August 8, 2026

भोपाल के पहले कलेक्टर ने सरकारी आवास पर कब्जा कर लिया था, हाई कोर्ट में हुआ खुलासा

भोपाल समाचार, 7 अगस्त 2026: बहुत कम लोग जानते हैं कि भोपाल का पहला कलेक्टर कौन था, और भोपाल में पहले भ्रष्टाचार क्या हुआ था। लेकिन हाई कोर्ट में हाल ही में हुए एक डिसीजन से यह पता चलता है कि, भोपाल के पहले कलेक्टर ने, उनको आवंटित हुए सरकारी आवास पर कब्जा कर लिया था, और आज भी उनके परिवार जनों का कब्जा है। मतलब यह मामला स्वतंत्रता के बाद भोपाल में भ्रष्टाचार का पहला मामला था। 

भोपाल के पहले कलेक्टर, कलेक्टर का बंगला और बंगले का विवाद

सन 1956 में जब भोपाल को तहसील से जिला घोषित किया गया तब पहली बार यहां पर कलेक्टर के पद पर बदरे आलम को पदस्थ किया गया। हाई कोर्ट में "सरवत जहां बेगम बनाम मध्य प्रदेश राज्य व अन्य" मामले में सरकारी वकील द्वारा न्यायालय को बताया गया कि, कलेक्टर बदरे आलम को एक बंगला केवल रहने के लिए एक लाइसेंस (आवासीय अनुमति) के तौर पर दिया गया था। आज इस बंगले को "कैसर बंगला" के नाम से जाना जाता है। यह बंगला इदगाह हिल्स, भोपाल स्थित सर्वे नंबर 2490 (क्षेत्रफल 24,960 वर्ग फुट) पर स्थित है। प्रशासनिक नियमों के अनुसार यदि कोई व्यक्ति कलेक्टर पद से हट जाता है तो उसको प्राप्त सरकारी बंगला भी खाली करना होता है लेकिन बदरे आलम ने ऐसा नहीं किया और केसर बंगला पर अपना कब्जा बनाए रखा। 

मलिकाना हक के लिए हाई कोर्ट में याचिका

मूल वादी, श्रीमती सरवत जहां बेगम (जिनका अब निधन हो चुका है), ने वर्ष 1989 में लोक निर्माण विभाग (PWD) और मध्य प्रदेश शासन के विरुद्ध एक दीवानी मुकदमा (Civil Suit No. 72/A/89) दायर किया था। उनका दावा था कि वह इस संपत्ति की स्वामिनी हैं और उनके पास इसका कब्जा है। सरवत जहां बेगम ने अपनी कहानी की शुरुआत 1971 से की। उनके वकीलों, जिनमें श्री अंकित सक्सेना प्रमुख थे, ने न्यायालय में तर्क प्रस्तुत किए कि यह संपत्ति उन्हें उनकी सास, श्रीमती नजमा बेगम (बदरे आलम की पत्नी) से 1971 में एक मौखिक हिबा (दान) के माध्यम से प्राप्त हुई थी। साक्ष्यों के दौरान यह तर्क दिया गया कि बदरे आलम, मेहर परवर सुल्तान (उर्फ कोकोबिया) के पुत्र थे। कोकोबिया भोपाल के तत्कालीन शासक नवाब हमीदुल्ला खान की पत्नी शाहबानो मेमूना सुल्तान की बड़ी बहन थीं। 1931 के एक अनुदान पत्र (Ex.P-29) का हवाला दिया, जिसके अनुसार नवाब ने यह बंगला और जमीन कोकोबिया को दी थी। अपील के दौरान, निका़हनामा (दिनांक 22.05.1958) और 1938 का एक उर्दू दस्तावेज भी पेश करने की कोशिश की गई ताकि वंशावली और हक को पुख्ता किया जा सके। इसके अलावा भोपाल राज्य और भारत सरकार के बीच हुए विलय समझौते (Merger Agreement) का उल्लेख करते हुए कहा कि यह बंगला नवाब की निजी संपत्ति की सूची में शामिल था, इसलिए राज्य का इस पर कोई अधिकार नहीं है।

