चीन और रूस के साथ बढ़ते तनाव को देखते हुए अमेरिका अपनी परमाणु नीति में बदलाव की तैयारी कर रहा है। NBC न्यूज़ के अनुसार, पेंटागन एक ऐसी रणनीति बना रहा है जिसमें बड़े परमाणु हथियारों के साथ-साथ छोटे परमाणु बमों - जिन्हें 'टैक्टिकल न्यूक्लियर वेपन्स' (रणनीतिक परमाणु हथियार) कहा जाता है - के इस्तेमाल का विकल्प भी शामिल होगा। ज़रूरत पड़ने पर इन्हें दुश्मन के सैन्य ठिकानों या सीमित युद्ध की स्थितियों में इस्तेमाल किया जा सकता है। पेंटागन के नीति प्रमुख एलब्रिज कोल्बी इस पहल का नेतृत्व कर रहे हैं। उनका मानना है कि राष्ट्रपति के सामने अभी दो ही विकल्प हैं: या तो बड़ा परमाणु हमला करें या फिर कोई जवाबी कार्रवाई न करें। नई रणनीति एक बीच का रास्ता निकालने की कोशिश कर रही है, जिससे ज़रूरत पड़ने पर दुश्मन को रोकने के लिए छोटे परमाणु हथियारों का इस्तेमाल किया जा सके।
टैक्टिकल न्यूक्लियर वेपन्स क्या हैं?
टैक्टिकल न्यूक्लियर वेपन्स कम क्षमता वाले परमाणु हथियार होते हैं। पूरे शहरों को नष्ट करने के लिए बनाए गए रणनीतिक हथियारों के विपरीत, इन हथियारों का इस्तेमाल युद्ध के मैदान में खास और सीमित लक्ष्यों - जैसे दुश्मन के सैन्य अड्डों, हवाई अड्डों, मिसाइल लॉन्च साइटों, टैंकों के जत्थों या सैनिकों की तैनाती - के खिलाफ करने के लिए किया जाता है।
अमेरिका अपनी नीति क्यों बदल रहा है?
अमेरिका का मानना है कि चीन या रूस के साथ भविष्य में होने वाले किसी संघर्ष में, सिर्फ़ बड़े परमाणु हमले का विकल्प काफी नहीं होगा। इसलिए, वह अपनी सैन्य योजना में छोटे परमाणु बमों को भी शामिल करना चाहता है। अमेरिका का मानना है कि इससे विरोधियों पर दबाव बनेगा और ज़रूरत पड़ने पर नपी-तुली, सीमित जवाबी कार्रवाई करना आसान होगा। हालाँकि, विशेषज्ञों का कहना है कि अगर छोटे परमाणु बमों के इस्तेमाल का विकल्प उपलब्ध हो जाता है, तो उनके इस्तेमाल की संभावना बढ़ जाएगी, जिससे पारंपरिक संघर्ष तेज़ी से परमाणु युद्ध में बदल सकता है।
रूस के पास सबसे बड़ा परमाणु जखीरा है
दुनिया में सबसे ज़्यादा परमाणु हथियार रूस के पास हैं। SIPRI और FAS के अनुसार, उसके पास 5,459 परमाणु हथियार हैं, जबकि अमेरिका 5,177 हथियारों के साथ दूसरे स्थान पर है। इन दोनों देशों के पास दुनिया के कुल परमाणु हथियारों का लगभग 88% हिस्सा है। वहीं, चीन के पास लगभग 600 परमाणु हथियार हैं; हालाँकि कुल संख्या के मामले में वह काफी पीछे है, लेकिन वह सबसे तेज़ी से अपने परमाणु जखीरे का विस्तार कर रहा है।
1945 के बाद से परमाणु हथियारों का इस्तेमाल क्यों नहीं किया गया है?
अगस्त 1945 में, दूसरे विश्व युद्ध के दौरान, अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा और नागासाकी शहरों पर परमाणु बम गिराए थे। तब दुनिया ने परमाणु हथियारों की विनाशकारी ताकत देखी थी। तब से, बड़ी परमाणु ताकतों ने इनका इस्तेमाल असल युद्ध में करने के बजाय 'परमाणु प्रतिरोध' (nuclear deterrence) के साधन के तौर पर किया है।
परमाणु प्रतिरोध क्या है?
इस रणनीति का मतलब है कि अगर कोई देश परमाणु हमला करता है, तो उसे भी उतने ही विनाशकारी परमाणु जवाबी हमले का सामना करना पड़ेगा; दूसरे शब्दों में, दोनों पक्षों को ऐसा नुकसान होगा जिसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। इसी डर ने अमेरिका और रूस समेत परमाणु ताकतों को 1945 के बाद से युद्ध में परमाणु हथियारों का इस्तेमाल करने से रोका है।