मोह-माया से दूर रहने वाला देवता माना जाता है, इसी वजह से धतूरे जैसे कांटेदार और सामान्यतः अनुपयोगी माने जाने वाले पौधे को भी वे सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं, जो उनकी करुणा और सर्वस्वीकार्यता का प्रतीक माना जाता है।
भांग-धतूरा अर्पित करने का सही तरीका
धार्मिक परंपराओं के अनुसार, शिवलिंग पर भांग और धतूरा अर्पित करते समय "ॐ नमः शिवाय" मंत्र का जाप करना विशेष रूप से शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इन्हें जल और बेलपत्र के साथ मिलाकर अर्पित करना और भी अधिक फलदायी होता है। इसके अलावा सावन के सोमवार के दिन इन दोनों वस्तुओं को अर्पित करना विशेष रूप से पुण्यदायी माना जाता है।
सावन में क्यों बढ़ जाता है इसका महत्व
सावन के पवित्र महीने को भगवान शिव की आराधना के लिए सबसे शुभ समय माना जाता है। इस दौरान शिवभक्त बड़ी संख्या में मंदिरों में पहुंचकर शिवलिंग पर जल, बेलपत्र के साथ-साथ भांग और धतूरा भी अर्पित करते हैं। मान्यता है कि सावन में भगवान शिव को यह भोग अर्पित करने से समस्त पापों का नाश होता है और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
आज भी हर शिव मंदिर में देखने को मिलती है यह परंपरा
समय के साथ भले ही पूजा-पाठ के तरीकों में कुछ बदलाव आया हो, लेकिन भगवान शिव को भांग और धतूरा अर्पित करने की यह परंपरा आज भी उतनी ही श्रद्धा के साथ निभाई जाती है। आज भी सावन और महाशिवरात्रि के अवसर पर देशभर के शिव मंदिरों में भक्त इस पौराणिक परंपरा का पूरी आस्था के साथ पालन करते नजर आते हैं।
डिस्क्लेमर (Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक ग्रंथों और लोक-परंपराओं पर आधारित है। Haribhoomi.com इनकी किसी भी तरह की सटीकता या तथ्य की पुष्टि नहीं करता है। इन्हें केवल सामान्य जानकारी के तौर पर प्रस्तुत किया जा रहा है। कृपया ध्यान दें कि यह लेख केवल धार्मिक पूजा-अनुष्ठान से जुड़ी परंपरा पर आधारित है, न कि किसी भी प्रकार के मादक पदार्थ के सेवन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लिखा गया है।