August 10, 2026 47 बार देखा गया
पटना जिले के मसौढ़ी प्रखंड के वार्ड नंबर 8 की रहने वाली सुंदरी देवी पैरों से करीब 90 फीसदी दिव्यांग हैं। सुंदरी देवी के लिए घर से बाहर निकलना और कहीं पहुंचना आसान नहीं है। क्यों क्योंकि उनके पास विलचेयर (बैटरी या हाथ से चलने वाली गाड़ी) का साधन नहीं है। सरकारी दफ़्तरों में चक्कर के लगाने के बाद भी नहीं मिला कोई भी सुविधा।
रिपोर्ट- सुमन, लेखन – रचना

सुंदरी देवी (फोटो साभार: सुमन)
दिव्यांग होना किसी व्यक्ति की गलती नहीं है लेकिन समाज में आज भी खासकर दिव्यांग महिलाओं को अपनी पहचान और अधिकार के लिए कई तरह के सवालों से गुजरना पड़ता है। उनकी दिव्यांगता को लेकर सवाल उठते हैं उनकी सुंदरता पर टिप्पणी होती है और कई बार उनकी शादी और भविष्य तक को उनकी शारीरिक स्थिति से जोड़कर देखा जाता है। जैसे दिव्यांग होना उनके लिए कोई कमी या गुनाह हो। खबर लहरिया की ग्राउंड रिपोर्टिंग में सामने आई एक महिला की कहानी इसी सवाल को खड़ा करती है। एक दिव्यांग महिला जो अपने पैरों पर ठीक से चल नहीं सकती सरकारी सुविधा की उम्मीद में सालों से दफ्तरों और केंद्रों के चक्कर लगा रही है। उसके पास दिव्यांगता का प्रमाण पत्र है जरूरी दस्तावेज हैं और सरकारी सुविधा की जरूरत भी है लेकिन इसके बावजूद एक व्हीलचेयर या आने-जाने के साधन के लिए उसे बार-बार अपनी परेशानी साबित करनी पड़ रही है।
पटना जिले के मसौढ़ी प्रखंड के वार्ड नंबर 8 की रहने वाली सुंदरी देवी पैरों से करीब 90 फीसदी दिव्यांग हैं। सुंदरी देवी के लिए घर से बाहर निकलना और कहीं पहुंचना आसान नहीं है। क्यों क्योंकि उनके पास विलचेयर (बैटरी या हाथ से चलने वाली गाड़ी) का साधन नहीं है। सुंदरी देवी का आरोप है कि सरकारी सुविधा की उम्मीद लेकर वह बुनियादी केंद्र पहुंची थीं। उन्हें उम्मीद थी कि वहां से उन्हें बैटरी से चलने वाली गाड़ी या हाथ से चलने वाली कोई ऐसी सुविधा मिल सकेगी जिससे आने-जाने में उन्हें थोड़ी मदद हो।
लेकिन केंद्र पर मौजूद कर्मचारियों ने उन्हें सही जानकारी नहीं दी और बिना किसी मदद के वहां से वापस भेज दिया और सरकारी योजना से मदद मिलने की जो उम्मीद लेकर वह गई थीं वह भी पूरी नहीं हुई। इस घटना के बाद सरकारी योजनाओं और व्यवस्था पर उनका भरोसा मानो खतम जैसा हो गया है।
एक साल के उम्र में हुआ था लकवा
सुंदरी देवी ने बताया कि उन्हें ठीक-ठीक याद नहीं कि उनके साथ क्या हुआ था क्योंकि उस समय वह सिर्फ एक साल की थीं। उनके माता-पिता उन्हें बताते थे कि करीब एक साल की उम्र में उन्हें लकवा मार गया था। इसके बाद उनके पैर में परेशानी शुरू हो गई और वे सामान्य चलने में नाकाम रह गई। उनका दाहिना पैर काफी पतला है और उससे चलना उनके लिए बहुत मुश्किल है। बचपन से लेकर आज तक उन्हें इसी परेशानी के साथ जिंदगी बितानी पड़ रही है। एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए उन्हें काफी दिक्कत होती है और सामान्य लोगों की तरह चलना उनके लिए संभव नहीं है।
