September 1, 2026

कौन थे नीम करौली बाबा? कहां है उनका प्रसिद्ध कैंची धाम, जानें महाराज जी से जुड़ी पूरी कहानी

20वीं सदी के संत नीम करौली बाबा का प्रमुख आश्रम कैंची धाम उत्तराखंड में है। यह हनुमान भक्ति और बाबा के प्रेम, सेवा व भक्ति के संदेश का केंद्र है। 1964 में स्थापित यह धाम आज दुनिया भर में आस्था का एक बड़ा केंद्र बन गया है।

Neem Karoli Baba: उत्तराखंड की पहाड़ियों में बसा एक छोटा-सा आश्रम आज दुनिया भर में आध्यात्मिक आस्था का बड़ा केंद्र है। यह है कैंची धाम, जो संत नीम करौली बाबा यानी महाराज जी की तपस्थली है। नैनीताल-अल्मोड़ा मार्ग पर स्थित यह धाम नैनीताल से करीब 17 किलोमीटर और भवाली से करीब 9 किलोमीटर दूर है।

कौन थे नीम करौली बाबा?

नीम करौली बाबा 20वीं सदी के प्रसिद्ध संत हैं। उनका मूल नाम लक्ष्मण नारायण शर्मा बताया जाता है। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के अकबरपुर में करीब 1900 के आसपास हुआ था। भक्त उन्हें प्यार से महाराज जी कहकर पुकारते थे। वे भगवान हनुमान के अनन्य भक्त थे और उनके जीवन का मुख्य संदेश प्रेम, सेवा और भक्ति से जुड़ा रहा।

बाबा का जीवन किसी बड़े धार्मिक प्रचार या दिखावे से अलग था। वे लोगों को भगवान का नाम लेने, जरूरतमंदों की सेवा करने और सभी से प्रेम करने की प्रेरणा देते थे। कैंची धाम से जुड़ी परंपरा में उनका संदेश है - “Love All, Serve All, Feed All” यानी सभी से प्रेम करो, सभी की सेवा करो और सभी को भोजन कराओ।

कहां है नीम करौली बाबा का सबसे प्रसिद्ध धाम?

नीम करौली बाबा से जुड़ा सबसे प्रसिद्ध आश्रम कैंची धाम है। यह उत्तराखंड के नैनीताल जिले में, भवाली-अल्मोड़ा रोड पर स्थित है। पहाड़ों और हरियाली के बीच बना यह आश्रम भगवान हनुमान के मंदिर के लिए भी प्रसिद्ध है। धाम का नाम कैंची क्यों पड़ा, इसे लेकर भी एक दिलचस्प बात है। स्थानीय भाषा में सड़क के 2 तीखे हेयरपिन मोड़ों को ‘कैंची’ कहा जाता है। यही वजह है- इस स्थान का नाम कैंची पड़ा।

कैंची धाम की स्थापना कब हुई?

कैंची धाम में पहला मंदिर जून 1964 में बना। आश्रम से जुड़ी परंपरा के अनुसार, यह स्थान पहले साधु प्रेमी बाबा और सोमबारी महाराज की यज्ञस्थली से भी जुड़ा रहा था। बाद में नीम करौली बाबा ने यहां हनुमान मंदिर की स्थापना कराई और धीरे-धीरे यह स्थान उनके भक्तों के लिए आध्यात्मिक केंद्र बन गया।

हर साल 15 जून को कैंची धाम का स्थापना दिवस मनाया जाता है। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं और भजन, कीर्तन तथा भंडारे में शामिल होते हैं।

बाबा ने कब समाधि ली?

नीम करौली बाबा ने 11 सितंबर 1973 को वृंदावन में शरीर त्याग किया। उनके जीवन के अंतिम वर्षों में कैंची धाम उनके प्रमुख आध्यात्मिक केंद्रों में शामिल था। बाद में आश्रम परिसर में उनके मंदिर की स्थापना की गई। आज कैंची धाम केवल एक आश्रम नहीं, बल्कि उन भक्तों के लिए आस्था का केंद्र है जो नीम करौली बाबा की भक्ति और उनके सेवा संदेश से जुड़े हुए हैं।

क्यों खास है कैंची धाम?

कैंची धाम की खासियत केवल इसका पहाड़ी वातावरण नहीं है। इसकी पहचान हनुमान भक्ति, सेवा, भंडारा, भजन और नीम करौली बाबा की आध्यात्मिक परंपरा से बनी है। यहां आने वाले भक्त बाबा को याद करते हैं, हनुमान जी के दर्शन करते हैं और उनके बताए प्रेम व सेवा के मार्ग को अपनाने की कोशिश करते हैं। इस तरह नैनीताल की पहाड़ियों में स्थित कैंची धाम आज भी नीम करौली बाबा की उस विरासत को आगे बढ़ा रहा है, जिसमें भक्ति के साथ इंसान की सेवा को भी भगवान की सेवा माना गया है।

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