August 10, 2026

Kasganj Assembly Caste Equations: कासगंज जातीय समीकरण 2027

Kasganj Assembly Caste Equations की सबसे मजबूत धुरी लोधी मतदाता हैं। कासगंज सदर विधानसभा में लोधी समाज सबसे प्रभावशाली राजनीतिक समूहों में माना जाता है, जबकि अनुसूचित जाति, मुस्लिम, यादव, शाक्य-कुशवाह, ब्राह्मण, ठाकुर और वैश्य मतदाता भी जीत-हार के समीकरण में बड़ी भूमिका निभाते हैं। 2026 की अंतिम SIR मतदाता सूची के बाद कासगंज विधानसभा में 2,98,881 मतदाता दर्ज हैं। इनमें 1,74,174 पुरुष, 1,24,698 महिला और 9 अन्य मतदाता शामिल हैं।

उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों के जातिगत समीकरण / जातीय समीकरण और ‘सोशल इंजीनियरिंग’ पर चुनावी परिणाम काफी हद तक निर्भर करता है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों की मानें तो उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 एक ऐसा निर्णायक अवसर है जो राज्य की दीर्घकालिक राजनीतिक दिशा को स्पष्ट करेगा।

उत्तर प्रदेश एसआईआर (SIR) की अंतिम सूची 2026 के तहत राज्य के सभी 75 जिलों में विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान चलाया गया, जिसके परिणामस्वरूप कुल मतदाताओं की संख्या में कमी दर्ज की गई है।

कासगंज जिले के कासगंज विधानसभा के 2007 से 2022 तक का तुलनात्मक विश्लेषण, ताज़ा अपडेट, चुनावी इतिहास और पिछले चुनावों के नतीजे

उत्तर प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों के पिछले चुनावी नतीजों का 2007 से 2022 तक तुलनात्मक विश्लेषण, जिसमें प्रत्येक सीट का चुनावी इतिहास, विजेता और उपविजेता प्रत्याशी, मत प्रतिशत, जीत का अंतर और बदलते राजनीतिक समीकरण शामिल हैं।

कासगंज विधानसभा एक नजर में

विवरणजानकारी
विधानसभा क्षेत्रकासगंज
विधानसभा संख्या100
जिलाकासगंज
लोकसभा क्षेत्रएटा
आरक्षण स्थितिसामान्य
वर्तमान विधायकदेवेंद्र सिंह लोधी
पार्टीभारतीय जनता पार्टी
2026 कुल मतदाता2,98,881
पुरुष मतदाता1,74,174
महिला मतदाता1,24,698
अन्य मतदाता9
2022 विजेतादेवेंद्र सिंह, BJP
2022 उपविजेतामनपाल सिंह, SP
2022 जीत का अंतर46,265
2024 लोकसभा में BJP वोट1,13,678
2024 लोकसभा में SP वोट90,238
2024 BJP बढ़त23,440
प्रमुख सामाजिक समूहलोधी, SC, मुस्लिम, यादव, शाक्य, ठाकुर, ब्राह्मण, वैश्य

कासगंज सामान्य विधानसभा सीट है और मौजूदा विधायक देवेंद्र सिंह लोधी लगातार 2017 और 2022 में यहां से भाजपा के टिकट पर जीत चुके हैं। 2022 में उन्होंने सपा के मनपाल सिंह को 46,265 वोट से हराया था।

Kasganj Assembly Caste Equations को समझने के लिए सबसे पहले लोधी मतदाताओं की भूमिका देखनी होगी। पुराने निर्वाचन आकलनों में लोधी समाज को कासगंज का सबसे बड़ा राजनीतिक समूह बताया गया है और इसकी हिस्सेदारी एक-चौथाई से अधिक तक आंकी गई है। इसके अलावा अनुसूचित जाति की जनसांख्यिकीय हिस्सेदारी करीब 17.77 प्रतिशत और मुस्लिम आबादी करीब 10.70 प्रतिशत बताई गई है। यादव मतदाताओं का संकेतात्मक हिस्सा लगभग 8 से 12 प्रतिशत और वैश्य समुदाय का करीब 8 से 10 प्रतिशत माना जाता रहा है। ब्राह्मण और ठाकुर मतदाता भी कई बूथों पर महत्वपूर्ण प्रभाव रखते हैं।