सुंदरी देवी के परिवार में उनके पति दो बेटियां और एक बेटा है। उनका 13 साल का बेटा बोल नहीं पाता। परिवार की जिम्मेदारी मुख्य रूप से उनके पति के कंधों पर है जो ऑटो रिक्शा चलाकर घर का खर्च चलाते हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति भी मजबूत नहीं है। पति रोज ऑटो चलाते हैं तभी घर का चूल्हा जलता है। कमाई सीमित होने के कारण परिवार की रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना भी आसान नहीं है। ऐसे में सुंदरी देवी के लिए किसी सरकारी सहायता का मिलना उनके लिए बड़ी राहत हो सकती थी। वह बैटरी वाली गाड़ी या हाथ से चलने वाले साधन की उम्मीद लेकर बुनियादी केंद्र पहुंची थीं लेकिन सही जानकारी और मदद नहीं मिलने का आरोप लगाते हुए वह वहां से लौट आईं।
सुंदरी देवी की कहानी सिर्फ एक दिव्यांग महिला की परेशानी के साथ यह है कि जिन लोगों के लिए सरकारी योजनाएं बनाई जाती हैं क्या उन्हें जरूरत के समय उन योजनाओं की सही जानकारी और लाभ मिल भी पाता है?
विकलांग कार्ड बनाने में हुए खर्च
सुंदरी देवी के अनुसार दिव्यांग कार्ड बनवाना भी उनके लिए आसान नहीं था। इसके लिए उन्हें कई बार सरकारी दफ्तरों और अस्पताल के चक्कर लगाने पड़े। कभी किसी को पैसे देने पड़े तो कभी किसी से मदद मांगनी पड़ी। आखिरकार वह मसौढ़ी के सरकारी अस्पताल पहुंचीं जहां उन्होंने दिव्यांग कार्ड के लिए ऑनलाइन आवेदन किया। ऑनलाइन आवेदन के कुछ दिनों बाद उन्हें मेडिकल जांच के लिए डॉक्टर के पास बुलाया गया। सुंदरी देवी जांच के लिए अस्पताल पहुंचीं और प्रक्रिया पूरी होने के बाद उन्हें उनका दिव्यांग कार्ड मिल गया। कार्ड हाथ में आते ही वह बहुत खुश हुईं। उन्हें लगा कि अब सरकारी योजनाओं और दिव्यांग लोगों के लिए मिलने वाली सुविधाओं का लाभ उन्हें भी मिल सकेगा। वह बताती हैं कि खुशी इतनी थी कि उन्होंने वहां मौजूद कुछ लोगों को मिठाई तक खिलाई और कहा कि आखिरकार उनका दिव्यांग कार्ड बन गया।
सुंदरी देवी के मुताबिक कार्ड बनवाने की पूरी प्रक्रिया में आने-जाने और दूसरे कागज तैयार कराने में करीब 1000 रुपये खर्च हुए। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है इसलिए यह रकम भी उनके लिए छोटी नहीं थी। लेकिन उस समय उन्हें खर्च की चिंता नहीं थी। उनके मन में बस यही उम्मीद थी कि कार्ड बन जाने के बाद उनकी जिंदगी थोड़ी आसान हो जाएगी और उन्हें सरकार की ओर से मिलने वाली सुविधाओं का लाभ मिल सकेगा। उन्हें क्या पता था कि कार्ड मिलने के बाद भी सरकारी सुविधा हासिल करने के लिए उन्हें एक और लंबी दौड़ लगानी पड़ेगी।
सुंदरी देवी के पास मौजूद दिव्यांग कार्ड के अनुसार उनका कार्ड 25 जुलाई 2022 को बनकर तैयार हुआ था। कार्ड में उनकी दिव्यांगता की कैटेगरी और प्रतिशत भी दर्ज है। दस्तावेज में उन्हें लैप्रोसी (कुष्ठ रोग के प्रकार और उसके वर्गीकरण) कैटेगरी में रखा गया है और उनकी दिव्यांगता 90 फीसदी दर्ज है। उनका का कहना है कि इसी कार्ड के आधार पर उन्हें दिव्यांगों के लिए मिलने वाली सरकारी सुविधाओं का लाभ मिलने की उम्मीद थी। उनके पास इसके अलावा आधार कार्ड, निवास प्रमाण पत्र और आय प्रमाण पत्र समेत जरूरी दस्तावेज भी हैं। वह ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं हैं लेकिन इन सभी कागजों को संभालकर रखती हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए दस्तावेज जरूरी हैं।
