Updated: Monday, September 21, 2026, 16:25 [IST]
Bollywood Nepotism Controversy: बॉलीवुड में नेपोटिज्म यानी परिवारवाद कोई नया शब्द नहीं है लेकिन पिछले कुछ सालों में ये फिल्म इंडस्ट्री की सबसे चर्चित बहसों में शामिल हो गया है। खासकर सोशल मीडिया के दौर में जब किसी स्टार किड की लॉन्चिंग की खबर आती है तो उसके टैलेंट से पहले उसके परिवार और सरनेम की चर्चा शुरू हो जाती है। दूसरी तरफ कई ऐसे कलाकार भी हैं जिन्होंने फिल्मी परिवार से बाहर निकलकर अपनी पहचान बनाई और आज इंडस्ट्री के बड़े नामों में गिने जाते हैं।
स्टार किड बनाम आउटसाइडर की लड़ाई
यही वजह है कि बॉलीवुड के नेपोटिज्म को सिर्फ स्टार किड बनाम आउटसाइडर की लड़ाई मानना पूरी तस्वीर नहीं दिखाता। असली सवाल ये है कि फिल्मी परिवार से आने वाले स्टार्स को शुरुआत में कितना फायदा मिलता है। ये फायदा कितने समय तक साथ रहता है और क्या आखिरकार दर्शक ही तय करते हैं कि कौन स्टार बनेगा?
आंकड़े बताते हैं कि दर्शकों की धारणा क्या है
-नेपोटिज्म को लेकर सोशल मीडिया पर लंबे समय से बहस होती रही है लेकिन साल 2024 में Ormax Media ने इस मुद्दे पर हिंदी फिल्म देखने वाले दर्शकों के बीच रिसर्च की। इस रिसर्च के मुताबिक 65 फीसदी दर्शकों ने माना कि बॉलीवुड में ऐसे छोटे-छोटे ग्रुप और कैंप मौजूद हैं जो अपने करीबी लोगों को बढ़ावा देते हैं। इससे भी बड़ा आंकड़ा 71 फीसदी का रहा। इतने दर्शकों ने माना कि बॉलीवुड में नए टैलेंट के लिए फिल्मी परिवारों से मिलने वाला सपोर्ट इंडस्ट्री में बाहर से आने वालों के लिए रास्ता मुश्किल बनाता है।
-हालांकि इस तस्वीर का दूसरा पहलू भी जरूरी है। इसी रिसर्च में 40 फीसदी दर्शकों ने नेपोटिज्म को आउटसाइडर्स के लिए अनुचित माना जबकि लगभग उतना ही बड़ा हिस्सा इसे इंडस्ट्री का नॉर्मल पार्ट मानता है यानी दर्शक नेपोटिज्म के अस्तित्व को महसूस करते हैं लेकिन हर दर्शक इसे एक ही नजर से नहीं देखता।
स्टार किड्स को क्या-क्या फायदे मिलते हैं?
-फिल्मी परिवार से आने का सबसे बड़ा फायदा अक्सर अभिनय सीखने से पहले ही शुरू हो जाता है। एक स्टार किड बचपन से ही फिल्मी माहौल देखता है। उसे पता होता है कि निर्माता कौन हैं, निर्देशक कैसे काम करते हैं, ऑडिशन और शूटिंग का सिस्टम कैसा है और इंडस्ट्री में किससे संपर्क किया जा सकता है। सबसे अहम फायदा है पहला मौका।
-किसी आउटसाइडर को अपनी पहली फिल्म पाने के लिए कई ऑडिशन देने पड़ सकते हैं, मीटिंग्स करनी पड़ सकती हैं और लंबे समय तक बिना काम के रहना पड़ सकता है। वहीं फिल्मी परिवार से आने वाले कलाकार के लिए किसी बड़े निर्माता या निर्देशक तक पहुंचना काफी आसान होता है।
-एक्टर और निर्देशक वासन बाला ने इंडस्ट्री पर बात करते हुए इसी अंतर की ओर इशारा किया था। उनके मुताबिक किसी इनसाइडर के लिए इंडस्ट्री में एंट्री के शुरुआती कुछ साल बच जाते हैं जबकि आउटसाइडर को पहले जगह बनाने और फिर अपना पैर जमाने में समय लग सकता है लेकिन पहला मौका और पूरी सफलता एक ही चीज नहीं हैं।
