September 1, 2026

खरगे को आगे कर कांग्रेस आखिर क्यों लंबा खींच रही दलित अपमान का मुद्दा? उत्तराखंड के बहाने कहां-कहां असली निशाना

Explainer: खरगे को आगे कर कांग्रेस आखिर क्यों लंबा खींच रही दलित अपमान का मुद्दा? उत्तराखंड के बहाने कहां-कहां असली निशाना

Sep 01, 2026 06:03 pm ISTलाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली

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हालांकि, कांग्रेस के लिए इस नैरेटिव को जमीन पर उतारना बेहद चुनौतीपूर्ण होगा क्योंकि दलित वोटों के इस सियासी मैदान में मायावती की BSP एक मजबूत खिलाड़ी है, वहीं चंद्रशेखर आजाद की पार्टी भी तेजी से उभर रही है।

mallikarjun Kharge

कांग्रेस अध्यक्ष मलिल्कार्जुन खरगे और राहुल गांधी

हाल ही में संसद का मॉनसून सत्र बिना कोई खास उपलब्धि के विपक्षी हंगामे की भेंट चढ़ चुका है। इससे एक तरफ कांग्रेस के हौसले बुलंद हैं तो दूसरी तरफ वह उत्तराखंड के हल्द्वानी में पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के कार्यक्रम के बाद हुए शुद्धिकरण को लेकर आक्रामक रुख अख्तियार किए हुए है। इससे देश का राजनीतिक पारा एक बार फिर चढ़ गया है। दरअसल, खरगे ने आरोप लगाया है कि हल्द्वानी में उनकी रैली के बाद उत्तराखंड भाजपा इकाई ने 'शुद्धिकरण'कराया, क्योंकि वह एक दलित हैं। इस अपमानजनक घटना के खिलाफ सोनिया गांधी और खरगे ने खुद राज्यसभा सभापति से मुलाकात कर औपचारिक शिकायत दर्ज कराई है।

शुरुआत में इस मुद्दे पर शांत रहने के बाद, कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) की बैठक में खुद खरगे ने पार्टी नेताओं द्वारा इस संवेदनशील मुद्दे को न उठाने पर नाराजगी जताई थी। इसके ठीक एक हफ्ते बाद राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की और पूरी कांग्रेस इस मुद्दे पर आक्रामक तेवर अपनाकर मैदान में उतर चुकी है। लेकिन इस कवायद में कांग्रेस की रणनीति सिर्फ़ खरगे का समर्थन करने से कहीं ज़्यादा है। पार्टी की नजर अब अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश और पंजाब के विधानसभा चुनावों पर है, और उससे भी ज्यादा जरूरी 2029 के लोकसभा चुनावों पर है।

2029 के रण और राज्यों के चुनावों के लिए बिछी बिसात

दरअसल, खरगे के अपमान के बहाने दलितों के मुद्दे पर कांग्रेस की यह आक्रामकता महज एक तात्कालिक विरोध नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक सोची-समझी रणनीति है और तात्कालिक लाभ के तौर पर आगामी उत्तर प्रदेश और पंजाब के विधानसभा चुनाव टारगेट पर है। आंकड़ों के लिहाज से बात करें तो भारत में दलितों की आबादी करीब 16% है, जबकि उत्तर प्रदेश में इस समुदाय की आबादी करीब 21% और पंजाब में लगभग 32 से 38% है।

‘दलित खतरे में हैं’ का एक बड़ा राष्ट्रीय नैरेटिव

कांग्रेस का मानना है कि 2024 के लोकसभा चुनावों में उसका 'संविधान खतरे में है' वाला नैरेटिव बेहद कारगर रहा था, जिसने दलित वोटों को एकजुट करने और भाजपा को पूर्ण बहुमत से रोकने में अहम भूमिका निभाई थी। लिहाजा, कांग्रेस अब इसी तर्ज पर 'दलित खतरे में हैं' का एक बड़ा राष्ट्रीय नैरेटिव स्थापित करने में जुट गई है ताकि आने वाले चुनावों में दलित मतों का भारी ध्रुवीकरण किया जा सके। लिहाजा, कांग्रेस अब उत्तराखंड की घटना को एक बड़े कैनवास पर उतारने और उसी रणनीति को दोहराने की कोशिशों में जुट गई है। पार्टी को ऐसा लगता है कि यूपी और पंजाब में इस नैरेटिव का लाभ उसे मिल सकेगा।

राह नहीं है आसान: त्रिकोणीय संघर्ष और भाजपा का पलटवार

हालांकि, कांग्रेस के लिए इस नैरेटिव को जमीन पर उतारना बेहद चुनौतीपूर्ण होगा। दलित वोटों के इस सियासी मैदान में बहुजन समाज पार्टी (BSP) एक मजबूत खिलाड़ी है, वहीं चंद्रशेखर आजाद की पार्टी भी तेजी से उभरकर दलित राजनीतिक स्थान हासिल करने की कोशिश में लगी हुई है। दूसरी तरफ, भाजपा ने भी कांग्रेस के इस नैरेटिव की काट तैयार कर ली है। भाजपा का तर्क है कि दलितों को केवल एक वोट बैंक के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए और केंद्र सरकार की जन कल्याणकारी योजनाओं का सीधा लाभ बिना किसी भेदभाव के उन तक पहुंच रहा है।

यूपी और पंजाब में दलितों की क्या स्थिति?

बता दें कि उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में से 84 सीटें अनुसूचित जाति (दलित) के लिए आरक्षित हैं, जबकि लगभग 140 से 150 सीटों पर दलित मतदाता संख्या बल के आधार पर हार-जीत में निर्णायक और प्रभावी भूमिका निभाते हैं। बड़ी बात यह भी है कि 140 से अधिक सामान्य सीटें हैं, जहाँ दलित आबादी 15% से 22% के बीच है। साथ ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश, बुंदेलखंड और पूर्वांचल के कई जिलों में दलित मतदाता किसी भी राजनीतिक दल (जैसे भाजपा, सपा, बसपा) के समीकरण को बनाने या बिगाड़ने की क्षमता रखते हैं। इसी तरह, पंजाब में अनुसूचित जाति (दलित) के लिए भले ही 34 विधानसभा सीटें आरक्षित हैं, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार पंजाब की कुल 50 से अधिक सीटों पर दलित मतदाता हार-जीत तय करने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।