2024 में बैटरी वाली गाड़ी की उम्मीद लेकर पहुंचीं
सुंदरी देवी बताती हैं कि साल 2024 में वह बुनियादी केंद्र पहुंचीं। उन्हें जानकारी मिली थी कि दिव्यांग लोगों को बैटरी से चलने वाली गाड़ी दी जा रही है। उन्होंने सोचा कि जब दूसरे दिव्यांग लोगों को यह सुविधा मिल रही है तो उन्हें भी मिल सकती है। इसी उम्मीद के साथ वह अपने सभी कागज लेकर केंद्र पहुंचीं। वहां कर्मचारियों ने उनके दस्तावेज देखे और एक पीले रंग का कार्ड दिया जिस पर उनका नाम दर्ज किया गया। सुंदरी देवी के मुताबिक कार्ड पर नाम दर्ज होने के बाद उन्हें लगा कि अब उन्हें भी गाड़ी मिल जाएगी। लेकिन इसके बाद जो हुआ उससे वह हैरान रह गईं। सुंदरी देवी का आरोप है कि केंद्र में मौजूद लोगों ने उनसे कहा कि वह पैरों से नहीं बल्कि आंखों से दिव्यांग हैं इसलिए उन्हें बैटरी वाली गाड़ी नहीं दी जा सकती। यह सुनकर उन्हें काफी दुख हुआ। वह बताती हैं कि उन्होंने वहां मौजूद कर्मचारियों से कहा कि वह सामने खड़ी हैं और साफ दिखाई दे रहा है कि उन्हें पैरों से चलने में परेशानी है। इसके बावजूद उनसे कहा गया कि उनका दिव्यांग कार्ड गलत बना हुआ है और उन्हें दोबारा कार्ड बनवाकर लाना होगा। सुंदरी देवी ने वहां अपनी परेशानी समझाने की काफी कोशिश की लेकिन उनकी बात नहीं सुनी गई। आखिरकार उन्हें बिना किसी सुविधा के वापस लौटना पड़ा।
बार-बार लौटाए जाने से पति भी हुए नाराज
जिस दिन सुंदरी देवी बुनियादी केंद्र से वापस लौटी थीं उस समय उनके पति भी उनके साथ मौजूद थे। उन्हें बिना सुविधा दिए लौटाए जाने पर उनके पति काफी नाराज हुए। उन्होंने कहा कि जब हर बार उन्हें इसी तरह वापस भेज दिया जाता है तो वह उन्हें दोबारा लेकर कहीं नहीं जाएंगे।
लेकिन जरूरत और मजबूरी ने सुंदरी देवी को फिर कोशिश करने के लिए मजबूर किया। साल 2025 में उन्हें किसी के जरिए जानकारी मिली कि पटना में दिव्यांग लोगों को बैटरी से चलने वाली साइकिल दी जा रही है। वह एक बार फिर अपने पति के साथ पटना पहुंचीं। हालांकि वहां से भी उन्हें कोई सुविधा नहीं मिली और उन्हें वापस लौटना पड़ा। बार-बार कोशिश के बाद भी सुविधा नहीं मिलने से सुंदरी देवी के मन में नाराजगी और सवाल दोनों हैं। उन्हें सबसे ज्यादा दुख इस बात का हुआ कि उनकी दिव्यांगता किसी कागज में छिपी हुई नहीं है। इसके बावजूद उन्हें सुविधा के लिए बार-बार अपनी स्थिति साबित करनी पड़ रही है।
वह बताती हैं कि पैरों से चलने में परेशानी के कारण सड़क पर आना-जाना उनके लिए बहुत मुश्किल है। किसी वाहन में चढ़ना या उतरना भी उनके लिए सामान्य लोगों जैसा आसान नहीं है। कई बार उन्हें अपने दोनों हाथों का सहारा लेकर जमीन पर खुद को आगे खिसकाना पड़ता है और फिर धीरे-धीरे पैर आगे बढ़ाने पड़ते हैं।
