August 15, 2026

डायन के नाम पर हिंसा क्यों नहीं रुक रही? सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, आंकड़े दिखाते हैं डरावनी तस्वीर

डायन के नाम पर हिंसा क्यों नहीं रुक रही? सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, आंकड़े दिखाते हैं डरावनी तस्वीर

विच-हंटिंग पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

भारत में संविधान लागू हुए साढ़े सात दशक से ज्यादा बीत चुके हैं, लेकिन अंधविश्वास और पूर्वाग्रह के नाम पर महिलाओं को ‘डायन’ करार देकर उन पर हिंसा करने की घटनाएं आज भी थमने का नाम नहीं ले रही हैं. इसी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक अहम फैसले में तीखी टिप्पणी की है, जिसने एक बार फिर इस सामाजिक बुराई पर देश का ध्यान खींचा है. जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन वी अंजारिया की बेंच ने ओडिशा के एक 1998 के मामले में बलकू ओराम की अपील खारिज करते हुए यह टिप्पणी की.

इस मामले में ओराम और उसके सह-आरोपी ने एक महिला को डायन बताकर उसके घर से घसीटकर बाहर निकाला था और बुरी तरह पीटा था, जिससे उसकी मौत हो गई थी. यह पूरी घटना मृतका की बेटी के सामने हुई थी. कोर्ट ने कहा कि अगर विच-हंटिंग जैसी अपमानजनक प्रथाएं कानून के शासन और संवैधानिक नैतिकता के सिद्धांतों से बाहर बनी रहती हैं, तो एक संवैधानिक लोकतंत्र जीवित नहीं रह सकता. बेंच ने इस बात पर गहरी चिंता जताई कि पीड़िता को असहाय होते हुए भी डायन बताकर मारा गया और उसकी बेटी को अपनी मां की इतनी क्रूर हत्या देखनी पड़ी.

Witch Hunting Se Juda Data

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

फैसले की शुरुआत डॉ. बी आर अंबेडकर के इस कथन से हुई कि एक न्यायपूर्ण समाज वही है जिसमें श्रद्धा और तिरस्कार का भाव मिटकर एक करुणामय समाज का निर्माण हो. कोर्ट ने कहा कि हमारे समाज के कुछ हिस्सों में विच-हंटिंग की बुराई अब भी मौजूद है, जहां पूर्वाग्रह, अंधविश्वास और तर्कहीन भय कानून के शासन और संवैधानिक नैतिकता पर हावी हो जाते हैं. कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि विच-हंटिंग की शिकार ज्यादातर महिलाएं ही होती हैं, जिन्हें यातना, पिटाई, यौन हिंसा और सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है. बेंच ने कहा कि किसी महिला को उन कामों के लिए दोषी ठहराना जो उसने किए ही नहीं, यह गहरे सामाजिक पूर्वाग्रह को दर्शाता है, जिसमें समाधान की बजाय बलि का बकरा तलाशा जाता है.

आंकड़े क्या कहते हैं

NCRB के 2023 के आंकड़ों पर नजर डालें तो तस्वीर और डरावनी हो जाती है. NCRB के 2023 के आंकड़ों के मुताबिक, witchcraft के आरोप/शक से जुड़ी हत्या के 74 मामले दर्ज हुए. इनमें झारखंड 22 मामलों के साथ सबसे ऊपर था, जबकि छत्तीसगढ़ में 19 और मध्य प्रदेश में 14 मामले दर्ज हुए.

दिलचस्प बात यह है कि 2020 के मुकाबले यह आंकड़ा घटा जरूर है, जब देश में 88 ऐसी हत्याएं दर्ज हुई थीं और उस साल मध्य प्रदेश (17 मामले) सबसे आगे था जबकि झारखंड में 15 मामले थे. लेकिन लंबी अवधि देखें तो हालात कहीं ज्यादा चिंताजनक हैं. 2015 से 2021 के बीच देश में अंधविश्वास या जादू-टोने के डर से जुड़ी कुल 663 हत्याएं दर्ज हुईं, यानी औसतन हर साल करीब 95 महिलाएं इस तरह की हिंसा की भेंट चढ़ीं.

