जयपुर की विशेष पॉक्सो कोर्ट ने मध्य प्रदेश पुलिस के पूर्व एआईजी अनिल मिश्रा को दुष्कर्म मामले में आजीवन कारावास और पीड़िता की नाबालिग बेटी से गलत हरकत के मामले में तीन साल की सजा सुनाई है। अदालत ने कहा कि आरोपी ने अपने पद और प्रभाव का दुरुपयोग कर पीड़िता का विश्वास तोड़ा।
MP के पूर्व AIG अनिल मिश्रा को उम्रकैद
- Published: 31 Jul 2026, 03:17 PM IST
- Last Updated: 31 Jul 2026, 03:17 PM IST
मध्य प्रदेश: पुलिस के तत्कालीन अतिरिक्त पुलिस महानिरीक्षक (AIG) रहे अनिल मिश्रा को दुष्कर्म और नाबालिग से गलत हरकत के मामले में जयपुर की विशेष पॉक्सो कोर्ट ने दोषी करार देते हुए कड़ी सजा सुनाई है। अदालत ने दुष्कर्म के मामले में आरोपी को आजीवन कारावास की सजा दी है। वहीं पीड़िता की नाबालिग बेटी के साथ गलत हरकत करने के मामले में तीन वर्ष के कारावास और जुर्माने से भी दंडित किया है।
आरोपी पर भरोसा कर मदद मांगी थी
विशेष पॉक्सो अदालत ने अपने फैसले में कहा कि आरोपी ने एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के रूप में मिले अधिकार और पद का दुरुपयोग किया। अदालत के अनुसार, पीड़िता ने आरोपी पर भरोसा कर मदद मांगी थी, लेकिन उसने उसी विश्वास का गलत फायदा उठाकर गंभीर अपराध किया। कोर्ट ने इसे विश्वास और अधिकार के दुरुपयोग का गंभीर मामला माना।
ऑफिसर्स मैस बुलाया और दुष्कर्म किया
मामले के अनुसार वर्ष 2012 में पीड़िता के पति के खिलाफ मध्य प्रदेश के सीहोर जिले में एक मामला दर्ज हुआ था। कानूनी सहायता की उम्मीद में पीड़िता के पति ने अपनी पत्नी को तत्कालीन एआईजी अनिल मिश्रा से मिलने भेजा। मार्च 2012 में भोपाल में दोनों की मुलाकात हुई। आरोप है कि आरोपी ने कानूनी मदद का भरोसा देकर पीड़िता को ऑफिसर्स मैस बुलाया, जहां उसके साथ दुष्कर्म किया।
शिकायत के मुताबिक इसके बाद आरोपी ने पीड़िता को जोधपुर, मुंबई और अन्य शहरों में भी बुलाया। जांच के दौरान यह भी सामने आया कि आरोपी ने पीड़िता से आर्थिक लेन-देन कराया और उसके खाते में रकम ट्रांसफर करवाई। इन तथ्यों को भी जांच का हिस्सा बनाया गया।
एक और गंभीर आरोप वर्ष 2014 का
मामले में एक और गंभीर आरोप वर्ष 2014 का है। अभियोजन के अनुसार अप्रैल 2014 में आरोपी ने पीड़िता की नाबालिग बेटी के साथ भी गलत हरकत की। इस मामले की सुनवाई पॉक्सो एक्ट के तहत विशेष अदालत में हुई। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपी को दोषी ठहराते हुए तीन वर्ष के कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई।
अदालत के फैसले को महिला और बाल अपराधों के मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि कानून से ऊपर कोई नहीं है और सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा अधिकारों का दुरुपयोग गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है। मामले में सुनाई गई सजा को पीड़ित पक्ष के लिए महत्वपूर्ण न्यायिक राहत माना जा रहा है।