जापान के रक्षा मंत्री शिंजिरो कोइजुमी ने 15 अगस्त को टोक्यो के विवादित यासुकुनी मंदिर में प्रार्थना की, जबकि प्रधानमंत्री सनाए तकाइची ने चीन और दक्षिण कोरिया के साथ कूटनीतिक तनाव को देखते हुए इस बार मंदिर से दूरी बनाए रखी। यासुकुनी मंदिर में युद्ध अपराधियों की स्मृति भी होने के कारण चीन और दक्षिण कोरिया जापानी नेताओं की यात्राओं का विरोध करते हैं। कोइज़ुमी का दौरा ऐसे समय हुआ है जब तकाइची सरकार जापान की सैन्य क्षमता और हथियारों की बिक्री बढ़ाने पर जोर दे रही है। इस बीच, प्रधानमंत्री के राष्ट्रीय समारोह में दिए जाने वाले भाषण से यह संकेत मिलने की उम्मीद है कि उनकी सरकार जापान के युद्धकालीन इतिहास और उसके लिए जिम्मेदारी को किस नजरिए से देखती है।
प्रधानमंत्री तकाइची मंदिर जाने से बचीं
माना जा रहा है कि जापान की प्रधानमंत्री सनाए तकाइची इस बार यासुकुनी मंदिर नहीं जाएंगी। उन्होंने पहले कई बार वादा किया था कि द्वितीय विश्व युद्ध में जापान के आत्मसमर्पण वाले दिन वह मंदिर में प्रार्थना करेंगी। हालांकि, इस बार उन्होंने कूटनीतिक तनाव को बढ़ने से रोकने के लिए वहां नहीं जाने का फैसला किया है।
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यासुकुनी मंदिर को लेकर चीन और दक्षिण कोरिया नाराज़
जापानी नेताओं के यासुकुनी मंदिर जाने का चीन और दक्षिण कोरिया लगातार विरोध करते रहे हैं। इसकी वजह यह है कि मंदिर में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान के लिए लड़ने वालों के साथ-साथ युद्ध अपराधियों के रूप में दोषी ठहराए गए लोगों को भी सम्मान दिया जाता है। दोनों देश जापानी नेताओं की मंदिर यात्रा को ऐसे कदम के रूप में देखते हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि जापान अपने युद्धकालीन अत्याचारों पर पर्याप्त पछतावा नहीं करता।
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रक्षा मंत्री के दौरे को क्यों माना जा रहा है ज्यादा विवादित
शिंजिरो कोइज़ुमी हर साल 15 अगस्त को युद्ध में मारे गए लोगों की याद में मनाए जाने वाले दिन और अन्य मौकों पर यासुकुनी मंदिर जाते रहे हैं। लेकिन इस बार उनका दौरा इसलिए अधिक विवादास्पद माना जा रहा है क्योंकि वह रक्षा मंत्री के पद पर हैं और प्रधानमंत्री तकाइची की सख्त सुरक्षा एवं सैन्य नीति वाली सरकार के तहत जापान की सैन्य क्षमता बढ़ाने और हथियारों की बिक्री को विस्तार देने पर जोर दे रहे हैं। कोइज़ुमी ने मंदिर दौरे के दौरान कोई टिप्पणी नहीं की और पत्रकारों के सवालों का जवाब दिए बिना उनके पास से गुजर गए।
जुनिचिरो कोइजुमी के बेटे हैं शिंजिरो
शिंजिरो कोइजुमी लोकप्रिय पूर्व प्रधानमंत्री जुनिचिरो कोइजुमी के बेटे हैं। जुनिचिरो कोइज़ुमी ने 2006 में प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए यासुकुनी मंदिर का दौरा किया था, जिसके बाद चीन के साथ जापान के संबंधों में तनाव बढ़ गया था।
सबकी नजर प्रधानमंत्री तकाइची पर थी
