September 5, 2026

New World Map : दुनिया का नक्शा बदलने की तैयारी! अफ्रीका दिखेगा बड़ा, यूरोप-अमेरिका छोटे,164 देशों का समर्थन, अमेरिका ने इसके खिलाफ किया वोट

New World Map: हम बचपन से किताबों, टीवी और इंटरनेट पर दुनिया का नक्शा देखते आए हैं। कभी सोचा है अगर वो बदल जाए तो दुनिया कैसी दिखेगी ? करीब 450 साल बाद दुनिया का नक्शा (World Map) आपको थोड़ा अलग नजर आ सकता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा  (United Nations General Assembly)  ने एक ऐसे नए वर्ल्ड मैप (World Map) को अपनाने के पक्ष में मतदान किया है, जो धरती के अलग-अलग हिस्सों के वास्तविक आकार को पहले की तुलना में ज्यादा सटीक तरीके से दिखाने की कोशिश करता है।

इस प्रस्ताव को भारत (India) के साथ-साथ 164 देशों का समर्थन मिला, जबकि अमेरिका (America) ने इसके खिलाफ वोट किया। छह देशों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया। हालांकि, यह फैसला कानूनी रूप से बाध्यकारी (Mandatory) नहीं है। इसका उद्देश्य सदस्य देशों को शिक्षा, सरकारी संस्थानों और अन्य जगहों पर ज्यादा सटीक मानचित्रों के इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित करना है। 

नए नक्शे में क्या बदलेगा?

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नए मैप (New World Map) को ‘इक्वल अर्थ कार्टोग्राफिक प्रोजेक्शन’ (Equal-area cartographic Projection) कहा जा रहा है। इसकी खासियत यह है कि इसमें महाद्वीपों के क्षेत्रफल (Areas of the Continents) को ज्यादा वास्तविक अनुपात में दिखाने की कोशिश की गई है। यही कारण है कि नए नक्शे में अफ्रीका पहले के मुकाबले बड़ा दिखाई देगा, जबकि यूरोप और उत्तरी अमेरिका का आकार तुलनात्मक रूप से छोटा नजर आएगा। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि अफ्रीका या किसी दूसरे महाद्वीप का वास्तविक आकार बदल गया है। बदलाव सिर्फ इस बात में है कि नक्शे पर धरती के अलग-अलग हिस्सों को किस तरह प्रदर्शित किया जाता है।

पुराने मर्केटर मैप में क्या दिक्कत है?

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दुनिया में लंबे समय से मर्केटर प्रोजेक्शन (Mercator Projection) का इस्तेमाल किया जाता रहा है। इसे फ्लेमिश कार्टोग्राफर जेरार्डस मर्केटर (Flemish cartographer Gerardus Mercator) ने 1569 में तैयार किया था। उस समय इसका मुख्य उद्देश्य समुद्री यात्रा और नौवहन को आसान बनाना था। लेकिन इस नक्शे में धरती को सपाट सतह पर दिखाने की वजह से आकार में विकृति पैदा होती है। खासतौर पर ध्रुवों के करीब स्थित क्षेत्र अपने वास्तविक आकार से काफी बड़े दिखाई देते हैं, जबकि भूमध्य रेखा के आसपास के क्षेत्र अपेक्षाकृत छोटे नजर आते हैं।

संयुक्त राष्ट्र महासभा में नए मैप से संबंधित प्रस्ताव को 164 देशों का समर्थन मिला। अमेरिका ने प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया, जबकि छह देश वोटिंग से दूर रहे। भारत ने भी इस पहल का समर्थन किया है। भारतीय राजनयिक रघु पुरी ने संयुक्त राष्ट्र में कहा कि समान क्षेत्रफल वाले प्रोजेक्शन महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि वे अलग-अलग महाद्वीपों और क्षेत्रों के वास्तविक सापेक्ष आकार और क्षेत्रफल को बेहतर तरीके से बनाए रखते हैं।

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क्या मर्केटर मैप अब खत्म हो जाएगा?

ऐसा नहीं है। संयुक्त राष्ट्र के इस प्रस्ताव के बाद मर्केटर प्रोजेक्शन पर कोई तत्काल प्रतिबंध नहीं लगा है। नए प्रस्ताव का उद्देश्य देशों को ऐसे मानचित्रों के इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित करना है, जिनमें धरती के भू-भाग का आकार ज्यादा सटीक तरीके से दिखाई दे। इसलिए आने वाले समय में स्कूलों, संस्थानों और दूसरी जगहों पर आपको दुनिया के नक्शे के नए रूप देखने को मिल सकते हैं।

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अफ्रीका के बड़ा दिखने की सबसे ज्यादा चर्चा क्यों?

नए प्रोजेक्शन की चर्चा में अफ्रीका सबसे ज्यादा सुर्खियों में है। इसकी वजह यह है कि मर्केटर मैप की तुलना में नए नक्शे में अफ्रीका का वास्तविक क्षेत्रफल ज्यादा स्पष्ट रूप से सामने आता है। लेकिन इस बदलाव का मकसद सिर्फ अफ्रीका को बड़ा दिखाना नहीं है। असल उद्देश्य पूरी दुनिया के महाद्वीपों और देशों के क्षेत्रफल के अनुपात को ज्यादा सही तरीके से दिखाना है। यानी दुनिया बदली नहीं है, बल्कि उसे नक्शे पर दिखाने का तरीका बदलने की कोशिश हो रही है।

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