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पाकिस्तान का वो 'दिल्ली वाला' कव्वाल, जिसने कन्हैया को कुछ यूं पुकारा कि सिमट गई सरहदें
यह शख्स उस ऐतिहासिक कव्वाल बच्चा घराने के उत्तराधिकारी माने जाते हैं, जिसकी परंपरा दिल्ली के सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया और उनके प्रिय शिष्य अमीर खुसरो तक जाती है।
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‘कन्हैया याद है कुछ भी हमारी’, जब एक मुस्लिम कव्वाल ने कृष्ण को पुकारा (प्रतीकात्मक तस्वीर)
याद कीजिए 1947 का हिंदोस्तान। हमें आजादी तो मिली, लेकिन बंटवारे की कीमत पर। एक सरहद खींच दी गई और कहा गया कि सरहद के इस पार भारत है और उस पार पाकिस्तान। आर-पार की ये खाई दिनोंदिन बढ़ती गई। सरहद और ऊंची होती गई। ना तो इधर की बात उधर सुनी जाती और ना ही उधर से कोई सदा आती।
इसी बीच करीब 26 साल पहले पाकिस्तान के एक मुस्लिम कव्वाल ने हिंदुओं के आराध्य भगवान कृष्ण को यूं पुकारा कि सुनने वाले सुनते रह गए। शायद साल था 2000। कराची में कहीं एक कव्वाली का मंच सजा था। मंच पर पहुंचा नाटे कद का सांवला सा एक मुस्लिम कव्वाल। आंखों में सुरमा और मुंह में पान था।
कव्वाल ने माइक थामा और अपनी जादुई आवाज में कव्वाली का मिसरा उठाया- कन्हैया... याद है कुछ भी हमारी। पूरी महफिल में अजीब सी खामोशी छा गई। हारमोनियम की धीमी तान, तबले की थाप और अपनी अलहदा आवाज में जब उस कव्वाल ने सुर छेड़ा तो लोगों ने बेशुमार तालियों से उसका इस्तकबाल किया। कुछ लोगों को कन्हैया के नाम से दिक्कत तो हुई, लेकिन वो भी कव्वाल की आवाज में ऐसा डूबे कि काफी देर तक उबर नहीं पाए।

कन्हैया..याद है कुछ भी हमारी
इस कव्वाल को दुनिया आज फरीद अयाज के नाम से जानती है। फरीद अयाज किसी सामान्य कव्वाल परिवार से नहीं आते। वे उस ऐतिहासिक कव्वाल बच्चा घराने के उत्तराधिकारी माने जाते हैं, जिसकी परंपरा दिल्ली के सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया और उनके प्रिय शिष्य अमीर खुसरो तक जाती है। 1947 के विभाजन के बाद उनका परिवार पाकिस्तान चला गया, लेकिन उनके सुरों से आज भी दिल्ली की उसी मिट्टी की खुशबू आती है। फरीद अयाज खुद कबूलते भी हैं कि हिंदुस्तान वाले मुझे पाकिस्तान का मानते हैं और पाकिस्तान के लोग मुझे दिल्ली वाला कहते हैं।
जब भी फरीद अयाज कन्हैया... याद है कुछ भी हमारी गाते तो शुरुआत में लोग समझते कि ये कृष्ण भजन गा रहे हैं। लेकिन जैसे-जैसे कव्वाली आगे बढ़ती है, एहसास होता है कि यह केवल कृष्ण को पुकारने वाला गीत नहीं है। यह उस हर प्रेम की आवाज है, जो बिछड़ गया है। यही वजह है कि इसे सुनते हुए कोई वृंदावन की गोपियों को याद करता है, कोई सूफी संतों को और कोई अपने जीवन के उस शख्स को, जो अब साथ नहीं है।
यही जादू किसी भी महान रचना की असल पहचान होती है कि वह हर किसी के भीतर अपना अलग अर्थ खोज लेती है। फरीद अयाज की इस कव्वाली ने सरहद के दोनों पार लोगों के दिल जीते। फरीद अयाज को इसके हर मिसरे पर बेइंतहा प्यार मिलता। यहां आपको जानकर हैरानी होगी कि जिस कव्वाली ने फरीद अयाज को सरहद के दोनों पार मशहूरियत मुहैया कराई, वो उनका लिखा नहीं है। इस बात को फरीद अयाज ने कभी छिपाया भी नहीं।

फरीद अयाज (फोटो सोर्स- YouTube)
मुस्लिम नवाब ने रचा था ये गीत
