बोरिया मजुमदार का कॉलम:हमारे खेलों को क्रिकेट से मार्केटिंग के गुर सीखने होंगे
8 घंटे पहले
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बोरिया मजुमदार सचिन तेंदुलकर की आत्मकथा के सहलेखक और खेल पत्रकार
आज राष्ट्रीय खेल दिवस (29 अगस्त) है। इस अवसर पर हमें भारतीय खेलों को समग्र दृष्टि से देखने की जरूरत है। एशियाई खेलों में अब महज लगभग 20 ही दिन रह गए हैं। 492 सदस्यों का मजबूत भारतीय दल जल्द ही जापान रवाना होगा, जहां उसका लक्ष्य 100 से अधिक पदक जीतना है। ओलिम्पिक की मेजबानी के लिए बोली की तैयारियां भी चल रही हैं। भारत में खेल आखिरकार प्राथमिकता बनते दिख रहे हैं।
सबसे पहले क्रिकेट की बात करें। घरेलू मैदान पर विश्व कप जीतने के बाद आयरलैंड और इंग्लैंड में कठिन दौर आया। लेकिन श्रीलंका में टेस्ट सीरीज ने उम्मीदों को फिर जगाया है और शुभमन गिल ने खुद को एक लीडर के रूप में मजबूती से स्थापित किया है।
अब निगाहें जल्द ही दक्षिण अफ्रीका में होने वाले 2027 विश्व कप की तैयारियों पर टिक जानी चाहिए। हर भारतीय क्रिकेट प्रशंसक इस बात से भी सहमत होगा कि तेज गेंदबाजों की नई पीढ़ी को न्यूजीलैंड में खुद को साबित करना होगा। तभी भारत टेस्ट क्रिकेट में वास्तव में प्रतिस्पर्धी बना रह सकेगा।
महिला क्रिकेट के सामने जवाबों से ज्यादा सवाल हैं। इंग्लैंड के खिलाफ टेस्ट जीत प्रभावशाली रही, लेकिन टी-20 विश्व कप में टीम का प्रदर्शन उम्मीदों के अनुरूप नहीं रहा है। कप्तानी में बदलाव लगभग तय माना जा रहा था, लेकिन कम-से-कम फिलहाल बीसीसीआई ने हरमनप्रीत के साथ बने रहने का फैसला किया है। क्या स्मृति मंधाना को नेतृत्व का अवसर दिया जाना चाहिए था? इस सवाल से हमें रूबरू होना होगा।
फिर बैडमिंटन और निशानेबाजी की बात आती है। भारत ने नई दिल्ली में विश्व चैम्पियनशिप में बहुत अच्छा प्रदर्शन किया और ट्रीसा-गायत्री के पदकों ने देश को प्रतियोगिता के हर पल से जोड़े रखा। विश्व रैंकिंग में 39वें स्थान से पोडियम तक पहुंचना हर उभरते खिलाड़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत होना ही चाहिए। सिंधु भी एक बार फिर अच्छी लय में दिखाई दे रही हैं और एशियाई खेल उनके लिए बड़ी परीक्षा होंगे। सात्विक और चिराग को चोटों से बेहतर ढंग से निपटना होगा। आयुष पुरुष एकल में बड़ी प्रतिभा साबित हो सकते हैं।
निशानेबाजी की बात करें तो शायद यह कहना गलत नहीं होगा कि इस समय भारत इस खेल में दुनिया की अग्रिम पंक्ति में है। टीम में जबरदस्त प्रतिभा है और अब जरूरत सिर्फ खिलाड़ियों की मानसिक तैयारी और कंडीशनिंग पर काम करने की है।
भारतीय निशानेबाज लगातार विश्वस्तरीय प्रतियोगिताओं के फाइनल में पहुंच रहे हैं। अब समय है कि इन फाइनल मुकाबलों को पदकों में बदला जाए। अगर सब कुछ योजना के मुताबिक रहा, तो निशानेबाजी एशियाई खेलों में भारत को कम-से-कम 20 पदक दिलाने की स्थिति में है।
लेकिन कुश्ती में हम संघर्ष कर रहे हैं, जबकि तीरंदाजी को भी एक बड़ी उपलब्धि की सख्त जरूरत है। राष्ट्रमंडल खेलों में महिला मुक्केबाजों ने जरूर उम्मीद जगाई थी, लेकिन इन मुक्केबाजों की असली परीक्षा एशियाई खेलों में होगी। इनमें से कुछ शानदार फॉर्म में हैं और साक्षी, जैस्मिन और अन्य के लिए लॉस एंजेलिस 2028 में पोडियम पर पहुंचना संभव है।
हॉकी की तस्वीर भी कुछ ऐसी ही है। उम्मीद के संकेत अभी तक किसी बड़ी उपलब्धि में तब्दील नहीं हो पाए हैं। राष्ट्रीय टीम उस बड़ी छलांग की तलाश में है, जो उसे एक बार फिर विश्वस्तरीय प्रतियोगिताओं में पदक की दावेदार बना सके।
महिला टीम जरूर आगे बढ़ी है और एशियाई खेलों में उनका कड़ा इम्तिहान होगा। टेनिस में हालात निराशाजनक हैं। यूएस ओपन की एकल स्पर्धा में भारत का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है और हमें क्षितिज पर ऐसी कोई बड़ी प्रतिभा भी दिखाई नहीं दे रही, जो इस स्थिति को बदल सके।
खेल प्रशासन में भी अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। बीसीसीआई तो आज दुनिया का सबसे शक्तिशाली क्रिकेट बोर्ड है, लेकिन भारतीय ओलिम्पिक संघ और विभिन्न खेल महासंघों को अब एक-दूसरे के साथ तालमेल बिठाकर काम शुरू करना होगा। ओलिम्पिक को दो साल से भी कम समय बचा है। एशियाई खेल हमें संकेत दे देंगे कि हम इस समय कहां खड़े हैं। खेल प्रशासकों को आपसी खींचतान भूलकर, मिलकर काम करना होगा।
हमारे ओलिम्पिक खेलों को क्रिकेट से सीखना होगा- खेलों की बेहतर मार्केटिंग कीजिए, सितारे तैयार कीजिए और खिलाड़ियों की कहानियां लोगों तक पहुंचाइए। कुछ ऐसा ही पैरा-स्पोर्ट्स के क्षेत्र में हो रहा है, जहां भारत एशियाई खेलों में 115 से अधिक पदक जीतने की स्थिति में है। क्या यह सब किया जा सकता है? बिल्कुल। बशर्ते हम अपने सामने खड़े अवसरों को गंवा नहीं दें।
हमारे ओलिम्पिक खेलों को क्रिकेट से सीखना होगा- खेलों की बेहतर मार्केटिंग कीजिए, सितारे तैयार कीजिए और खिलाड़ियों की कहानियां लोगों तक पहुंचाइए। यह सब किया जा सकता है। बशर्ते हम अवसरों को गंवा नहीं दें।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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