बुनियादी केंद्र की हेड श्रद्धा सिन्हा की बात
बुनियादी केंद्र की हेड श्रद्धा सिन्हा ने बताया कि सिर्फ 90 फीसदी दिव्यांगता होने के आधार पर बैटरी वाली गाड़ी नहीं दी जाती इसके लिए सरकार की तय गाइडलाइन है। उनके मुताबिक 90 फीसदी दिव्यांगता के साथ व्यक्ति के हाथ ठीक होने चाहिए, आंखों की रोशनी अच्छी होनी चाहिए और वह खुद गाड़ी चलाने की स्थिति में होना चाहिए। सुंदरी देवी का कार्ड देखने के बाद उन्होंने बताया कि उनकी दिव्यांगता की कैटेगरी और शारीरिक स्थिति के आधार पर वह बैटरी वाली गाड़ी के लिए पात्र नहीं हैं। हालांकि अगर सुंदरी देवी आधार, जाति, निवास और दिव्यांगता प्रमाण पत्र के साथ दोबारा बुनियादी केंद्र में ऑनलाइन आवेदन करती हैं तो उनकी कैटेगरी के आधार पर दूसरी सुविधा के लिए पात्रता देखी जा सकती है। श्रद्धा सिन्हा ने बताया कि ऑनलाइन आवेदन की सुविधा केंद्र में 2025 से शुरू हुई है और सुंदरी देवी ने 2025 और 2026 में यहां आवेदन नहीं किया। उनके मुताबिक संभव है कि सुंदरी देवी सिर्फ बैटरी वाली गाड़ी की मांग को लेकर केंद्र आई हों इसलिए पात्रता पूरी न होने पर उन्हें वापस लौटाया गया।
डॉक्टर ने भी बताया कार्ड को सही
सुंदरी देवी के दिव्यांग कार्ड को लेकर जब मसौढ़ी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी रामानुज से बात की गई तो उन्होंने पहले कार्ड देखने को कहा। उन्होंने बताया कि कार्ड देखकर ही यह साफ तौर पर बताया जा सकता है कि वह कहां से जारी हुआ है और उसमें किस तरह की दिव्यांगता दर्ज है। कार्ड देखने के बाद उन्होंने तुरंत अपने कर्मचारियों को बुलाया और कार्ड की जानकारी जांचने को कहा। करीब 10 मिनट तक जांच करने के बाद कर्मचारियों ने बताया कि यह कार्ड मसौढ़ी से नहीं बल्कि पटना स्थित सीएस कार्यालय से जारी हुआ है।

सुंदरी देवी (फोटो साभार: सुमन)
चिकित्सा पदाधिकारी ने कार्ड में दर्ज जानकारी देखते हुए बताया कि इसमें सुंदरी देवी की 90 फीसदी दिव्यांगता दर्ज है। कार्ड में लैप्रोसी कैटेगरी भी दर्ज है। उन्होंने बताया कि इस कैटेगरी का मतलब पैरों से जुड़ी दिव्यांगता से है। उन्होंने साफ कहा कि उनके हिसाब से सुंदरी देवी का दिव्यांग कार्ड सही है और उसमें दिव्यांगता का प्रतिशत भी दर्ज है। हालांकि बुनियादी केंद्र से उन्हें सुविधा क्यों नहीं मिल पाई इस पर चिकित्सा पदाधिकारी ने कहा कि वहां किसी योजना के लिए किस तरह के नियम और पात्रता तय की गई है इसकी जानकारी बुनियादी केंद्र के अधिकारी ही बेहतर तरीके से दे सकते हैं। यानी सुंदरी देवी के पास मौजूद दिव्यांग कार्ड को लेकर स्वास्थ्य केंद्र की ओर से कोई गड़बड़ी नहीं बताई गई। अब सवाल यह है कि अगर कार्ड में उनकी 90 फीसदी दिव्यांगता दर्ज है तो बुनियादी केंद्र में उन्हें सुविधा देने से इनकार क्यों किया गया और उनसे दोबारा कार्ड बनवाने के लिए क्यों कहा गया?
