August 9, 2026

महात्मा गांधी, बेगम भोपाल के बड़े प्रशंसक थे, यंग इंडिया में कई आर्टिकल लिखे - भोपाल का इतिहास

महात्मा गांधी ने अपने समाचार पत्र 'यंग इंडिया' (Young India) में भोपाल की महिला शासक नवाब सुल्तान जहाँ बेगम (जिन्हें 'बेगम भोपाल' के नाम से जाना जाता था) के बारे में कई बार लिखा था। गांधीजी द्वारा 'यंग इंडिया' में बेगम भोपाल का उल्लेख मुख्य रूप से 1920 से 1929 के दौरान किया गया। इस संदर्भ में सबसे प्रमुख और विस्तृत लेख 1929 के 'यंग इंडिया' के अंकों में देखने को मिलता है, जब नवाब सुल्तान जहाँ बेगम का निधन हुआ था, तथा इससे पूर्व 1920-21 के स्वदेशी और खिलाफत आंदोलन के दौरान भी उनका उल्लेख आया था। 

गांधीजी का यह लेख (1929) बेगम भोपाल के तीन प्रमुख पहलुओं पर केंद्रित था:

गांधीजी इस बात से अत्यंत प्रभावित थे कि एक पारंपरिक 'पर्दानशीं' (पर्दे में रहने वाली) महिला होने के बावजूद सुल्तान जहाँ बेगम का दृष्टिकोण अत्यंत आधुनिक, प्रगतिशील और निडर था। उन्होंने लिखा कि बेगम साहिबा ने पर्दे को कभी अपनी प्रशासनिक क्षमता या जनसेवा के मार्ग में बाधा नहीं बनने दिया।

स्त्री-शिक्षा और समाज सुधार के प्रति समर्पण:

गांधीजी ने उनके द्वारा महिलाओं की शिक्षा (विशेषकर बालिका विद्यालयों, मेडिकल कॉलेजों और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के महिला कॉलेज) के लिए किए गए वित्तीय व संस्थागत प्रयासों की भूरि-भूरि प्रशंसा की।

धार्मिक सहिष्णुता, सादगी और राष्ट्रीय एकता:

गांधीजी ने इस बात को रेखांकित किया कि भोपाल रियासत में बेगम ने हिंदू और मुस्लिम प्रजा के बीच कभी भेदभाव नहीं किया। उनका जीवन अत्यधिक सादा, ईश्वर-भीरु (गॉड-फियरिंग) और जनकल्याण को समर्पित था।

सुल्तान जहाँ बेगम के निधन पर गांधीजी की श्रद्धांजलि ('यंग इंडिया', 1929)

जब 1929 में बेगम सुल्तान जहाँ का निधन हुआ, तो महात्मा गांधी ने 'यंग इंडिया' में उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए एक विशेष टिप्पणी लिखी। गांधीजी ने लिखा:

"भोपाल की पूर्व बेगम (सुल्तान जहाँ बेगम) के निधन से भारत ने एक अत्यंत उदार, धर्मपरायण और दूरदर्शी शासिका को खो दिया है। वे एक ऐसी महिला थीं जिन्होंने अपने शासनकाल में प्रजा की सेवा को ही अपना सर्वोपरि धर्म माना। पर्दा प्रथा का पालन करते हुए भी उन्होंने शिक्षा और समाज सुधार के क्षेत्र में जो कार्य किए, वे आधुनिक युग की किसी भी महिला के लिए प्रेरणास्रोत हैं।"

खादी, स्वदेशी और सादगी पर गांधीजी के विचार

गांधीजी ने अपने लेखों में इस बात का भी जिक्र किया कि बेगम साहिबा भारतीय वस्त्रों और सादगी की समर्थक थीं। यद्यपि वे एक समृद्ध रियासत की रानी थीं, लेकिन उनका निजी जीवन बहुत सादा था।

गांधीजी ने उल्लेख किया कि जब राष्ट्रीय स्तर पर स्वदेशी और बुनियादी शिक्षा की बात चल रही थी, तब बेगम भोपाल ने अपनी रियासत में स्थानीय हस्तशिल्प, कुटीर उद्योगों और बालिकाओं के लिए व्यावहारिक शिक्षा (Vocational/Practical Education) को बढ़ावा दिया।

खिलाफत और हिंदू-मुस्लिम एकता के संदर्भ में (1920-1921)

1920 के दशक की शुरुआत में जब गांधीजी और अली बंधुओं (मौलाना मोहम्मद अली और शौकत अली) ने असहयोग और खिलाफत आंदोलन की शुरुआत की थी, तब भोपाल रियासत का रुख रचनात्मक था। मौलाना मोहम्मद अली और शौकत अली की मां (जिन्हें 'बी अम्मा' कहा जाता था) के बेगम भोपाल से गहरे संबंध थे।गांधीजी ने 'यंग इंडिया' में लिखा कि बेगम साहिबा ने राजनीतिक रूप से ब्रिटिश शासन की सीमाओं में रहते हुए भी राष्ट्रीय आंदोलनों के नैतिक और शैक्षणिक पहलुओं को हमेशा समर्थन दिया।

'गांधी साहित्य' (Collected Works) में उल्लेखित ऐतिहासिक संदर्भ

'द कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी' (Vol. 40 एवं Vol. 41) में गांधीजी और नवाब सुल्तान जहाँ बेगम के बीच हुए पत्राचार तथा उनके बयानों के संदर्भ मिलते हैं:

महिला मताधिकार और शिक्षा: जब 1920 के दशक में भारत में महिलाओं के अधिकारों और शिक्षा पर बहस छिड़ी, तो गांधीजी ने बेगम भोपाल का उदाहरण देते हुए लिखा कि भारत की महिलाएँ शासन चलाने और बड़े शैक्षणिक संस्थानों का नेतृत्व करने में पूरी तरह सक्षम हैं। (ध्यान रहे कि बेगम सुल्तान जहाँ 1920 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की पहली महिला चांसलर बनी थीं)।

गांधीजी ने देशी रियासतों (Princely States) के प्रशासकों के सामने भोपाल का उदाहरण रखा कि किस तरह एक मुस्लिम शासक अपनी बहुसंख्यक हिंदू प्रजा के साथ न्यायप्रिय और सौहार्दपूर्ण व्यवहार कर सकता है।

शोध एवं अनुसंधान: उपदेश अवस्थी (विधि सलाहकार एवं पत्रकार)