August 30, 2026

बिहार में आरक्षण पर सियासी संग्राम: चिराग-मांझी के बाद अब मैदान में उतरीं लालू की बेटी रोहिणी आचार्या, जानिए क्या बोलीं - Haribhoomi

बिहार में आरक्षण पर सियासी संग्राम: चिराग-मांझी के बाद अब मैदान में उतरीं लालू की बेटी रोहिणी आचार्या, जानिए क्या बोलीं

बिहार में दलित आरक्षण की समीक्षा पर छिड़े विवाद में रोहिणी आचार्या की एंट्री हो गई है। उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर चिराग और मांझी को नसीहत दी है।

Rohini Acharya on reservation controversy

बिहार में दलित आरक्षण की समीक्षा पर छिड़े विवाद में रोहिणी आचार्या की एंट्री हो गई है। (Ai Image)

  • Published: 30 Aug 2026, 07:57 PM IST
  • Last Updated: 30 Aug 2026, 07:57 PM IST

Rohini Acharya on reservation controversy: बिहार में दलित आरक्षण के मुद्दे पर जारी सियासी घमासान रुकने का नाम नहीं ले रहा है। केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान के बीच छिड़ा विवाद अब इस्तीफे की मांग तक जा पहुंचा है। इस मचे बवाल के बीच अब राष्ट्रीय जनता दल (RJD) सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिणी आचार्या की भी इस राजनीतिक बहस में एंट्री हो गई है। उन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी बात रखते हुए दोनों पक्षों के नेताओं को आरक्षण के मसले पर लंबी नसीहत दी है।

क्या है चिराग पासवान और जीतन राम मांझी के बीच का विवाद?
इस पूरे विवाद की शुरुआत दलित आरक्षण की समीक्षा और उसमें उप-वर्गीकरण (सब-कोटा) की मांग को लेकर हुई है। बिहार सरकार के मंत्री और जीतन राम मांझी के बेटे संतोष कुमार सुमन ने आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा करने की वकालत की है। उनका तर्क है कि दलित समुदाय की कुछ जातियों को इसका अधिक लाभ मिला है, जबकि कई पिछड़ी जातियां आज भी इसके फायदों से महरूम हैं। वंचित तबके को प्राथमिकता देने के लिए उन्होंने उप-कोटा तय करने की बात कही है।

इसके उलट, लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास) के प्रमुख चिराग पासवान ने आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा या बदलाव की किसी भी मांग का पुरजोर विरोध किया है। उनका साफ कहना है कि इस व्यवस्था के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए। इस वैचारिक मतभेद के बाद चिराग ने मांझी पिता-पुत्र को चुनौती देते हुए इस मुद्दे पर अपने पद से इस्तीफा देने को कह दिया।

इसके जवाब में संतोष सुमन ने पलटवार करते हुए कहा कि अगर चिराग पासवान पहले इस्तीफा देकर बयान दें, तो वे भी इस पर फैसला लेंगे। इस जुबानी जंग ने एनडीए के भीतर सियासी गर्मी बढ़ा दी है।

'आरक्षण सिर्फ गरीबी हटाने का जरिया नहीं': रोहिणी आचार्या
इस विवाद में कूदते हुए आरजेडी नेत्री रोहिणी आचार्या ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर एक विस्तृत पोस्ट साझा की है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जब तक समाज में गैर-बराबरी और असमानता मौजूद है, तब तक आरक्षण प्रासंगिक और बेहद जरूरी है। उन्होंने आरक्षण को केवल एक कल्याणकारी योजना मानने से इंकार किया और इसे सामाजिक भेदभाव मिटाने का एक मजबूत संवैधानिक माध्यम करार दिया।

जब तक सामाजिक - आर्थिक गैर बराबरी कायम है, तब तक आरक्षण की व्यवस्था की किसी प्रकार की समीक्षा उचित नहीं है ..

आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था केवल एक कल्याणकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारत में सदियों से चले आ रहे सामाजिक भेदभाव और असमानता को दूर करने का एक संवैधानिक तथा संरचनात्मक… pic.twitter.com/L7xMxAWn5v

— Rohini Acharya (@RohiniAcharya2) August 30, 2026

रोहिणी ने आगे लिखा कि आरक्षण का मुख्य उद्देश्य महज गरीबी दूर करना नहीं, बल्कि वंचित समुदायों की शिक्षा, शासन और प्रशासन में उचित भागीदारी सुनिश्चित करना है। उनके मुताबिक, कागजी विकास के दावों के बावजूद आज भी समाज में जातिगत भेदभाव और सामाजिक-आर्थिक असमानता जिंदा है, ऐसे में आरक्षण वंचितों के लिए एक सुरक्षा कवच का काम करता है।

संविधान और अंबेडकर का हवाला देकर दी नसीहत
अपने संदेश में रोहिणी आचार्या ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 का जिक्र करते हुए कहा कि हमारा संविधान अवसर की समानता और सामाजिक न्याय की वकालत करता है। उन्होंने मौजूदा आरक्षण प्रणाली को बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर और संविधान निर्माताओं के दृष्टिकोण से जोड़ते हुए कहा कि पिछड़ों और वंचितों का सशक्तिकरण ही राष्ट्र निर्माण की नींव है। उन्होंने मांझी पिता-पुत्र को नसीहत दी कि आरक्षण की समीक्षा से हाशिए पर मौजूद वर्गों के संवैधानिक अधिकार प्रभावित होने का खतरा रहता है, इसलिए मौजूदा स्वरूप को बनाए रखना आवश्यक है।

तेजस्वी यादव ने भी साधा निशाना और संतोष सुमन का पक्ष
इससे पहले आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने भी इस मुद्दे पर चिराग पासवान और जीतन राम मांझी पर तीखा हमला बोला था। तेजस्वी ने दावा किया था कि देश में अभी तक ऐसा कोई नहीं जन्मा जो आरक्षण को खत्म कर सके। उन्होंने आरोप लगाया कि इस विषय पर बोलने वाले नेताओं को नागपुर से निर्देश मिलते हैं।

उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि वे खुद कभी आरक्षण के कोटे से लाभान्वित नहीं हुए, जबकि चिराग और मांझी हमेशा आरक्षित सीटों से ही चुनाव लड़ते आए हैं।

तेजस्वी ने आरोप लगाया कि जेडीयू, आरएलएम के साथ-साथ चिराग और मांझी भी परोक्ष रूप से आरक्षण समाप्त करने वालों के साथ खड़े हैं।

दूसरी ओर, संतोष सुमन अपनी मांग पर कायम हैं। उनका मानना है कि दलित समाज के भीतर जो जातियां अब तक पीछे छूट गई हैं, उन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए विशेष प्रावधान होने चाहिए। बहरहाल, इस गरमाए हुए मुद्दे ने आने वाले दिनों में बिहार के सियासी पारे को और अधिक चढ़ा दिया है।