हालिया चुनावी आकलन भी कासगंज को लोधी-राजपूत, शाक्य और गैर-यादव OBC प्रभाव वाली सीट के रूप में देखते हैं। इसका मतलब यह है कि भाजपा का मजबूत आधार केवल सवर्ण मतदाताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि गैर-यादव पिछड़े वर्गों की बड़ी भूमिका भी इसमें शामिल है।

कासगंज विधानसभा का संकेतात्मक जातीय समीकरण

जाति/समुदायअनुमानित/राजनीतिक स्थितिचुनावी महत्व
लोधी/लोध राजपूतसबसे बड़ा प्रभावशाली समूहBJP की सबसे मजबूत सामाजिक धुरी
अनुसूचित जातिकरीब 17.77% जनसांख्यिकीय संकेतBJP, SP और BSP तीनों की नजर
मुस्लिमकरीब 10.70% का जनसांख्यिकीय संकेतविपक्षी गठजोड़ में महत्वपूर्ण
यादवलगभग 8-12% का पुराना अनुमानSP का प्रमुख आधार
वैश्यकरीब 8-10% का संकेतात्मक अनुमानशहरी बाजार क्षेत्रों में प्रभाव
शाक्य/कुशवाह-मौर्यमहत्वपूर्ण गैर-यादव OBC2027 में बड़ा स्विंग समूह
ठाकुर/राजपूतमहत्वपूर्ण सवर्ण समूहकई ग्रामीण बूथों पर प्रभाव
ब्राह्मणप्रभावशाली सवर्ण वोटकरीबी चुनाव में महत्वपूर्ण
जाटव व अन्य SCबड़ा सामाजिक आधारBSP के साथ BJP-SP की भी नजर
कश्यप, सैनी व अन्य OBCबूथवार प्रभावचुनावी अंतर बदलने की क्षमता
2026 कुल आधिकारिक मतदाता2,98,881

यह तालिका निर्वाचन आयोग की जाति-वार वोटर लिस्ट नहीं है। विधानसभा क्षेत्र में मतदाताओं की जाति के आधार पर कोई आधिकारिक सूची जारी नहीं होती। इसलिए सामाजिक हिस्सेदारी को पुराने जनसांख्यिकीय और चुनावी संकेत के रूप में देखना चाहिए, न कि 2026 की जाति-वार आधिकारिक संख्या के रूप में।

कासगंज वोटर लिस्ट 2026: सीट पर 2,98,881 मतदाता

SIR 2026 के अंतिम प्रकाशन के बाद कासगंज जिले में कुल 9,25,031 मतदाता हैं। जिले की तीन विधानसभा सीटों में पटियाली में सबसे अधिक 3,17,691, कासगंज में 2,98,881 और अमांपुर में 2,86,175 मतदाता दर्ज हैं।

कासगंज जिले की विधानसभा-वार वोटर लिस्ट 2026

विधानसभापुरुषमहिलाअन्यकुल मतदाता
कासगंज1,74,1741,24,69892,98,881
अमांपुर1,56,8151,29,35192,86,175
पटियाली1,74,7911,42,89193,17,691
जिला कुल5,05,7804,19,224279,25,031

2026 की अंतिम सूची से पहले जिले में 10,57,916 मतदाता दर्ज थे। सत्यापन के बाद संख्या 8,85,678 रह गई, जबकि दावे और आपत्तियों के दौरान 42,037 नए मतदाता जुड़े और अतिरिक्त 2,684 नाम हटाए गए। अंतिम संख्या 9,25,031 रही।

2024 से 2026 के बीच 71 हजार से ज्यादा मतदाता कम

कासगंज विधानसभा में 2012 से 2024 तक मतदाताओं की संख्या लगातार बढ़ी थी। 2012 में 3,20,619 मतदाता थे, जो 2017 में 3,45,711, 2019 में 3,55,456, 2022 में 3,64,023 और 2024 लोकसभा चुनाव तक 3,70,390 हो गए थे। SIR 2026 के बाद यह संख्या घटकर 2,98,881 रह गई।