रणबीर कपूर से लेकर आलिया भट्ट तक, सफल स्टार किड्स की लंबी लिस्ट
-अगर स्टार किड्स की बात करें तो ऐसे कई नाम हैं जिन्होंने अपने परिवार की विरासत को आगे बढ़ाते हुए खुद को सफल कलाकार के रूप में स्थापित किया है। ऋतिक रोशन, करीना कपूर खान, रणबीर कपूर, आलिया भट्ट और वरुण धवन इसके अलग-अलग उदाहरण हैं।
-रणबीर कपूर की पहली फिल्म 'सांवरिया' बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं रही थी। फिल्म को बॉक्स ऑफिस इंडिया ने 'डिजास्टर' बताया था और इसकी इंडिया नेट कमाई करीब 20.92 करोड़ रुपये रही जबकि बजट करीब 45 करोड़ रुपये बताया गया लेकिन रणबीर कपूर का करियर वहीं खत्म नहीं हुआ।
-इसके बाद रणबीर कपूर ने 'बचना ऐ हसीनों', 'वेक अप सिड', 'अजब प्रेम की गजब कहानी', 'रॉकस्टार', 'बर्फी', 'ये जवानी है दीवानी' और 'संजू' जैसी फिल्मों में काम किया जिसने उन्हें अलग पहचान दिलाई। ऐसे में कपूर परिवार का लॉन्चपैड उन्हें मिला लेकिन लंबे समय तक टिके रहने के लिए फिल्मों का प्रदर्शन और उनका अभिनय भी जरूरी था।
-आलिया भट्ट का उदाहरण भी इसी बहस को एक अलग दिशा देता है। वो फिल्म निर्माता महेश भट्ट और एक्ट्रेस सोनी राजदान की बेटी हैं और उन्हें करण जौहर की 'स्टूडेंट ऑफ द ईयर' से बॉलीवुड में बतौर हीरोइन लॉन्च किया गया था। इस फिल्म में लोगों ने उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं किया था लेकिन आगे चलकर 'हाईवे', 'उड़ता पंजाब', 'राजी', 'गली बॉय' और 'गंगूबाई काठियावाड़ी' जैसी फिल्मों में अपने दमदार अभिनय से उन्होंने लोगों का दिल जीत लिया।
-'गंगूबाई काठियावाड़ी' के लिए आलिया भट्ट को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला है। इसलिए स्टार किड्स के मामले में भी एक अंतर समझना जरूरी है, परिवार आपको दरवाजे तक पहुंचा सकता है लेकिन हर फिल्म के बाद वही दरवाजा खुला रहे, इसकी गारंटी नहीं होती।

हर स्टार किड सफल नहीं होता
-नेपोटिज्म की बहस में अक्सर सफल स्टार किड्स के नाम सामने आते हैं लेकिन फिल्मी परिवार से आने वाले हर कलाकार की कहानी सफल नहीं रही है। हर्मन बावेजा, आदित्य पंचोली के बेटे सूरज पंचोली, सुनील शेट्टी की बेटी अथिया शेट्टी, शेखर सुमन के बेटे अध्ययन सुमन और अब्बास-मस्तान के बेटे मुस्तफा जैसे कई कलाकारों को बड़े फिल्मी नामों से जुड़े होने के बावजूद लगातार सफलता नहीं मिली।
-साल 2020 में हिंदुस्तान टाइम्स ने स्टार किड्स और नेपोटिज्म पर प्रकाशित एक रिपोर्ट में फिल्म इंडस्ट्री के लोगों के हवाले से इसी बात को रेखांकित किया था कि फिल्मी परिवार से आने वाले कलाकार को शुरुआत में मौका आसानी से मिल सकता है लेकिन दर्शकों के बीच लंबे समय तक बने रहने के लिए सफलता जरूरी है। ऐसे में नेपोटिज्म का फायदा लॉन्चिंग के स्तर पर सबसे स्पष्ट दिखाई देता है लेकिन बॉक्स ऑफिस पर हर स्टार किड के लिए एक जैसा नतीजा नहीं आता।
आउटसाइडर्स के लिए रास्ता मुश्किल लेकिन बंद नहीं
