August 20, 2026

श्री कुण्डेश्वर महादेव: जहां भगवान शिव कुंड से प्रकट हुए और शिवलिंग बन गए

बुंदेलखंड के टीकमगढ़ जिले से लगभग 5 किलोमीटर दूर, ग्राम शिवपुरी में, जामनी नदी के तट पर स्थित श्री कुंडेश्वर महादेव मंदिर पूरे बुंदेलखंड क्षेत्र का एक अत्यंत पवित्र और ऐतिहासिक धार्मिक स्थल है। यहाँ स्थापित शिवलिंग की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह किसी मानव द्वारा गढ़ा या तराशा नहीं गया है, बल्कि यह द्वापर युग में भू-गर्भ से स्वयं प्रकट हुआ स्वयंभू शिवलिंग है। यह कथा बड़ी ही दिव्य है, हालांकि स्थानीय जनश्रुति के कारण इस कथा की इतनी अधिक प्रभाव न नहीं हो पाई, इसलिए मैं आपको यह कथा सुनाता हूं, हृदय में श्रद्धा धारण करके ध्यानपूर्वक पढ़िए:- 

श्रीकुण्डेश्वरमहादेवकथा

श्रीमद्भागवत पुराण और विष्णु पुराण में यह प्रसंग मिलता है। द्वापर युग में राजा बलि के पुत्र और भक्त प्रहलाद के पड़पोते "बाणासुर" का राज्य स्थापित हुआ। वह संगीत और कला में बड़ा ही निपुण था। बाणासुर ने अमरत्व, अपार शक्ति और सुरक्षा प्राप्त करने के लिए भगवान शिव की घोर तपस्या की। बाणासुर चाहता था कि कोई भी देवता, असुर या मानव उसे युद्ध में पराजित न कर सके। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए। उसने शिवजी से वरदान मांगा कि महादेव स्वयं उसकी तथा उसकी नगरी की रक्षा करें। उसने महादेव और माता पार्वती से प्रार्थना की कि वे उसे अपने पुत्र (कार्तिकेय और गणेश के भाई) के रूप में स्वीकार करें। भगवान शिव ने उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर उसे एक हजार भुजाओं का बल प्रदान किया और उसकी नगरी का रक्षक बनने का वचन दिया। इसके बाद जब भी भगवान शिव तांडव नृत्य करते, बाणासुर अपनी हजार भुजाओं से मृदंग बजाता था।  

कालांतर में उसकी पुत्री उषा और श्री कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध का प्रेम प्रसंग हुआ, तो बाणासुर ने अनिरुद्ध को बंधक बना लिया। यह समाचार सुनकर भगवान श्री कृष्णा क्रोधित हो गए और उन्होंने बाणासुर के विरुद्ध युद्ध घोषित कर दिया। श्री कृष्णा और बाणासुर के बीच में भीषण युद्ध हुआ। जब युद्ध में बाणासुर पराजित होने लगा तब उसकी रक्षा के लिए स्वयं महादेव को प्रकट होना पड़ा। उन्होंने श्री कृष्ण से बाणासुर को जीवित मुक्त कर देने का अनुरोध किया। भगवान श्री कृष्ण ने महादेव के अनुरोध पर बाणासुर को जीवन दान दिया परंतु उसकी समस्त भुजाओं को काट दिया। सिर्फ सामान्य मानव के लिए निर्धारित दो भुजाओं को शेष रहने दिया। इस प्रकार भगवान श्री कृष्ण ने बाणासुर को शक्तिहीन कर दिया। 

इसके बाद बाणासुर का हृदय परिवर्तन हो गया और वह पुनः भगवान शिव का अनन्य भक्त बन गया। उसने धूमधाम के साथ अपनी पुत्री उषा का विवाह अनिरुद्ध से करवाया, पश्चात उसने अपना शेष जीवन शिव भक्ति में व्यतीत किया और अंततः शरीर त्यागकर भगवान शिव के धाम (कैलाश) में शिव के गण (पार्षद) का पद प्राप्त किया। 

जिस स्थान पर, जी कुंड में खड़े होकर बाणासुर ने भगवान शिव की घनघोर तपस्या की थी। जहां पर भगवान शिव प्रकट हुए वहां उनके अंतरध्यान होने के बाद एक दिव्य शिवलिंग प्रकट हुआ। इसी शिवलिंग को श्री कुंडेश्वर महादेव कहा जाता है। 

कलयुग में भक्तों को इस कथा पर श्रद्धा रहे इसलिए यह शिवलिंग प्रतिवर्ष एक चावल के दाने के बराबर बढ़ जाता है। भक्तगण स्पष्ट रूप से देख सकते हैं की शिवलिंग जब प्रकट हुआ था तो उसका आकार कितना था और तब से लेकर अब तक कितना बढ़ गया है।

यही कारण है कि जब ओरछा राजवंश को इसका पता चला तो उन्होंने कुंडेश्वर महादेव को अपना कुलदेवता माना एवं महादेव ने उनकी रक्षा की। 17वीं-18वीं शताब्दी के दौरान ओरछा और टीकमगढ़ के बुंदेला राजाओं द्वारा मंदिर का जीर्णोद्धार और गर्भगृह का निर्माण कराया गया। मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्र में 10वीं से 12वीं शताब्दी (चंदेल कालीन) की कई मूर्तियां और अवशेष प्राप्त हुए हैं, जो यह दर्शाते हैं कि यह स्थान चंदेल शासकों के समय भी एक प्रमुख शैव केंद्र था। 

इस प्रकार श्री कुंडेश्वर महादेव, कलयुग में नहीं बल्कि द्वापर युग से ही शिव भक्ति का केंद्र रहा है। जो कोई भी यहां जाकर शिवलिंग का श्रद्धापूर्वक अभिषेक करता है। महादेव उसको बाणासुर की तरह अजेय बना देते हैं। उसके जीवन के सभी रोग एवं कष्ट दूर हो जाते हैं, उसके शत्रु उस पर कभी विजय प्राप्त नहीं कर पाते। अकाल मृत्यु कब है समाप्त हो जाता है और यदि कभी ऐसी स्थिति बनती है तो महादेव स्वयं उसकी रक्षा करते हैं। 

आचार्योपदेश अवस्थिना विरचिता श्रीकुण्डेश्वरमहादेवकथा सम्पूर्णा।

श्रीकुण्डेश्वरमहादेवस्य जयः! हर हर महादेव!