वर्षकुल मतदाता
20123,20,619
20173,45,711
20193,55,456
20223,64,023
20243,70,390
2026 SIR2,98,881

2024 की तुलना में 2026 की सूची में 71,509 मतदाताओं की नेट कमी है, यानी करीब 19.3 प्रतिशत। इसलिए 2022 या 2024 के जाति-वार अनुमान को सीधे 2027 की नई मतदाता सूची पर लागू करना उचित नहीं होगा। राजनीतिक दलों को लोधी, मुस्लिम, यादव, शाक्य, जाटव और दूसरे प्रमुख समुदायों वाले बूथों की मतदाता संख्या दोबारा जांचनी होगी।

लोधी मतदाता क्यों हैं कासगंज की राजनीति की केंद्रीय ताकत?

कासगंज की राजनीति पर लोधी समाज का प्रभाव लंबे समय से दिखाई देता है। सीट के वर्तमान विधायक देवेंद्र सिंह लोधी इसी सामाजिक पृष्ठभूमि से आते हैं। उन्होंने 2017 में पहली बार भाजपा के टिकट पर सीट जीती और 2022 में पहले से भी बड़ी संख्या में वोट लेकर लगातार दूसरी जीत दर्ज की।

कासगंज की राजनीति में पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की राजनीतिक विरासत का प्रभाव भी लंबे समय तक रहा है। 2012 में जब कल्याण सिंह भाजपा से अलग थे और उनकी जन क्रांति पार्टी चुनाव मैदान में थी, तब देवेंद्र सिंह को उसी पार्टी से 35,047 वोट मिले थे। उस चुनाव में भाजपा मुख्य मुकाबले से काफी पीछे रही थी। बाद में जन क्रांति पार्टी के भाजपा में विलय के बाद 2017 में देवेंद्र सिंह भाजपा प्रत्याशी बने और 1,01,908 वोट के साथ बड़ी जीत दर्ज की।

यह चुनावी यात्रा कासगंज में लोधी मतदाताओं के राजनीतिक महत्व का स्पष्ट संकेत देती है।

गैर-यादव OBC वोट BJP की दूसरी बड़ी ताकत

लोधी मतदाताओं के अलावा शाक्य, मौर्य-कुशवाह, कश्यप, सैनी और दूसरे गैर-यादव OBC समूह भी कासगंज में महत्वपूर्ण हैं। हाल के राजनीतिक आकलनों में विशेष रूप से शाक्य मतदाताओं को 2027 के लिए संभावित स्विंग वोट के रूप में देखा जा रहा है।

2024 के एटा लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने देवेश शाक्य को उम्मीदवार बनाया और पूरी लोकसभा सीट जीत ली। हालांकि कासगंज विधानसभा खंड में भाजपा आगे रही, लेकिन उसकी बढ़त 2019 के मुकाबले काफी कम हो गई। इससे शाक्य और दूसरे गैर-यादव OBC मतों को लेकर 2027 की लड़ाई और महत्वपूर्ण हो गई है।

सपा के लिए चुनौती यही होगी कि वह यादव-मुस्लिम आधार के बाहर शाक्य, कुशवाह, मौर्य, कश्यप और दलित मतदाताओं में कितना समर्थन जोड़ पाती है।

अनुसूचित जाति करीब 18 प्रतिशत, इसलिए तीसरी बड़ी चुनावी धुरी

कासगंज विधानसभा में अनुसूचित जाति की जनसांख्यिकीय हिस्सेदारी करीब 17.77 प्रतिशत बताई जाती है। लगभग पांचवें हिस्से के आसपास का यह सामाजिक आधार किसी भी बड़े मुकाबले में निर्णायक हो सकता है।