-दूसरी तरफ बॉलीवुड ने ऐसे कलाकार भी पैदा किए हैं जिनका इंडस्ट्री से कोई मजबूत पारिवारिक संबंध नहीं था, फिर भी उन्होंने अपनी जगह बनाई। शाहरुख खान, अमिताभ बच्चन, दिलीप कुमार, मनोज बाजपेयी, नवाजुद्दीन सिद्दीकी, राजकुमार राव, आयुष्मान खुराना, प्रियंका चोपड़ा, अनुष्का शर्मा और कंगना रनौत जैसे नाम इस लिस्ट में अलग-अलग दौर के उदाहरण हैं।
-इन कलाकारों का फिल्मी सफर ये बताता है कि बॉलीवुड में बाहर से आने वालों के लिए रास्ता मुश्किल जरूर हो सकता है लेकिन असंभव नहीं। आयुष्मान खुराना ने खुद अपनी शुरुआती मुश्किलों के बारे में बताया था। उन्होंने कहा था कि एक आउटसाइडर होने के कारण उन्हें पता था कि उन्हें दूसरी कोशिश आसानी से नहीं मिलेगी। उन्होंने अपनी पहली फिल्म 'विकी डोनर' से पहले कई फिल्मों को ठुकराया था और सही मौके का इंतजार किया।
-आयुष्मान खुराना ने ये भी कहा था कि सफल स्टार किड्स को पहला मौका जरूर मिलता है लेकिन उसके बाद उन्हें भी अपने प्रदर्शन के जरिए खुद को साबित करना पड़ता है। आयुष्मान खुराना की कहानी इस लिहाज से दिलचस्प है कि उन्होंने सिर्फ एक एक्टर के रूप में नहीं बल्कि अलग तरह की कहानियों और किरदारों के जरिए अपनी एक खास ऑडियंस तैयार की।
-राजकुमार राव, मनोज बाजपेयी और नवाजुद्दीन सिद्दीकी जैसे कलाकारों ने भी पारंपरिक 'हीरो' की परिभाषा को बदलने में भूमिका निभाई है। रिसर्च में भी इन कलाकारों जैसे नामों को उस बदलाव के उदाहरण के रूप में देखा गया है, जिसमें थिएटर और छोटे शहरों या गैर-फिल्मी पृष्ठभूमि से आने वाले कलाकारों ने मुख्यधारा में जगह बनाई।
सोशल मीडिया ने बदली नेपोटिज्म और आउटसाइडर की पूरी बहस
-अगर आज के बॉलीवुड और 20 साल पहले के बॉलीवुड में सबसे बड़ा अंतर देखें तो वो सिर्फ फिल्मों का नहीं बल्कि दर्शकों की आवाज का भी है। पहले किसी फिल्म की स्टारकास्ट को लेकर चर्चा मुख्य रूप से फिल्म मैगजीन, अखबार और टीवी तक सीमित रहती थी। अब किसी स्टार किड की पहली झलक सामने आते ही सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया शुरू हो जाती है।
-यही कारण है कि नेपोटिज्म अब सिर्फ इंडस्ट्री के अंदर का मुद्दा नहीं रहा। ये किसी फिल्म की मार्केटिंग का हिस्सा भी बन गया है। Ormax Media की 2024 की रिसर्च में कहा गया है कि सोशल मीडिया के दौर में नेपोकिड से जुड़ी नकारात्मक धारणा किसी प्रोजेक्ट की रिलीज से पहले ही उसके प्रति दर्शकों के नजरिए को प्रभावित कर सकती है। रिपोर्ट ने 'द आर्चीज', 'ऐ वतन मेरे वतन' और 'हीरामंडी' जैसे प्रोजेक्ट्स के संदर्भ में इस सोशल मीडिया नैरेटिव का उल्लेख किया।
-इसका मतलब ये नहीं कि सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग सीधे तौर पर किसी फिल्म की असफलता तय कर देती है लेकिन इतना जरूर है कि आज दर्शक कलाकार के काम के साथ-साथ उसकी पृष्ठभूमि, लॉन्च और इंडस्ट्री कनेक्शन पर भी नजर रखते हैं।
क्या ऑडियंस अब स्टार किड्स को स्वीकार कर रही है?
