नेपाल में मंडरा रहा एक और तबाही का खतरा, चीन ने दी नए भूस्खलन की चेतावनी
Sep 02, 2026 06:36 pm ISTलाइव हिन्दुस्तान

इस भीषण आपदा में नेपाल गए विदेशी नागरिक और पर्यटक भी बड़े पैमाने पर प्रभावित हुए हैं। एक रिपोर्ट्स के अनुसार, 133 भारतीय नागरिक लापता हैं, जिनमें से कई कैलाश मानसरोवर यात्रा के मार्ग पर थे। सीमा

नेपाल में अभी बाढ़ का खतरा मंडरा रहा है। चीन ने चेतावनी जारी की है।
नेपाल में हाल ही में एक विशाल ग्लेशियर के अचानक टूटने से भीषण प्राकृतिक आपदा आई। 5200 मीटर की ऊंचाई पर ग्लेशियर ढहने से बर्फ, चट्टानों, मलबे और पानी के भयंकर सैलाब ने नीचे की बस्तियों, सड़कों, पुलों और जलविद्युत परियोजनाओं को तबाह कर दिया। इस त्रासदी में अब तक कम से कम 1050 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि लगभग 3900 लोग अब भी लापता हैं। चीन के तिब्बत वाले हिस्से में भी 16 लोगों की मौत और 546 लोगों के लापता होने की खबर है।
इस भीषण आपदा में नेपाल गए विदेशी नागरिक और पर्यटक भी बड़े पैमाने पर प्रभावित हुए हैं। एक रिपोर्ट्स के अनुसार, 133 भारतीय नागरिक लापता हैं, जिनमें से कई कैलाश मानसरोवर यात्रा के मार्ग पर थे। सीमा जांच चौकी पर खड़े 300 से अधिक वाहन और ट्रक बाढ़ के तेज बहाव में बह गए।
मंडरा रहा एक और तबाही का खतरा, चीन ने चेताया
आपदा के प्रभाव क्षेत्र में जमा पानी काफी हद तक निकल चुका है और नदियों का प्रवाह सामान्य हो रहा है, लेकिन चीन के जल संसाधन मंत्रालय ने चेतावनी जारी की है कि ढलान और आसपास के ग्लेशियर अभी भी बेहद अस्थिर हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे हादसों के बाद नदियों में प्राकृतिक मलबे के बांध बन जाते हैं। यदि यह अस्थायी बांध टूटते हैं या आसपास की चोटियों से दोबारा भूस्खलन होता है तो एक और बाढ़ का नया खतरा पैदा हो सकता है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि वैश्विक तापमान में वृद्धि और ग्लेशियरों के पिघलने से ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों की बर्फ और चट्टानें कमजोर हो रही हैं। इससे इस तरह की प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति बढ़ रही है। नेपाल जैसे देश के लिए यह बेहद चिंताजनक है, जहां आबादी, सड़कें और पनबिजली परियोजनाएं संकरी नदी घाटियों में स्थित हैं। फिलहाल राहत और बचाव दल मलबे में जिंदगियां तलाशने में जुटे हैं, लेकिन ऊपर पहाड़ों में बनी अस्थिरता के कारण खतरे का साया लगातार बना हुआ है।
कैसे आई यह विनाशकारी आपदा?
26 अगस्त को नेपाल के लांगटांग लिरुंग क्षेत्र में अत्यधिक ऊंचाई पर ग्लेशियर का एक बड़ा हिस्सा टूटकर गिर गया। लगभग 50 मीटर प्रति सेकंड की तीव्र गति से मलबे का यह सैलाब 20 किलोमीटर से अधिक दूरी तक नीचे बहता चला गया। ढलान और संकरे हिमालयी रास्ते से गुजरते हुए इस बाढ़ ने अपने साथ और अधिक मिट्टी, पानी और चट्टानों को समेट लिया, जिससे इसकी विनाशकारी क्षमता कई गुना बढ़ गई।