बसपा लंबे समय तक इस वोट के बड़े हिस्से की प्रमुख दावेदार रही है, लेकिन हाल के विधानसभा चुनावों में पार्टी का प्रदर्शन कमजोर हुआ है। 2017 में बसपा के अजय चतुर्वेदी को 37,818 वोट मिले थे, जबकि 2022 में मोहम्मद आरिफ को 23,001 वोट मिले।

चुनावBSP प्रत्याशीवोट
2012हसरत उल्लाह शेरवानी38,356
2017अजय चतुर्वेदी37,818
2022मोहम्मद आरिफ23,001

बसपा के मतों में कमी ने सपा और भाजपा दोनों के लिए दलित मतदाताओं के बीच विस्तार की जगह बनाई है। 2027 में BSP यदि जाटव और अन्य दलित समुदायों में अपना पुराना आधार मजबूत करती है तो चुनाव का गणित फिर बदल सकता है।

मुस्लिम वोट: संख्या सीमित नहीं, गठजोड़ में ज्यादा प्रभावी

पुराने जनसांख्यिकीय संकेत कासगंज विधानसभा में मुस्लिम आबादी करीब 10.70 प्रतिशत बताते हैं। अन्य चुनावी अनुमान इसे इससे अधिक भी बताते रहे हैं, इसलिए किसी एक प्रतिशत को अंतिम जाति-वार मतदाता आंकड़ा नहीं माना जाना चाहिए।

कासगंज की चुनावी राजनीति में मुस्लिम नेतृत्व का पुराना इतिहास भी रहा है। हसरत उल्लाह शेरवानी ने 2007 में बसपा से सीट जीती थी। 2012 में वह बसपा से दूसरे स्थान पर और 2017 में सपा से दूसरे स्थान पर रहे। इससे मुस्लिम मतदाताओं की संख्या के साथ उम्मीदवार और व्यापक सामाजिक गठजोड़ का महत्व भी सामने आता है।

2027 में यदि मुस्लिम वोट का बड़ा हिस्सा सपा के साथ केंद्रित रहता है तो पार्टी के लिए अगली चुनौती यादव मतों से आगे गैर-यादव OBC और अनुसूचित जाति के मतदाताओं को जोड़ने की होगी।

यादव वोट SP का आधार, लेकिन अकेले पर्याप्त नहीं

कासगंज में यादव मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 8 से 12 प्रतिशत के आसपास होने का पुराना चुनावी अनुमान है। फिरोजाबाद, मैनपुरी या एटा बेल्ट की कुछ दूसरी सीटों की तुलना में कासगंज में यादव मतदाता सबसे बड़ा समूह नहीं हैं। यही सामाजिक अंतर इस सीट की राजनीतिक प्रकृति को अलग करता है।

समाजवादी पार्टी ने 2012 में मनपाल सिंह के जरिए यह सीट जीती थी। 2022 में भी पार्टी ने मनपाल सिंह को मैदान में उतारा, लेकिन उन्हें 77,145 वोट मिले और भाजपा 46,265 मत से जीत गई।

इसलिए सपा के लिए यादव-मुस्लिम समीकरण आवश्यक जरूर है, लेकिन जीत के लिए पर्याप्त नहीं दिखाई देता। उसे गैर-यादव पिछड़ों, दलितों और कुछ सवर्ण मतदाताओं में भी सेंध लगानी होगी।

वैश्य, ब्राह्मण और ठाकुर वोट भी महत्वपूर्ण

कासगंज शहर, सोरों और बिलराम जैसे कस्बाई क्षेत्रों में वैश्य मतदाताओं की भूमिका महत्वपूर्ण है। वैश्य समुदाय की हिस्सेदारी का पुराना संकेत 8 से 10 प्रतिशत के आसपास रखा गया है। ब्राह्मण और ठाकुर मतदाता भी विधानसभा के अलग-अलग ग्रामीण और शहरी बूथों पर प्रभाव रखते हैं।

भाजपा के लिए लोधी और गैर-यादव OBC आधार के साथ इन सवर्ण और कारोबारी वर्गों का समर्थन महत्वपूर्ण रहा है। दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी 2027 में अपने PDA आधार के साथ सवर्ण समुदाय के हिस्से तक पहुंच बढ़ाने की कोशिश करती है तो मुकाबले में सामाजिक अंतर कम हो सकता है।