इस पूरे सप्ताह जापान में सबसे ज्यादा चर्चा इस बात को लेकर रही कि क्या प्रधानमंत्री तकाइची अपने पुराने वादे पर कायम रहेंगी और 15 अगस्त को यासुकुनी मंदिर पहुंचेंगी। इसी दिन जापान 81 साल पहले द्वितीय विश्व युद्ध में अपने आत्मसमर्पण और युद्ध की समाप्ति को याद करता है।
बीजिंग और सियोल के साथ रिश्तों को लेकर दबाव
इस सप्ताह की शुरुआत में जापान के मुख्य कैबिनेट सचिव मिनोरू किहारा ने कहा था कि प्रधानमंत्री तकाइची इस मामले में उचित फैसला लेंगी। इसके बाद जापानी मीडिया में ऐसी खबरें सामने आईं कि वह मंदिर नहीं जाएंगी, ताकि बीजिंग के साथ जापान के पहले से तनावपूर्ण संबंध और खराब न हों और दक्षिण कोरिया के साथ बेहतर होते रिश्तों पर भी असर न पड़े।
अब प्रधानमंत्री के भाषण पर टिकी निगाहें
शनिवार को अब सबकी नजर इस बात पर रहेगी कि युद्ध में जापान के आत्मसमर्पण की याद में आयोजित राष्ट्रीय समारोह में प्रधानमंत्री के तौर पर अपने पहले भाषण में तकाइची युद्धकालीन इतिहास का किस तरह जिक्र करती हैं।
युद्धकालीन अत्याचारों पर तकाइची का रुख
तकाइची ने जापान की युद्धकालीन आक्रामकता और अत्याचारों को स्वीकार करने से बार-बार इनकार किया है। उन्होंने इस बात से भी इनकार किया है कि कोरियाई महिलाओं और जापानी सैनिकों के लिए यौन दासियों के तौर पर रखी गई महिलाओं के साथ जबरदस्ती की गई थी। वह पहले ऐसे अभियान का हिस्सा भी रही हैं, जिसका उद्देश्य जापानी स्कूल की पाठ्यपुस्तकों से युद्धकालीन यौन दासता से जुड़े संदर्भों को हटाना था। इस व्यवस्था में पीड़ित महिलाओं के लिए आम तौर पर 'कम्फर्ट वुमेन' शब्द का इस्तेमाल किया जाता है।
पुरानी पीढ़ी के फैसलों की जिम्मेदारी लेने से इनकार
तकाइची का कहना है कि वह युद्ध के बाद की पीढ़ी से हैं और इसलिए जापान के पुराने कृत्यों की जिम्मेदारी उन पर नहीं आती। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि वह इन घटनाओं के लिए माफी मांगने का इरादा नहीं रखतीं।
शिंजो आबे की विरासत और जापान की बदली इतिहास-दृष्टि
2010 के दशक से, राष्ट्रवादी विचारधारा वाले पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे के कार्यकाल के दौरान जापान के युद्धकालीन इतिहास को नए नजरिए से देखने और उसकी व्याख्या बदलने की कोशिशें तेज हुईं। आबे जापान के युद्धकालीन इतिहास को लेकर देश में मौजूद 'खुद को कमतर आंकने वाली सोच' को बदलना और राष्ट्रीय गौरव को फिर से स्थापित करना चाहते थे। तकाइची उन्हें अपना राजनीतिक गुरु मानती हैं।
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युद्धकालीन अत्याचारों पर माफी का सवाल
2013 के बाद, आबे के दौर में स्थापित राजनीतिक रुख के तहत जापान के प्रधानमंत्रियों ने युद्धकालीन अत्याचारों के लिए एशियाई पीड़ितों से माफी मांगने से दूरी बनाए रखी है। हालांकि, पिछले साल पूर्व प्रधानमंत्री शिगेरू इशिबा ने जापान के युद्ध को लेकर 'पछतावा' जताया था और इसे एक गलती बताया था। लेकिन उन्होंने पूरे एशिया में जापान की आक्रामकता का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया और न ही औपचारिक रूप से माफी मांगी।