जांच में गलती मिली तो होगी कार्यवाही, समाज कल्याण अधिकारी
मसौढ़ी में औचक निरीक्षण के लिए पहुंचीं बिहार राज्य की समाज कल्याण पदाधिकारी श्वेता देवी से जब सुंदरी देवी के मामले को लेकर बात की गई तो उन्होंने मामले को गंभीरता से लेने की बात कही। श्वेता देवी ने कहा कि अगर जांच में यह सामने आता है कि डॉक्टर ने दिव्यांगता को लेकर गलत रिपोर्ट बनाई है तो संबंधित डॉक्टर के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी और जरूरत पड़ने पर उन्हें निलंबित भी किया जा सकता है। वहीं अगर सुंदरी देवी का दिव्यांग कार्ड सही है और इसके बावजूद बुनियादी केंद्र के कर्मचारियों ने उन्हें सरकारी सुविधा देने से इनकार किया है तो संबंधित कर्मचारियों पर भी कार्रवाई होगी।
उन्होंने कहा कि मामले की जानकारी लेकर इसकी जांच कराई जाएगी और जो भी गलती या लापरवाही सामने आएगी उसके आधार पर कार्रवाई की जाएगी। अधिकारी ने यह भी कहा कि वह इस मामले को तुरंत देख रही हैं और इस पर जल्द काम किया जाएगा।
दिव्यांगजनों के लिए कई योजनाएं
बता दें सरकार ने दिव्यांगजनों के लिए कई योजनाएं और नियम बनाए हैं। व्हीलचेयर और दूसरे सहायक उपकरण उपलब्ध कराने के लिए केंद्र सरकार की एडीआईपी (ADIP) योजना है। इसके तहत पात्र दिव्यांगजनों को निर्धारित शर्तों के आधार पर व्हीलचेयर, ट्राइसाइकिल और दूसरे सहायक उपकरण दिए जाते हैं। आम तौर पर इसके लिए कम से कम 40 फीसदी दिव्यांगता का प्रमाण पत्र या UDID कार्ड और तय आय सीमा जैसी शर्तें होती हैं। पात्र लोगों को सरकार की ओर से पेंशन और दूसरी आर्थिक सहायता भी दी जाती है। सरकारी शिविरों और उपकरण वितरण कार्यक्रमों में महिलाओं और बालिकाओं को प्राथमिकता देने की भी बात कही जाती है। लेकिन धरातल पर तो कहानी कुछ और ही है और ये सिर्फ सुंदरी देवी की कहानी है कितने ही सुंदरी देवी बस सरकारी दफ़्तरों का चक्कर लगा रहे होंगे।
रिपोर्टर सुमन का अनुभव “सरकार की गाइडलाइन दिव्यांगों के लिए इतनी कड़ी कर दी गई है कि जिन सुविधाओं की व्यक्ति को मूलभूत जरूरत होती है वह व्यक्ति को नहीं मिल पाती। सिर्फ सरकार यह सोचती है कि किस आधार पर लोगों को सुविधा मिले। गाइडलाइन इतनी टाइट हो जाती हैं जिसके आधार पर कई ऐसे दिव्यांग लोग हैं जो सुविधाओं से वंचित रह जाते हैं और लाचार हो जाते हैं। अगर लोगों का घर चलाने वाला व्यक्ति अच्छा न हो तो कई बार ऐसा देखने को मिलता है कि दिव्यांग लोग सड़कों बसों और ट्रेनों में भीख मांगते हुए नजर आते हैं। न तो उन्हें सरकार की किसी भी योजना का लाभ मिल पाता है और न ही ऐसी जगहों पर जाकर उन्हें कोई लाभ मिल पाता है।”
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