Wich Hunting

सिर्फ अंधविश्वास नहीं, इसके पीछे और भी वजहें

लंबे समय से यह बताते आए हैं कि विच-हंटिंग सिर्फ अंधविश्वास की उपज नहीं है. झारखंड, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश जैसे आदिवासी बहुल राज्यों में अक्सर यह देखा गया है कि जमीन और संपत्ति के विवाद भी इसके पीछे बड़ी वजह बनते हैं. खासकर तब जब कोई अकेली या विधवा महिला जमीन की मालकिन हो और परिवार के अन्य सदस्य उस पर कब्जा चाहते हों. ऐसे मामलों में महिला को डायन घोषित कर उसे गांव से बाहर निकालना या उसकी हत्या कर देना संपत्ति हड़पने का एक आसान रास्ता बन जाता है. इसके साथ ही गहरी पितृसत्तात्मक सोच भी इसमें बड़ी भूमिका निभाती है, जहां स्वतंत्र, मुखर या समाज की परंपराओं को चुनौती देने वाली महिलाओं को निशाना बनाया जाता है. मानसिक बीमारी, अकेलापन, या किसी बीमारी-मौत के बाद बलि का बकरा ढूंढने की प्रवृत्ति भी ऐसी घटनाओं को हवा देती है.

कानून होने के बावजूद लगाम क्यों नहीं

विच-हंटिंग पर कोई केंद्रीय विशेष कानून नहीं है. बिहार, झारखंड, ओडिशा, राजस्थान और असम जैसे कुछ राज्यों ने इसे रोकने के लिए अलग कानून बनाए हैं. अन्य राज्यों में ऐसे मामलों से निपटने के लिए हत्या, मारपीट, धमकी और अन्य अपराधों से जुड़े सामान्य आपराधिक कानूनों का इस्तेमाल किया जाता है. पुलिस थानों में अक्सर ऐसे मामलों को सामान्य हत्या या पारिवारिक विवाद के तौर पर दर्ज किया जाता है, गवाह डर के मारे पीछे हट जाते हैं और गांव स्तर पर सामाजिक दबाव इतना ज्यादा होता है कि पीड़ित परिवार शिकायत तक दर्ज नहीं करा पाता. शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, झाड़-फूंक करने वाले ‘ओझाओं’ पर भरोसा और महिलाओं की आर्थिक निर्भरता भी इस समस्या को और गहरा करती है.

  1. बिहार में 1999 में प्रिवेंशन ऑफ विच (डायन) प्रैक्टिसेज एक्ट लागू किया गया. डायन बताकर महिला को प्रताड़ित करने और ऐसी प्रथा को बढ़ावा देने पर सजा का प्रावधान है.
  2. झारखंड विचक्राफ्ट प्रिवेंशन एक्ट, 2001 के तहत किसी महिला को डायन बताकर प्रताड़ित करना या नुकसान पहुंचाना अपराध है. कानून का उद्देश्य डायन प्रथा और इससे जुड़ी हिंसा पर रोक लगाना है.
  3. ओडिशा प्रिवेंशन ऑफ विच-हंटिंग एक्ट, 2013 में किसी महिला को डायन बताने और उसके खिलाफ हिंसा करने जैसी गतिविधियों को अपराध बनाया गया है. दोषियों के लिए सजा का प्रावधान है.
  4. राजस्थान प्रिवेंशन ऑफ विच-हंटिंग एक्ट, 2015 के तहत डायन बताना, प्रताड़ित करना और डायन के नाम पर हिंसा करना अपराध है. कानून में ऐसी गतिविधियों को बढ़ावा देने वालों के खिलाफ भी कार्रवाई का प्रावधान है.
  5. असम विच हंटिंग (प्रोहिबिशन, प्रिवेंशन एंड प्रोटेक्शन) एक्ट में डायन प्रथा पर रोक के साथ पीड़ितों की सुरक्षा का भी प्रावधान है. कानून में दोषियों के लिए कड़ी सजा का प्रावधान किया गया है.
  6. छत्तीसगढ़ में अलग से एंटी-डायन कानून होने का दावा सावधानी से करना चाहिए. ऐसे मामलों में हत्या, मारपीट और धमकी जैसे अपराधों के लिए सामान्य आपराधिक कानून लागू किए जा सकते हैं.

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी एक बार फिर इस ओर इशारा करती है कि जब तक जमीनी स्तर पर सामाजिक जागरूकता, सख्त कानूनी क्रियान्वयन और महिलाओं की आर्थिक-सामाजिक सुरक्षा को मजबूत नहीं किया जाता, तब तक अंधविश्वास के नाम पर होने वाली यह हिंसा रुकना मुश्किल है.

देवेश कुमार पांडेय

देवेश कुमार पांडेय

देवेश कुमार पांडेय TV9 Hindi में बतौर सब-एडिटर काम कर रहे हैं. उत्तर प्रदेश के अमेठी के रहने वाले देवेश को राजनीति के अलावा इतिहास, साहित्य में दिलचस्पी है.  साल 2024 में भारतीय जन संचार संस्थान (IIMC) के अमरावती कैंपस से पत्रकारिता की पढ़ाई की है. देवेश को घूमना, लिखना, पढ़ना और पॉडकास्ट सुनना पसंद है.

Read More

google button