हाई कोर्ट में सरकार की तरफ से खुलासा

राज्य सरकार की ओर से शासकीय अधिवक्ता आदित्य चौबे और पैनल वकील के.के. गौतम ने इन दावों का कड़ा विरोध किया। तर्क दिया कि मालिकाना हक का स्रोत और वंशावली दोनों ही रहस्यमयी हैं। वादी ने मूल वादपत्र (Plaint) में कहीं भी यह स्पष्ट नहीं किया था कि बदरे आलम और नवाब परिवार के बीच क्या संबंध था। राज्य ने दावा किया कि बदरे आलम भोपाल राज्य के समय एक जिला कलेक्टर थे और उन्हें यह बंगला केवल रहने के लिए एक लाइसेंस (आवासीय अनुमति) के तौर पर दिया गया था, न कि स्वामित्व के रूप में।

1931 के जिस अनुदान पत्र (Ex.P-29) पर भरोसा किया गया, वह एक सादे कागज पर था और उस पर न तो नवाब की मुहर थी और न ही किसी सक्षम अधिकारी के हस्ताक्षर स्पष्ट थे। (इसका मतलब हुआ कि प्रॉपर्टी की ओनरशिप के लिए एक फेक डॉक्यूमेंट क्रिएट किया गया था?)

बदरे आलम के पिता कौन थे?

न्यायमूर्ति विवेक जैन ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद पाया कि वादी समय-समय पर अपने बयानों को बदलती रही है। न्यायालय ने गौर किया कि वादी ने अपील के दौरान दो अलग-अलग सारांश (Synopsis) पेश किए। पहले सारांश में बदरे आलम को मेमूना सुल्तान (नवाब की पत्नी) का पुत्र बताया गया, जबकि बाद में उसे बदल कर मेहर परवर सुल्तान (नवाब की साली) का पुत्र बता दिया गया। (मतलब कन्फ्यूजन की स्थिति बना दी, कोर्ट में यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि भोपाल के पहले कलेक्टर बदरे आलम के पिता कौन थे?)

कोर्ट की कार्यवाही के दौरान भी डॉक्यूमेंटेशन में गड़बड़ी

न्यायाधीश ने एक विशेष टिप्पणी में कहा कि सुनवाई के दौरान डिजिटल फाइल से पुराने सारांश (Synopsis) को हटाकर नया अपलोड करना "दुर्भावनापूर्ण इरादे" को दर्शाता है और यह न्याय प्रशासन में बाधा डालने का प्रयास है। (मतलब कोर्ट की कार्यवाही के दौरान भी डॉक्यूमेंटेशन में गड़बड़ी की गई। भोपाल के नवाब से वंशावली साबित करने के लिए पहले एक डॉक्यूमेंट लगाया गया फिर उसको हटाकर दूसरा लगाया गया। इसके लिए न्यायालय की अनुमति नहीं ली गई और ना ही न्यायालय को बताया गया। मतलब चोरी छुपे किया गया।)

हालांकि, उन्होंने वकील के विरुद्ध कोई कठोर कार्रवाई न करते हुए केवल भविष्य के लिए चेतावनी दी। न्यायालय ने दीवानी प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 96 के तहत अपील पर विचार करते हुए आदेश 41 नियम 27 (अतिरिक्त दस्तावेज) और आदेश 6 नियम 17 (वादपत्र संशोधन) के आवेदनों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जब बुनियादी वंशावली ही स्पष्ट नहीं है, तो नए दस्तावेजों से उसे नहीं सुधारा जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि 1931 का दस्तावेज सही मान भी लिया जाए, तो वह भोपाल के कलेक्टर को केवल रहने का अधिकार (Licence) देता है, मालिकाना हक नहीं।

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इस प्रकार हाईकोर्ट में स्पष्ट हो गया है कि, केसर बंगला भोपाल के कलेक्टर के आवास के लिए आवंटित किया गया था। बदरे आलम और उनके परिवार को रहने के लिए आवंटित नहीं किया गया था, और भोपाल के नवाब से तो इसका कोई कनेक्शन ही नहीं है। इसका मतलब हुआ कि केसर बंगला सरकारी संपत्ति है और सरकार के पास होना चाहिए। अब देखना यह है कि भोपाल के कलेक्टर, अपने बंगले को वापस किस प्रकार से ले पाते हैं।

Cause Title: Sarwat Jahan Begum v. The State of Madhya Pradesh

न्यायाधीश: माननीय न्यायमूर्ति विवेक जैन।

वकील: अंकित सक्सेना (अपीलार्थी के लिए), आदित्य चौबे (राज्य के लिए)। 

रिपोर्ट: उपदेश अवस्थी (विधि सलाहकार एवं पत्रकार)।