कासगंज विधानसभा चुनाव 2022: BJP को 52.67 प्रतिशत वोट

2022 के विधानसभा चुनाव में कासगंज में कुल 3,64,023 मतदाता थे। 2,34,326 वैध वोट पड़े। भाजपा प्रत्याशी देवेंद्र सिंह को 1,23,410 यानी 52.67 प्रतिशत वोट मिले। सपा के मनपाल सिंह 77,145 वोट के साथ दूसरे स्थान पर रहे। भाजपा की जीत का अंतर 46,265 वोट रहा।

कासगंज विधानसभा चुनाव 2022 परिणाम

प्रत्याशीपार्टीवोटवोट प्रतिशत
देवेंद्र सिंहBJP1,23,41052.67%
मनपाल सिंहSP77,14532.92%
मोहम्मद आरिफBSP23,0019.82%
कुलदीप कुमारकांग्रेस5,9512.54%
NOTA1,2640.54%

2022 में भाजपा को आधे से अधिक वैध वोट मिलना बताता है कि पार्टी की जीत किसी एक जाति के समर्थन से संभव नहीं थी। लोधी आधार के साथ सवर्ण, गैर-यादव OBC और अन्य सामाजिक वर्गों के हिस्से को जोड़कर ही 52 प्रतिशत से अधिक वोट शेयर बना।

2017 में भाजपा की 52,030 वोट की बड़ी जीत

2017 में भी भाजपा ने कासगंज में बड़ा अंतर बनाया था। देवेंद्र सिंह राजपूत को 1,01,908 वोट मिले। सपा के हसरत उल्लाह शेरवानी को 49,878 और बसपा के अजय चतुर्वेदी को 37,818 वोट मिले। महान दल के सुधीर उर्फ पप्पू यादव ने भी 22,250 वोट हासिल किए थे।

प्रत्याशीपार्टीवोट
देवेंद्र सिंह राजपूतBJP1,01,908
हसरत उल्लाह शेरवानीSP49,878
अजय चतुर्वेदीBSP37,818
सुधीर उर्फ पप्पू यादवमहान दल22,250
BJP की जीत52,030

2017 में सपा, बसपा और दूसरे दलों के बीच विपक्षी वोट का बंटवारा भाजपा के लिए फायदेमंद रहा। वहीं भाजपा ने अपना गैर-यादव OBC और सवर्ण आधार मजबूत किया।

2012 में SP ने 10,179 वोट से जीती थी सीट

2012 का चुनाव कासगंज के मौजूदा राजनीतिक मुकाबले को समझने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। सपा के मनपाल सिंह को 48,535 वोट मिले और उन्होंने बसपा के हसरत उल्लाह शेरवानी को 10,179 वोट से हराया। देवेंद्र सिंह उस समय जन क्रांति पार्टी से चुनाव लड़कर 35,047 वोट के साथ तीसरे स्थान पर रहे थे।

प्रत्याशीपार्टीवोट
मनपाल सिंहSP48,535
हसरत उल्लाह शेरवानीBSP38,356
देवेंद्र सिंहजन क्रांति पार्टी35,047
सईद मुस्तफा शेरवानीकांग्रेस21,656
SP की जीत10,179

2012 और 2017 के बीच कासगंज का चुनावी नक्शा पूरी तरह बदल गया। जन क्रांति पार्टी का सामाजिक आधार भाजपा के साथ आने के बाद भाजपा 2017 में एक लाख से अधिक वोट तक पहुंच गई।

2007 से 2022: चार चुनावों में तीन अलग-अलग राजनीतिक तस्वीरें

वर्षविजेतापार्टीवोटउपविजेतापार्टीअंतर
2007हसरत उल्लाहBSP35,105नेतराम सिंहBJP2,372
2012मनपाल सिंहSP48,535हसरत उल्लाह शेरवानीBSP10,179
2017देवेंद्र सिंह राजपूतBJP1,01,908हसरत उल्लाह शेरवानीSP52,030
2022देवेंद्र सिंहBJP1,23,410मनपाल सिंहSP46,265

