आनंद फिल्म में हीरो का एक लाजवाब वाक्य है, बाबू मोशाय, जिंदगी बड़ी होनी चाहिए, लंबी नहीं। और मेरे हिसाब से भारत के प्रधानमंत्रियों को परखने का भी यह एक सत्व-तत्व है। लालबहादुर शास्त्री, पीवी नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी का कार्यकाल लंबा नहीं हुआ मगर बड़ा था। शास्त्री ने 1965 के युद्ध की चुनौती में ठोस लीडरशिप से वह कमाल किया, जिसने देश के मनोबल को ऊंचाई दी। नरसिंह राव मौनी थे, पर पंजाब, कश्मीर, उत्तर-पूर्व में अलगाववाद और आतंकवाद की कमर दृढ़ता से तोड़ी तो आर्थिक सुधारों और कूटनीति से वह दिशा बनाई, जिससे हिंदू विकास दर की जड़ता खत्म हुई। ऐसे ही वाजपेयी हों या डॉ. मनमोहन सिंह, इन्होंने देश और पूरे समाज को साथ लेकर चलने की कोशिश की। अमेरिका से परमाणु करार कर भारत का दशकों पुराना परमाणु अछूतपन खत्म किया। भारत दुनिया की तेजी से उभरती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाने लगा।
पर इनमें से एक भी प्रधानमंत्री ने (या नेहरू, इंदिरा गांधी, मोरारजी आदि किसी ने भी) अपनी सत्ता के पांच, दस, पंद्रह साल होने का तमाशा नहीं बनाया। अपना कीर्तन नहीं करवाया। सत्ता को नौटंकी नहीं बनाई। देश को विश्व राजनीति में लुढ़कता लोटा नहीं बनाया, बल्कि अपनी बुद्धि, वाणी और गरिमा से भारत की पहचान बनवाई।
जबकि नरेंद्र मोदी के लंबे पच्चीस साला पावर में क्या ऐसा एक भी बड़ा काम है? क्या उनके कार्यकाल से भारत की संस्थागत क्षमता, उत्पादकता या सामाजिक शक्ति की श्रीवृद्धि हुई या उलटे बरबादी हुई? बतौर मुख्यमंत्री उनका गुजरात मॉडल हो या बतौर प्रधानमंत्री ‘अच्छे दिन’, अमृतकाल, विकसित भारत जैसे सैकड़ों जुमले, किसी भी एक की असलियत, गहराई और परिणामों को यदि जांचें तो अल्टीमेटली वही सत्य उभरेगा, जिनसे उनका कार्यकाल सुधीजनों से चिह्नित हुआ है।
हां, लालकृष्ण आडवाणी ने अप्रैल 2014 में कहा था, “I will not call Narendra bhai my protégé, but I have never seen a more brilliant and efficient event manager than him.” (मैं नरेंद्र भाई को अपना चेला नहीं कहूंगा, लेकिन मैंने उनसे अधिक प्रतिभाशाली और कुशल इवेंट मैनेजर कभी नहीं देखा।) अटल बिहारी वाजपेयी ने चार अप्रैल 2002 को अहमदाबाद में मोदी को राजधर्म याद कराते हुए कहा था, ‘राजा और शासक के लिए प्रजा-प्रजा में भेद नहीं हो सकता, न जन्म के आधार पर, न जाति के आधार पर, न संप्रदाय के आधार पर’। एक और उदाहरण ‘इंडिया टुडे’ पत्रिका की गुजरात चुनाव जीतने के बाद की यह कवर स्टोरी है, ‘मास्टर डिवाइडर’ (6 जनवरी 2003)। फिर मोदी ने दिल्ली में सत्ता संभाली तो अरुण शौरी का यह अविस्मरणीय कथन सुनाई दिया कि सरकार आर्थिकी नहीं चला रही है, बल्कि वह हेडलाइंस का प्रबंधन (managing headlines) कर रही है। फिर नोटबंदी हुई तब अरुण शौरी ने उसे “largest money-laundering scheme ever” और “idiotic jolt” कहा था।
चार अलग समय, अलग संदर्भ और अलग-अलग वर्णन, राजधर्म, मास्टर डिवाइडर, इवेंट मैनेजर और हेडलाइन मैनेजमेंट। पच्चीस साल बाद इनमें से कौन-सा वर्णन अप्रासंगिक हुआ? पूरे पच्चीस वर्षों की यही पहचान है।
बावजूद इसके नरेंद्र मोदी थकते नहीं हैं। उनका शो, तमाशा कभी ठिठकता या रुकता नहीं। और मैं क्योंकि नरेंद्र मोदी का प्रारंभ से प्रत्यक्षदर्शी हूं तो इस मजेदार रियलिटी को भी जानें। गुजरात के सीएमओ का प्रशासन जब पीके मिश्रा, कैलाशनाथन, एपी शर्मा जैसे अफसर संभालते थे, तब भी नरेंद्र मोदी जनसंपर्क अधिकारी जगदीश ठक्कर के साथ बैठकर प्रेस रिलीज बनवाते थे और ‘गुजरात समाचार’, ‘संदेश’ आदि में हेडलाइन प्रबंधन स्वयं संभालते थे। दिल्ली आए तो वे जगदीश ठक्कर को भी साथ ले कर आए।
तब उनकी प्राथमिकता समाचार पत्र थे। फिर टीवी हुआ। ठक्कर की मृत्यु के बाद मोदी ने हीरेन जोशी को आगे किया। राष्ट्रीय मीडिया को मोदी दुकान बनाया। अखबार, टीवी चैनलों की क्रेडिबिलिटी खत्म हुई तो सोशल मीडिया का प्रबंधन शुरू हुआ। और अब वक्त इंस्टाग्राम का है तो रील्स बना कर अपना मुखड़ा युवाओं के गले उतार रहे है। मंच बदला, माध्यम बदला पर मोदी की मूल राजनीति और शासन की कला याकि हेडलाइन और नैरेटिव पर नियंत्रण को तनिक भी नहीं भूला।
लगता है अब पच्चीस साला मोदी मॉडल आउटडेटेड हो रहा है। सब मैनेज हो गया है। मगर रील्स देखते, मीम बनाते, सवाल पूछते और सत्ता का मजाक उड़ाते नए युवाओं का क्या करें? उनके प्रबंधन में नरेंद्र मोदी आउटडेटेड होते हुए दिखाई दे रहे हैं। सो, सवाल यह नहीं है कि नरेंद्र मोदी ने पच्चीस साल सत्ता में कैसे बिताए? असली सवाल है, उनके पच्चीस वर्षों ने भारत में क्या स्थायी बनाया? क्या नरेंद्र मोदी की ऐसी टिकाऊ उपलब्धि कोई है, कोई नीति, कोई संस्था, कोई आर्थिक-सामाजिक परिवर्तन है या 9,130 दिनों में ले दे कर चौबीसों घंटे राजनीतिक इवेंट की समय बरबादी?
सो, बाबू मोशाय, जिंदगी बड़ी होनी चाहिए लंबी नहीं। सत्ता भी।