Sarangarh Bilaigarh News: छत्तीसगढ़ के सारंगढ़-बिलाईगढ़ के दो मजदूरों की आतंकियों ने जम्मू-कश्मीर में गोली मारकर हत्या कर दी। दोनों गरीब थे और अपनी दो जून की रोटी के लिए कुलगाम में ईंट भट्टे पर काम करते थे। इनमें से भूपेंद्र भैना (28) इस बार अपनी पत्नी को लेकर भी गया था। जिससे मजदूरी कुछ दोगुनी हो जाए।
गांव क्यों नहीं लाए गए शव ?
आतंकियों ने गरीब मजदूरों को मारा, लेकिन शासन-प्रशासन ने उनके शवों को छत्तीसगढ़ लाने के प्रयास क्यों नहीं किए? आखिर दोनों का अंतिम संस्कार कुलगांव में क्यों कर दिया गया?
यह कुछ सवाल हर छत्तीसगढ़िया के मन में उठ रहे हैं।
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शव नहीं आने से लोगों में गुस्सा
सारंगढ़-बिलाईगढ़ के लोगों और पर मजदूरों के परिजनों में इसे लेकर आक्रोश भी है। क्या सरकार इतना भी नहीं कर सकती थी। दोनों युवाओं को आतंकियों ने तो मारा ही, साथ ही उनके शव गांव तक नहीं पहुंचाने से उनके आंसुओं को अधूरे में ही रोक दिया। जिसकी कसक हमेशा परिजनों और गांववालों को सहलाती रहेगी।
भूपेंद्र अपने तीन साल के बेटे को गांव छुईया में ही बहन के पास छोड़कर काम पर गया था। उसे अब तक नहीं पता है कि उसका पिता अब इस दुनिया में नहीं है। इसी तरह भूपेंद्र की बहन का कहना है कि भैया बोलकर गया था कि इस बार रक्षाबंधन पर जरूर आकर राखी बंधवाएगा। रक्षाबंधन गांव में ही मनाएगा।
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एक एकड़ खेत 30 हजार में गिरवी रखा
गरीबी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि भूपेंद्र के पिता दशरथ ने अपना एक एकड़ का खेत सिर्फ 30 हजार रुपए में गिरवी रख दिया है। जिस पैसे से भूपेंद्र और उसके पिता दशरथ छत्तीसगढ़ से बाहर मजदूरी के लिए पहुंचे। जबकि गांव में उस खेत की कीमत करीब 10 लाख रुपए बताई जा रही है। भूपेंद्र के गांव के लोगों का कहना है कि यहां रोजगार होता तो वह जम्मू-कश्मीर क्यों जाता ?
भूपेंद्र के छुईया गांव में शोक
फिलहाल, भूपेंद्र के छुईया गांव में शोक छाया हुआ है। घर में भूपेंद्र के तीन साल के बेटे के लिए खाने-पीने के इंतजाम के चलते घर में रूखा-सूखा कुछ बन रहा है। बच्चा भी प्रशासन द्वारा लोगों की भीड़ को रोकने के लिए बांधी गई रस्सी से मन बहला रहा है। वह रस्सी उसके लिए खेल बन गई है। पहचान और बाहर से आने वाले सरकारी अमले की नजर जब उस मामूस पर पड़ती है तो मन उदास हो जाता है।
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रोजगार की तलाश में अधिकतर लोग गांव से बाहर
ग्रामीणों के मुताबिक, परिवार की बेहद कमजोर स्थिति के कारण भूपेंद्र और उसकी पत्नी कचरा बाई रोजगार के लिए कुलगाव गए थे, जबकि उसका पिता दशरथ, मां नागेश्वरी और छोटा भाई अनुराग हिमाचल प्रदेश में मजदूरी कर रहे हैं। भूपेंद्र की बहन के अनुसार, गांव में सिर्फ उसकी दादी, और तीन साल का भतीजा मानस रह गए हैं। बताते हैं गांव में अधिकतर परिवारों के सदस्य रोजगार की तलाश में गांव से पलायन कर गए हैं।
भूपेंद्र की बहन ने बताया कि करीब एक महीने पहले भाई से मोबाइल पर बात हुई थी। उसने कहा था कि इस बार राखी पर जरूर घर आऊंगा। लेकिन राखी से पहले ही कुलगाम से भाई की मौत की खबर आ गई।
एक हजार ईंट बनाने पर मिलते थे 980 रुपए
भूपेंद्र के दोस्त करण प्रसाद कुलदीप ने बताया कि वे दोनों साथ पढ़े थे। छेरछेरा त्योहार के बाद भूपेन्द्र ने कहा था कि दोनों जम्मू जाकर ईंट-भट्टे पर मजदूरी करेंगे। मैं भी भूपेन्द्र के साथ कुछ दिनों के लिए काम करने वहां गया था।
एक हजार ईंट बनाने पर हमें 980 रुपए मिलते थे। रहने और खाने का खर्च मजदूरों को खुद उठाना पड़ता था। बारिश शुरू होते ही मैं गांव लौट आया, लेकिन भूपेंद्र और उसकी पत्नी वहीं रुक गए।
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पिता बोला- हमने शव गांव लाने की मांग की थी
हिमाचल प्रदेश में मजदूरी कर रहे भूपेन्द्र के पिता दशरथ ने बताया कि हमारी आर्थिक स्थिति कई साल से खराब है। जिसके चलते 2003 से मजदूरी के लिए बाहर जा रहे हैं।
इस साल मजदूरी के लिए निकलने से पहले एक एकड़ खेत 30 हजार रुपए में गिरवी रखना पड़ा। पहली बार बेटा और बहू भी जम्मू कमाने गए थे। हमने प्रशासन से बेटे का शव गांव लाने की मांग की थी, लेकिन वहां ही अंतिम संस्कार कर दिया गया।
दशरथ के मुताबिक, परिवार और गांव के लोगों के बीच हम अपने बेटे का अंतिम संस्कार करना चाहते थे। लेकिन हम जम्मू से बहुत दूर हैं। अफसरों ने बताया कि वहां कर्फ्यू लगा है। इसलिए हम जम्मू भी नहीं जा पाए।
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दादी आज भी कहती रहीं- सब लोग काम से आ गए
भूपेंद्र की बुजुर्ग दादी की याददाश्त कमजोर है। उन्हें कुछ समझ नहीं आता है। वह बार-बार यही कहती है कि बेटा, बहू और पोता मजदूरी करके वापस आ जाएंगे। उन्हें यह नहीं बताया गया कि परिवार का एक सदस्य अब इस दुनिया में नहीं रहा।
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