2007 में बसपा, 2012 में समाजवादी पार्टी और 2017 व 2022 में भाजपा की जीत बताती है कि कासगंज किसी एक पार्टी की ऐतिहासिक रूप से स्थायी सीट नहीं रही। हालांकि पिछले दो विधानसभा चुनावों ने भाजपा को मजबूत बढ़त दी है।

2024 लोकसभा चुनाव में BJP आगे रही, लेकिन बढ़त घटी

2024 लोकसभा चुनाव में एटा संसदीय सीट समाजवादी पार्टी ने जीती, लेकिन कासगंज विधानसभा खंड में भाजपा ने अपनी बढ़त बरकरार रखी। भाजपा उम्मीदवार राजवीर सिंह को कासगंज खंड में 1,13,678 वोट, जबकि सपा उम्मीदवार देवेश शाक्य को 90,238 वोट मिले। भाजपा की बढ़त 23,440 वोट रही।

कासगंज विधानसभा खंड: लोकसभा चुनाव 2024

पार्टी/प्रत्याशीवोट
BJP – राजवीर सिंह1,13,678
SP – देवेश शाक्य90,238
BJP की बढ़त23,440

यह आंकड़ा भाजपा के लिए राहत के साथ चेतावनी भी है। 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को कासगंज विधानसभा क्षेत्र से सपा पर 45,493 वोट की बढ़त मिली थी। 2024 में यह घटकर 23,440 रह गई। यानी पांच वर्षों में लोकसभा स्तर पर भाजपा की बढ़त लगभग आधी हो गई।

2024 में 406 बूथों में BJP 248 पर आगे

2024 लोकसभा चुनाव के दौरान कासगंज विधानसभा क्षेत्र के 406 बूथों में भाजपा प्रत्याशी ने 248 बूथ, जबकि सपा प्रत्याशी ने 158 बूथ जीते। विधानसभा क्षेत्र में करीब 2.25 लाख मतदाताओं ने उस चुनाव में मतदान किया था।

बूथ स्तर पर भाजपा की बढ़त साफ थी, लेकिन लगभग 39 प्रतिशत बूथों पर सपा का आगे रहना यह भी बताता है कि विपक्ष का सामाजिक आधार कमजोर नहीं है। 2027 में दोनों दलों का फोकस ऐसे स्विंग बूथों पर रहेगा जहां 2022 और 2024 के बीच मतदान व्यवहार बदला।

कासगंज करीब 70-80 प्रतिशत ग्रामीण सीट

कासगंज विधानसभा में कासगंज शहर, सोरों और बिलराम जैसे शहरी-कस्बाई केंद्र मौजूद हैं, फिर भी निर्वाचन क्षेत्र का बड़ा हिस्सा ग्रामीण है। पुराने निर्वाचन प्रोफाइल में करीब 70 से 80 प्रतिशत मतदाताओं को ग्रामीण क्षेत्र से जुड़ा बताया गया है।

इसका सीधा असर चुनावी मुद्दों पर पड़ता है। सड़क, सिंचाई, बिजली, कृषि, रोजगार और गांवों में बुनियादी सुविधाएं यहां जातीय समीकरण जितनी ही महत्वपूर्ण हो सकती हैं।

विकास बनाम स्थानीय समस्याएं भी 2027 में मुद्दा

मौजूदा विधायक के कार्यकाल में सड़कों, विद्युतीकरण, हाईमास्ट लाइट और पेयजल सुविधाओं से जुड़े कार्यों का दावा किया गया है। क्षेत्र में 300 से अधिक छोटे-बड़े मार्गों के निर्माण या सुधार और 14 वाटर कूलर लगाए जाने की बात सामने आई है। दूसरी तरफ विपक्ष और स्थानीय स्तर पर टूटी सड़कों, बेरोजगारी, शिक्षा तथा दूसरी बुनियादी सुविधाओं को लेकर सवाल भी उठते रहे हैं।