-दर्शक स्टार किड्स को स्वीकार भी करते हैं और उनकी आलोचना भी करते हैं। फर्क इस बात से पड़ता है कि कलाकार पर्दे पर कैसा प्रदर्शन करता है और फिल्म दर्शकों को क्या देती है। अगर फिल्म अच्छी है और कलाकार अपने किरदार में फिट बैठता है तो दर्शक उसे स्वीकार कर सकते हैं। दूसरी तरफ बड़े नाम, महंगा प्रमोशन और फिल्मी परिवार की पहचान किसी कमजोर कंटेंट को हमेशा नहीं बचा सकती।
-यही वजह है कि आज किसी स्टार किड के लिए चुनौती दोहरी है। उसे एक तरफ आउटसाइडर की तुलना में मिली शुरुआती सुविधा के कारण आलोचना झेलनी पड़ सकती है, वहीं दूसरी तरफ उसे ये साबित करना पड़ता है कि वो केवल अपने सरनेम की वजह से इंडस्ट्री में नहीं है।
-एक दिलचस्प उदाहरण शादाब खान का भी है। हिंदी फिल्मों के दमदार एक्टर रह चुके अमजद खान के बेटे शादाब ने साल 1997 में 'राजा की आएगी बारात' मूवी से बॉलीवुड में एंट्री की थी लेकिन उन्हें लंबे समय तक बड़ी सफलता नहीं मिली। साल 2020 की 'स्कैम 1992' के बाद वह फिर चर्चा में आए। साल 2026 में दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने दावा किया था कि पिछले 6 सालों उन्होंने करीब 60 ऑडिशन दिए थे। उनकी कहानी ये भी दिखाती है कि फिल्मी परिवार से होना अपने आप में स्थायी काम की गारंटी नहीं है।
तो क्या बॉलीवुड पूरी तरह मेरिट देखती है?
-नेपोटिज्म के इस बहस का सबसे जटिल सवाल यही है। एक ओर आंकड़े बताते हैं कि दर्शकों को लगता है कि बॉलीवुड में फिल्मी परिवारों और करीबी नेटवर्क का प्रभाव है। दूसरी ओर ऐसे कई उदाहरण हैं जहां स्टार किड्स असफल हुए और आउटसाइडर्स ने बड़ी सफलता हासिल की। इसलिए बॉलीवुड को पूरी तरह मेरिटोक्रेसी कहना भी तस्वीर को अधूरा करता है और हर स्टार किड की सफलता को सिर्फ परिवार की वजह से जोड़ देना भी।
-दरअसल फिल्म इंडस्ट्री में 'पहला मौका', 'बार-बार मौका' और 'लंबे समय तक सफलता' तीन अलग-अलग चीजें हैं। परिवार किसी कलाकार को पहला मौका दिला सकता है और कभी-कभी असफल फिल्म के बाद दूसरा मौका भी दिला सकता है लेकिन दर्शकों का लगातार समर्थन, अच्छी फिल्में और कलाकार की अपनी क्षमता लंबे करियर के लिए निर्णायक कारक बन सकते हैं। विडंबना ये भी है कि बॉलीवुड में खुद कई फिल्मी परिवारों की अगली पीढ़ी संघर्ष कर रही है जबकि कई गैर-फिल्मी परिवारों के कलाकार आज इंडस्ट्री के सबसे चर्चित नामों में हैं।
कहानी सिर्फ स्टार किड बनाम आउटसाइडर की नहीं, फिर क्या?
-बॉलीवुड का नेपोटिज्म विवाद इसलिए इतना लंबा चल रहा है क्योंकि इसमें एक साथ कई सच्चाइयां मौजूद हैं। स्टार किड को पहचान, नेटवर्क, संसाधन और पहला अवसर मिलने का फायदा हो सकता है। आउटसाइडर को अक्सर अपनी जगह बनाने के लिए ज्यादा समय, ज्यादा ऑडिशन और लगातार नेटवर्किंग की जरूरत पड़ सकती है लेकिन दूसरी तरफ हर स्टार किड सफल नहीं होता और हर आउटसाइडर संघर्ष के बावजूद स्टार नहीं बन पाता।
-आज की सबसे बड़ी बदलाव वाली बात ये है कि दर्शक पहले से ज्यादा मुखर हैं। वे कलाकार की फिल्मी विरासत के साथ उसके काम को भी देख रहे हैं। सोशल मीडिया ने इस चर्चा को तेज कर दिया है और अब किसी एक्टर की लॉन्चिंग से लेकर फिल्म के प्रदर्शन तक उसकी पृष्ठभूमि पर लगातार बहस होती है।
-इसलिए बॉलीवुड के नेपोटिज्म की पूरी कहानी को शायद एक लाइन में नहीं समेटा जा सकता। फिल्मी परिवार किसी के लिए दरवाजा खोल सकता है लेकिन उस दरवाजे के पार कितनी दूर तक जाना है, वहां कहानी प्रतिभा, चुनाव, मौके, कंटेंट, बॉक्स ऑफिस और सबसे बढ़कर दर्शकों की पसंद से तय होती है।