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हिंदी न्यूज़ऐस्ट्रोPitru Paksha 2026: बरसी अभी नहीं हुई, लेकिन पितृपक्ष आ गया है, क्या श्राद्ध करना चाहिए? जानें शास्त्रीय नियम
Pitru Paksha 2026: मृत्यु को एक साल पूरा नहीं हुआ तो क्या पितृपक्ष में श्राद्ध कर सकते हैं? जानें सपिंडीकरण, एकोद्दिष्ट श्राद्ध और गरुड़ पुराण में बताए गए समय का नियम.
Written By : Hirdesh Kumar Singh | Updated at : 24 Sep 2026 11:44 AM (IST)

पितृपक्ष 2026
Source : abplive
Pitru Paksha 2026: घर में किसी की मृत्यु को अभी एक साल नहीं हुआ और पितृपक्ष आ गया है. ऐसे में क्या उनका भी पूर्वजों के साथ श्राद्ध किया जाए? कई परिवारों में कहा जाता है कि बरसी से पहले यह संभव नहीं.
लेकिन शास्त्रों में एक साल की अवधि को हर स्थिति में अनिवार्य नहीं बताया गया है. सही विधि जानने के लिए यह देखना होगा कि दिवंगत व्यक्ति का सपिंडीकरण हुआ है या नहीं.
पहले समझें सपिंडीकरण क्या है
मृत्यु के बाद दिवंगत व्यक्ति के लिए किए जाने वाले अलग श्राद्ध को एकोद्दिष्ट श्राद्ध कहा जाता है. सपिंडीकरण वह कर्म है जिसमें उन्हें पूर्वजों की पंक्ति से जोड़ा जाता है. इसके बाद श्राद्ध की विधि बदलती है. इसलिए पितृपक्ष में हाल में दिवंगत व्यक्ति का कर्म कैसे होगा, इसका जवाब सिर्फ मृत्यु की तारीख देखकर नहीं दिया जा सकता.
शास्त्र में सपिंडीकरण का समय क्या बताया गया है?
गरुड़ पुराण में कहा गया है, 'द्वादशाहे त्रिपक्षे वा षण्मासे वत्सरेऽपि वा.' इसका अर्थ है कि सपिंडीकरण के लिए बारहवें दिन, तीन पक्ष बाद, छह महीने बाद अथवा एक वर्ष बाद के विकल्प बताए गए हैं. यह शास्त्रीय उदाहरण उस धारणा को स्पष्ट करता है कि सपिंडीकरण हमेशा बरसी पर ही होगा. परिवार की परंपरा के अनुसार यह पहले भी हो सकता है.
दूसरा उदाहरण धर्मसिंधु के श्राद्ध संबंधी वर्णन में मिलता है. उसमें मृत्यु के बाद एकोद्दिष्ट श्राद्ध और सपिंडीकरण की विधि अलग बताई गई है. यानी हाल में दिवंगत व्यक्ति के लिए किए जाने वाले कर्म और पूर्वजों के सामूहिक श्राद्ध को एक ही प्रक्रिया मान लेना ठीक नहीं है.
एक साल पूरा नहीं हुआ तो इस बार क्या करें?
वरिष्ट ज्योतिषाचार्य पंडित सुरेश श्रीमाली बताते हैं कि सपिंडीकरण नहीं हुआ है, तो दिवंगत व्यक्ति का नाम बाकी पितरों के साथ जोड़कर अपनी ओर से सामूहिक श्राद्ध की विधि तय न करें. उनके लिए पहले वर्ष के जो एकोद्दिष्ट या अन्य कर्म आपकी पारिवारिक परंपरा में निर्धारित हैं, उन्हें उसी क्रम में करें. पितृपक्ष में उनके निमित्त श्राद्ध करना हो तो उसकी अलग विधि कुलपुरोहित से जानें.
सपिंडीकरण हो चुका है, तो केवल यह कहकर श्राद्ध रोकने की जरूरत नहीं कि मृत्यु को बारह महीने पूरे नहीं हुए. गरुड़ पुराण में वर्ष से पहले सपिंडीकरण का विकल्प भी मिलता है. हालांकि, पहले वर्ष के शेष निर्धारित कर्मों और वार्षिक श्राद्ध को परिवार की विधि के अनुसार पूरा करना चाहिए.
इसलिए पितृपक्ष में कर्म तय करने से पहले पुरोहित को मृत्यु की चंद्र तिथि, सपिंडीकरण हुआ है या नहीं, और अब तक कौन-कौन से श्राद्ध हुए हैं, ये तीन बातें बताएं. इन्हीं के आधार पर वे आपके परिवार में लागू विधि बता सकेंगे.
FAQ
क्या मृत्यु के पहले साल में श्राद्ध होता है?
हां, पहले वर्ष के लिए एकोद्दिष्ट सहित अलग श्राद्ध कर्म बताए गए हैं. पितृपक्ष की विधि तय करते समय सपिंडीकरण की स्थिति देखनी होगी.