2027 में इसका राजनीतिक अर्थ यह होगा कि चुनाव केवल लोधी, यादव, मुस्लिम या शाक्य वोटों की जोड़-घटाना पर नहीं टिकेगा। विधायक के कामकाज और मतदाताओं की स्थानीय अपेक्षाओं का भी आकलन होगा।

2027 में BJP का संभावित सामाजिक फॉर्मूला

भाजपा की मौजूदा ताकत लोधी मतदाताओं के साथ सवर्ण और गैर-यादव OBC समूहों का व्यापक गठजोड़ है। 2017 और 2022 के परिणाम बताते हैं कि यह समीकरण पार्टी को लगातार दो बार बड़ी जीत दिला चुका है।

2027 में भाजपा का संभावित चुनावी फॉर्मूला इस प्रकार दिखाई देता है—

लोधी + शाक्य/अन्य गैर-यादव OBC + ब्राह्मण + ठाकुर + वैश्य + SC का हिस्सा

लेकिन भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती 2024 का संकेत है, जब लोकसभा चुनाव में उसकी विधानसभा-खंड बढ़त 45,493 से घटकर 23,440 रह गई। पार्टी को गैर-यादव OBC और दलित मतों में किसी संभावित खिसकाव को रोकना होगा।

SP के लिए MY से आगे बढ़ना जरूरी

समाजवादी पार्टी का बुनियादी चुनावी आधार यादव और मुस्लिम मतदाताओं के बीच मजबूत माना जाता है। लेकिन कासगंज में यादव समाज सबसे बड़ा सामाजिक समूह नहीं है। इसलिए केवल MY समीकरण के आधार पर भाजपा के मजबूत लोधी-गैर यादव OBC गठजोड़ का मुकाबला करना मुश्किल रहा है।

2024 में देवेश शाक्य को एटा लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाकर सपा ने गैर-यादव OBC मतदाताओं में विस्तार का प्रयोग किया और लोकसभा सीट जीतने में सफल रही। कासगंज विधानसभा खंड में भाजपा आगे रही, लेकिन उसकी बढ़त कम हो गई।

2027 में सपा का संभावित फॉर्मूला हो सकता है—

यादव + मुस्लिम + शाक्य/मौर्य-कुशवाह + SC का हिस्सा + अन्य पिछड़े

यदि सपा शाक्य और दूसरे गैर-यादव पिछड़े मतदाताओं में मजबूत सेंध लगा पाती है तो सीट का मुकाबला 2022 के मुकाबले काफी करीबी हो सकता है।

BSP का वोट तय कर सकता है जीत का अंतर

2022 में बसपा को कासगंज सीट पर 23,001 वोट मिले थे। यह संख्या भाजपा की जीत के 46,265 वोट के अंतर से कम थी, लेकिन यदि मुकाबला 2027 में 2024 लोकसभा की तरह करीब आता है तो 20-25 हजार वोट वाला तीसरा कोण बेहद महत्वपूर्ण हो सकता है।

बसपा की पहली चुनौती अपने जाटव-दलित आधार को वापस मजबूत करना होगी। यदि पार्टी दलित मतों के साथ मुस्लिम या किसी प्रभावशाली OBC चेहरे को जोड़ती है तो सपा की सामाजिक रणनीति ज्यादा प्रभावित हो सकती है। वहीं दलित वोट का बड़ा हिस्सा भाजपा या सपा की तरफ जाने पर मुख्य मुकाबला और ज्यादा द्विध्रुवीय हो जाएगा।

महिला मतदाता भी अलग चुनावी ताकत

2026 की मतदाता सूची में कासगंज विधानसभा क्षेत्र में 1,24,698 महिला मतदाता दर्ज हैं। इतनी बड़ी संख्या को केवल पारिवारिक या जातीय मतदान पैटर्न से जोड़कर देखना पर्याप्त नहीं होगा।

राशन, आवास, स्वास्थ्य, कानून-व्यवस्था, महंगाई, शिक्षा, रोजगार और महिलाओं से जुड़ी सरकारी योजनाएं मतदान व्यवहार में स्वतंत्र भूमिका निभा सकती हैं। 2027 में भाजपा और विपक्ष दोनों के लिए महिला मतदाता महत्वपूर्ण चुनावी वर्ग होंगे।

2027 में किन वोटों पर सबसे ज्यादा नजर?