उपलब्ध दस्तावेजों के मुताबिक यह कव्वाली मूल रूप से लिखी थी हैदराबाद के नवाब सादिक जंग बहादुर 'हिल्म' ने। वो इस्लाम को मानने वाले थे। बावजूद इसके उनकी इस रचना में कृष्ण के प्रति वही विरह दिखाई देता है, जो सूरदास या मीराबाई की लिखावट में मिलता है। हिंदुस्तानी संस्कृति की सबसे बड़ी खूबी भी यही रही है कि यहां भाषा अलग हो सकती है, धर्म अलग हो सकता है, लेकिन प्रेम का केंद्र एक ही रहता है।
जैसे रसखान ने कृष्ण के चरणों में अपना जीवन अर्पित कर दिया था। जैसे रहीम ने कृष्ण पर दोहे लिखे। वैसे ही हिल्म ने कृष्ण को पुकारते हुए यह अमर रचना लिखी। अगर ध्यान से देखें तो इस रचना में कृष्ण का धार्मिक स्वरूप बहुत कम दिखाई देता है। वे यहां प्रेमी हैं, मित्र हैं, बिछड़ा हुआ अपना हैं। यही कारण है कि यह सिर्फ मंदिरों में नहीं गाई गई। दरगाहों पर भी इसे खूब दोहराया गया।
कहूं क्या तेरे भूलने के मैं वारी
कन्हैया याद है कुछ भी हमारी,
बमना की मिनती मैं कर-कर पूछी
पल-पल की खबर तिहारी,
पय्यां पड़ी महादेव के जा कर
टोना भी कर-कर हारी,
कन्हैया याद है कुछ भी हमारी
खाक परे लोगो उस ब्याहने पर
अच्छा था रहती कुंवारी,
माइके में रहती थी मैं 'हिल्म' सुख से
फिरती थी क्यों मारी-मारी,
कन्हैया याद है कुछ भी हमारी..
भारत में 15वीं और 16वीं शताब्दी के दौरान भक्ति आंदोलन और सूफी आंदोलन लगभग समानांतर चले। दोनों ने एक ही बात कही कि ईश्वर तक पहुंचने का एकमात्र रास्ता प्रेम है। भक्ति आंदोलन वालों ने कहा कि राम या कृष्ण को प्रेम करो। सूफियों ने कहा कि ऊपरवाले को अपना माशूक समझकर प्रेम करो। दोनों की भाषा अलग थी, शब्द अलग थे, लेकिन मंजिल एक थी।
इस्लामिक स्कॉलर अन्नेमेरी शिमेल अपनी किताब मिस्टिकल डाइमेंशन्स ऑफ इस्लाम में लिखती हैं कि सूफी परंपरा में प्रेमी और परमात्मा के बीच का संबंध सांसारिक प्रेम की भाषा में व्यक्त किया जाता है। सूफियों के लिए प्रियतम का कोई निश्चित नाम नहीं होता। वह कभी अल्लाह होता है, कभी माशूक और भारतीय संदर्भ में वही भाव कृष्ण के रूप में भी अभिव्यक्त हो सकता है।
फरीद अयाज की आवाज ने किया अमर
नवाब सादिक जंग बहादुर 'हिल्म' की कलम से निकली ये रचना अस्तित्व में आने के सैकड़ों साल बाद भी अगर जिंदा है तो इसकी एक बड़ी वजह फरीद अयाज भी हैं। यह रचना पुरानी थी, लेकिन इसे नई पहचान मिली पाकिस्तान के इसी मशहूर कव्वाल के जरिए, जिसका भरपूर साथ दिया उनके साथी अबू मुहम्मद ने।
साल 2015 में बेंगलुरु में कबीर की याद में मंच सजा था। मंच पर तमाम नगमानिगारों के साथ सरहद पार से फरीद अयाज और अबू मुहम्मद भी मौजूद थे। कबीर ने जिस आध्यात्मिकता को पहचान की दीवारों से बाहर खोजा था, उसी माहौल में पाकिस्तान से आए इन दोनों कव्वालों ने कृष्ण को पुकारा।
एक पाकिस्तानी कलाकार कृष्ण को पुकार रहा था और भारत में बैठे लोग उस पुकार में अपनी स्मृतियां खोज रहे थे। शायद यही संगीत की सबसे बड़ी शक्ति है। वह पासपोर्ट नहीं देखता। वह धर्म नहीं पूछता। वह सीधे सुनने वाले की संवेदना तक पहुंच जाता है।
इसी कार्यक्रम का वीडियो बाद में यूट्यूब पर आया और धीरे-धीरे दुनिया भर के लोगों तक पहुंच गया। सरहद पार बैठे इन दोनों कलाकारों के कारण ही हिंदुस्तान के लोगों के बीच यह रचना पहुंची और हमेशा के लिए उनके दिल में उतर गई।
यहां कहने में शायद ही कोई गुरेज करे कि राजनीति ने जिन सरहदों को कठोर बनाया, संगीत, गंगा जमुनी तहजीब और फरीद अयाज ने उन्हें सलीके से अप्रासंगिक बना दिया।