क्या सपिंडीकरण के लिए बरसी तक रुकना जरूरी है?
हर परंपरा में नहीं. गरुड़ पुराण में बारहवें दिन, तीन पक्ष, छह महीने और एक वर्ष के विकल्प मिलते हैं.
सपिंडीकरण नहीं हुआ तो पितृपक्ष में क्या करें?
दिवंगत व्यक्ति को बाकी पितरों के सामूहिक श्राद्ध में अपनी ओर से शामिल करने के बजाय, पहले वर्ष के कर्म और पितृपक्ष की लागू विधि कुलपुरोहित से तय करें.
क्या पितृपक्ष का श्राद्ध बरसी के श्राद्ध की जगह ले सकता है?
नहीं. इन्हें एक ही कर्म मानकर बरसी या पहले वर्ष के निर्धारित संस्कार न छोड़ें.
Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.
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हृदेश कुमार सिंह, Senior Vedic Astrologer | Astro Media Editor | Digital Strategy Leader
'ज्योतिष केवल भविष्य बताने की विद्या नहीं, बल्कि समय को समझने की कला है.'
हृदेश कुमार सिंह लंबे समय से ज्योतिष, धर्म, अध्यात्म और डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं. वे उन चुनिंदा लोगों में माने जाते हैं जिन्होंने पारंपरिक ज्योतिष को आज की बदलती दुनिया, डिजिटल संस्कृति और नई पीढ़ी की सोच से जोड़ने का प्रयास किया है. उनके लिए ज्योतिष केवल ग्रहों की गणना नहीं, बल्कि मानव व्यवहार, सही समय और जीवन के निर्णयों को समझने का माध्यम है.
वर्तमान में वे ABP Live में Astro, Religion और Dharma LIVE से जुड़े कंटेंट और डिजिटल रणनीति का नेतृत्व कर रहे हैं. यहां उनका फोकस ज्योतिष और धर्म को ऐसे रूप में प्रस्तुत करना है, जो आज के पाठकों और दर्शकों की जिंदगी से सीधे जुड़ सके. यही कारण है कि उनके लेखन और विश्लेषण में केवल पारंपरिक बातें नहीं, बल्कि करियर, रिश्ते, मानसिक तनाव, सामाजिक बदलाव, तकनीक और बदलती जीवनशैली जैसे विषय भी दिखाई देते हैं.
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हृदेश कुमार सिंह के कई ज्योतिषीय और सामाजिक विश्लेषण समय-समय पर चर्चा में रहे हैं. राजनीति, शेयर बाजार, मनोरंजन जगत, AI और बदलते सामाजिक माहौल जैसे विषयों पर उनके आकलनों ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया है.
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वे वैदिक ज्योतिष, होरा शास्त्र, संहिता, मेदिनी ज्योतिष, अंक ज्योतिष, शकुन शास्त्र और वास्तु शास्त्र जैसे विषयों पर अध्ययन और लेखन करते रहे हैं. करियर, विवाह, व्यापार, शिक्षा और जीवन के महत्वपूर्ण फैसलों से जुड़े विषयों पर वे पारंपरिक ज्योतिष को आधुनिक जीवन की वास्तविक परिस्थितियों से जोड़कर देखने का प्रयास करते हैं.
डिजिटल दौर में ज्योतिष को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए उन्होंने 'Gen-Z Horoscope' जैसे कॉन्सेप्ट पर भी काम किया, जिसमें राशिफल को केवल भाग्य या डर से जोड़कर नहीं, बल्कि career pressure, relationship confusion, emotional wellbeing और real-life decision making जैसी बातों से जोड़ा गया.
उनका मानना है कि आज के समय में सबसे बड़ी चुनौती जानकारी की कमी नहीं, बल्कि सही समझ की कमी है. वे ज्योतिष को ऐसा माध्यम मानते हैं, जो व्यक्ति को डराने के बजाय उसे बेहतर निर्णय लेने और खुद को समझने में मदद कर सकता है.
श्रीमद्भगवद्गीता के कर्म सिद्धांत, भगवान बुद्ध के संतुलन के विचार, सूफी चिंतन और आधुनिक मनोविज्ञान से प्रभावित उनकी सोच उनके लेखन में भी दिखाई देती है. यही वजह है कि उनका काम केवल भविष्यवाणी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि लोगों को सोचने और अपने जीवन को नए नजरिए से देखने के लिए प्रेरित करता है.
ज्योतिष और मीडिया के अलावा उन्हें सिनेमा, संगीत, साहित्य, राजनीति, बाजार, पर्यावरण, ग्रामीण जीवन और यात्राओं में विशेष रुचि है. इन अनुभवों का असर उनके विषय चयन और लेखन शैली में साफ दिखाई देता है.
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Published at : 23 Sep 2026 03:49 PM (IST)
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