कासगंज में चुनावी स्थिति को देखें तो तीन सामाजिक लड़ाइयां सबसे महत्वपूर्ण दिखाई देती हैं।

पहली लड़ाई लोधी वोट की है। भाजपा की मौजूदा मजबूत स्थिति इस वोट के बड़े हिस्से के समर्थन पर टिकी है।

दूसरी लड़ाई शाक्य और अन्य गैर-यादव OBC वोट की है। 2024 में सपा के शाक्य उम्मीदवार की सफलता के बाद यह सामाजिक क्षेत्र दोनों दलों के लिए और महत्वपूर्ण हो गया है।

तीसरी लड़ाई SC वोट की होगी। बसपा के कमजोर प्रदर्शन के बाद इस सामाजिक आधार पर भाजपा और सपा दोनों की नजर है।

इनके साथ मुस्लिम-यादव वोट का एकीकरण और ब्राह्मण-ठाकुर-वैश्य मतदाताओं की दिशा अंतिम परिणाम तय करने में भूमिका निभाएगी।

कासगंज विधानसभा चुनाव 2027 का जातीय गणित क्या संकेत देता है?

कासगंज विधानसभा की मौजूदा चुनावी तस्वीर भाजपा के पक्ष में मजबूत दिखाई देती है क्योंकि पार्टी ने 2017 और 2022 दोनों विधानसभा चुनाव बड़े अंतर से जीते हैं। 2024 लोकसभा चुनाव में भी भाजपा कासगंज विधानसभा खंड में 23,440 वोट से आगे रही।

लेकिन 2019 के मुकाबले 2024 में भाजपा की लोकसभा बढ़त लगभग आधी हो जाना समाजवादी पार्टी के लिए अवसर का संकेत है। दूसरी ओर 2026 SIR के बाद मतदाताओं की संख्या 3.70 लाख से घटकर करीब 2.99 लाख रह गई है। इससे पुराने बूथ और जाति-वार समीकरणों को नए सिरे से समझना जरूरी होगा।

Kasganj Assembly Caste Equations में लोधी समुदाय भाजपा की सबसे मजबूत सामाजिक धुरी बना हुआ है। अनुसूचित जाति, मुस्लिम, यादव, शाक्य-कुशवाह, ब्राह्मण, ठाकुर और वैश्य मतदाता उसके बाद चुनावी संतुलन तैयार करते हैं। भाजपा के सामने चुनौती अपने गैर-यादव OBC और दलित समर्थन को बनाए रखने की है, जबकि सपा को MY समीकरण से आगे बढ़कर शाक्य, दूसरे पिछड़ों और SC मतदाताओं में मजबूत समर्थन बनाना होगा।

2027 में टिकट चयन भी जातीय समीकरण जितना महत्वपूर्ण होगा। यदि भाजपा मौजूदा लोधी आधार को एकजुट रखते हुए अन्य पिछड़े और सवर्ण मतदाताओं में पकड़ बनाए रखती है तो लगातार तीसरी जीत की स्थिति मजबूत हो सकती है। यदि सपा 2024 वाला गैर-यादव OBC विस्तार विधानसभा स्तर पर दोहरा पाती है और दलित वोट का हिस्सा जोड़ती है तो मुकाबला 2022 के 46 हजार वोट के अंतर से काफी करीब आ सकता है।

यानी कासगंज विधानसभा चुनाव 2027 की लड़ाई केवल लोधी बनाम यादव या भाजपा बनाम सपा नहीं होगी। असली फैसला लोधी आधार की एकजुटता, शाक्य और दूसरे गैर-यादव OBC का रुख, दलित वोट का बंटवारा, मुस्लिम-यादव लामबंदी, सवर्ण समर्थन और 2026 की नई मतदाता सूची के बूथवार बदलाव मिलकर करेंगे।

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